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खानदान 30

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विनीत और रामलालजी का एक गुट बन गया था, और दर्शनाजी और रमेश का दूसरा गुट। रामलालजी का चाहे कोई भी गुट क्यों न हो .. पर फ़ैसले उनकी धर्म-पत्नी जी के ही होते थे। इधर रमेश फैक्ट्री से सम्बंधित कारोबार में शामिल था ही नहीं.. बस! ऊपर के ही थोड़े- बहुत काम की ज़िम्मेदारी रमेश की थी। ख़र्चा-पानी तो बापू से कह दर्शनाजी ही रमेश को दिलवा दिया करतीं थीं। अभी घर-गृहस्थ की ज़िम्मेदारी दर्शनाजी की ही थी। यहाँ तक की रसोई का पूरा जिम्मा सासु-माँ का ही था। बहुओं को तो बस! लाइन से में लगकर अपना और अपने बच्चों के नाप का भोजन सासु-माँ से लेना होता था। दर्शनाजी का रसोई घर में सख़्त पहरा रहा करता था.. सबसे पहले सासु-माँ और ससुरजी भोजन फरमाया करते थे, उसके बाद बचा-कुचा भोजन दोनों बहुओं और घर के बच्चों में बंट जाता था। बच्चे तो खैर अभी छोटे ही थे। प्रहलाद तो बेबी फूड ही खाता था। सुनीता को बच्चे का छोटा- मोटा खाना बनाने की इज़्ज़ाज़त दर्शनाजी से मिल गई थी। दर्शनाजी और रामलालजी के गृहस्थ में अभी कोई विशेष ज़िम्मेदारी किसी की भी नहीं थी। सभी अपने-अपने ढँग से मौज मना रहे थे।

फैक्ट्री में कबाड़ा बेच रोज़ एक खिलौना प्रहलाद के लिये घर आ रहा था.. हालाँकि सुनीता ने धीरे से इस बात का विरोध करते हुए, रमेश को समझाने की कोशिश भी की थी..  सुनीता का समझाने का मतलब.. पैसे की बर्बादी को रोकना था, क्योंकि प्रहलाद तो अभी छोटा था.. हर रोज़ एक खिलौने में पैसे बर्बाद करने की कोई ज़रूरत ही न थी। पर रमेश के हिसाब से तो .. और हिसाब से ही क्या, था भी कारोबार में हिस्सेदार.. इसलिये प्रहलाद को छोटा नवाब बनाया जा रहा था। रमेश एक ही बात को बार-बार बोलता भी था,” हम कोई भूखे-नंगे हैं, क्या! “।

यूँहीं परिवारिक नाटकों में रामलाल विला में ज़िन्दगी अग्रसर हो रही थी, तभी एक दिन अचानक से रामलालजी के लिये उनके छोटे भाई राममेहर का फ़ोन आया था,” माँ के भैंस ने सींग मार दिये.. माँ ने देखन आजा, बीमार पड़ी से”।

गाँव मे रामलालजी के चार भाई और एक बहन थे। रामलालजी को मिलाकर पाँच हो गए थे। रामलालजी अपने बहन-भइयों में सबसे बड़े थे। दर्शनाजी ने ही एक बार बताया था कि,” इसके बाद जो भी दादी के इसका कोई छोटा होया करदा, सब मर जाया करदे थे.. किसी ने दादी ताईं बताया था, कि ब्याह करदे रामलाल का.. तब रुक जांगे इसके भाई-बहन मरने से। मेरा ब्याह होय पाछे, कोई भी न मर्या.. इस रामलाल के बाद पाँच और दादी के होय”।

दर्शनाजी ने एकबार बताया था, कि रामलालजी पाँच भाई और एक बहन हैं। रामलालजी के बाद जो भी बच्चा रामलालजी की माँ के हुआ करता था, वो मर जाया करता था। फ़िर किसी ने गाँव में बताया, कि रामलाल का ब्याह करा दो इससे होने वाली सन्तान नहीं मरेगी । इसलिये रामलालजी और दर्शनाजी का ब्याह रामलाल जी की माँ.. लौंग श्री ने बचपन में ही करवा दिया था। दर्शनाजी ने सुनीता और परिवार के आगे एक दिन बताया भी था,” रमेश का दादू म्हारे घरां खड़ा रया करदा.. मेरे दादु से बोल्या करदा.. बस! चौधरी थारी छोरी म्हारे घरां बैठी कुत्ते भगायी जागी.. काम कोनी करवाना, बस! आप रामलाल गेल ब्याह दो!”।

दर्शनाजी के कहने के अनुसार रमेश के दादाजी दर्शनाजी के यहाँ रोज़ जाया करते थे, क्योंकि किसी ने बताया था, कि अगर रामलाल का ब्याह हो जाए तो आने वाली सन्तान बच जायेंगी। इसी सिलसिले में रामलालजी के दादाजी दर्शनाजी के यहाँ ख़ड़े होकर केवल यही कहा करते थे,” चौधरी साहब! हमें अपनी लड़की दे दो, काम नहीं करवायेंगे, बस! हमारे कुत्तों की रखवाली करती रहेगी.. बैठी-बैठी”।

रामलालजी की माँ को भैंस ने सींग मार चुकी है, और वो बीमार हैं.. सुनीता ने सोचा था, कि बाबूजी अपनी माँ को देखने दौड़े चले जाएँगे। पर यह क्या! ख़बर आने के बाद किसी ने दादी से मिलने या फ़िर गाँव जाने की कोशिश बिल्कुल भी न करी थी।

गाँव से रामलालजी के छोटे भाई का फ़ोन दोबारा आया था,” माँ का देखन का जी कर रया है, आजा!”।

गावँ से रामलालजी के लिये माँ के बुलावे बार-बार आ रहे थे.. वो बहुत बीमार ही गयीं थीं, और अपने बेटे से मिलना चाहती थीं। रामलालजी कोई विदेश में तो रह न रहे थे, जो अपनी माँ से मिलने जाने में असमर्थ हो रहे थे.. और भई! रमेश के हिसाब से कोई भूखे-नंगे थोड़े ही थे.. करोड़पति पार्टी थे.. दो घन्टे की फ्लाइट से पहुँच सकते थे।

रामलालजी जोरू के गुलाम और पत्नी और अपने बच्चों से डरने वाले इंसान डरते ही रह गए.. बीवी ने माँ से जाकर मिलने का इशारा जो न किया था… इस बार एक आखिरी फ़ोन आया था.. गाँव से..

“ माँ ख़त्म हो गई!! “।

यह सुनकर भी रामलालजी ख़ड़े ही नहीं हुए थे। यह क्या! था!.. माँ से बढ़कर तो ईश्वर का स्थान भी नहीं है.. फ़िर अपनी जन्मदाता के लिये आगे क़दम क्यों नहीं बढ़े थे..दो फैक्ट्री के मालिक रामलालजी के.. इतना भी क्या कमज़ोर होना, और पत्नी से डरना।