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खानदान .. 3

indian wedding


जब नई बहू घर में आती है,तो कुछ दिन का पण्डित द्वारा बहु का मुहर्त निकलता है,कि इतने दिन के बाद बहु वापिस माईके जाएगी और भाई लेने आता है। सो सुनीता का मुहर्त भी ससुराल में यानी के इंदौर में ग्यारह दिन का ही था…बारहवें दिन सुनीता को अपने भाई के साथ वापिस माईके यानी दिल्ली जाना था। इंदौर में पति रमेश के साथ और ससुराल वालों के साथ ये पहले ग्यारह दिन एक अजीब सी कशमकश में बीत रहे थे। हालाँकि किसी भी तरह का अन्याय न हो रहा था सुनीता के साथ,पर माहौल और परिवारजनों के अंदाज़ में बहुत अंतर पा रही थी,सुनीता। अब घरों में कोई फ़िल्मी माहौल तो मिलता नहीं है, हर घर में कुछ-कुछ नया और अपनी तरह का ख़ास होता है। उम्र कम होने के कारण और अलग ढँग के माहौल में पली-बड़ी होने के कारण सुनीता यह बात समझने में असमर्थ थी। रमेश भी सुनीता की उदासी का कारण समझने में असमर्थ ही था,क्योँकि रमेश के हिसाब से तो सब ठीक ही था। फिर पता नहीं क्यों?.गलत तो कुछ न था, बस दो लोगों के शिक्षा और संस्कारों में जो अंतर था उसने दोनों के बीच में एक दीवार की शुरुआत कर दी थी,जिसकी पहली ईंट इन पहले ग्यारह दिनों में रखी जा चुकी थी। होता क्या है,हमारे हिसाब से की शादी ब्याह कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल तो होता नहीं है,न ही कोई ऐसी ज़िन्दगी की शरुआत होती है,जो कि फिल्मों के हिसाब से चले। ब्याह का मतलब हमारे हिसाब से एक नए महमान का जिसके कि संस्कार आपके साथ आगे तक की आने वाली ज़िन्दगी के साथ जुड़ रहें हैं, प्रवेश आपके पारिवारिक माहौल में होता है।नए मेहमान के साथ एडजस्ट करने का और उसे अपने परिवार में अपनाने का तरीका हर माहौल का अलग है। क्योंकि सुनीता का प्रवेश एकदम नए संस्कारों और संस्कृति के लोगों के साथ हुआ था, इसलिए सुनीता परिवार में अपने आप को शामिल करने में असमर्थ पा रही थी। घर के बड़ों को चाहिए कि विवाह से पहले बच्चों को बैठाकर अपने खुद के अनुभवों से आगे आने वाले जीवन के विषय में थोड़ी सी शिक्षा दे दी जाए,क्योंकि हमारे हिसाब से फ़िल्मी ख़्वाब एक तरफ़ होते हैं, और हकीकत दूसरी तरफ़। विवाह की या फ़िर यूँ कह लीजिए कि दो लोग जो घरौंदा बनाने जा रहे होते हैं…उसकी पहली नींव रूपी सीढ़ी कौन सी है..या फ़िर विवाह की पवित्रता के सही मायने क्या हैं… विवाह के सही मायने समझना या फ़िर समझाना बेहद ज़रूरी होता है,क्यों समाज के सामने या फ़िर दो परिवार मिलकर बच्चों का गठबंधन करते हैं.. यह भी यानी के विवाह को भी एक विषय के रूप में लेते हुए हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को खुल कर ब्याह से जुड़े हर मुद्दे को समझाना चाहिए, क्योंकि विवाह के बंधन में बंधने वाली यह नई पीढ़ी नए घरौंदों की नींव और उन घरौंदों को संस्कार,शिक्षा और प्यार रूपी ईंट, पत्थर और सीमेंट से पक्का बनाती है। प्रेम विवाह हो या फ़िर arrange मैरिज दोनों तरह से ही वैवाहिक बंधन की गहराई को समझना आवश्यक है। बच्चा होने के कारण या फ़िर कहीं किसी रूप में सही जानकारी न होने के कारण सुनीता के कदम विवाह की पहली सीढ़ी पर ही डगमगा गये थे.. जिसका आभास रमेश की माँ दर्शना देवी को रमेश के द्वारा हो गया था। क्योंकि दर्शना देवी एक अलग क़िस्म की महिला थीं.. यानी के परिवार में धन सम्पत्ति और ज़मीन ज़ायदाद का कोई अभाव न था.. अपने सुपत्र और सुपत्र से ज़्यादा हिस्से को लेकर सोचने वाली महिला थीं.. दर्शना देवी। सुनीता का गृहस्त की पहली सीढ़ी से पैर डगमगाना दर्शना देवी की सोच की पहली चाल बन गयी थी।
खैर! जैसे तैसे सुनीता ने अपने ग्यारह दिन पूरे किए थे…और आज सुनीता के भाई सुनील को दिल्ली से लेने आना था। सुनीता यह सोचकर बेहद खुश थी,कि चलो घर जाने को मिलेगा। इन गयारह दिनों के बीच जब भी सुनीता ने अपने घर पर बातचीत करी थी, तो बस फोन पर रोना ज़रूर शुरू किया था..क्यों रोती थी सुनीता फ़ोन पर बातचीत करते वक्त,नई लड़की का यूँ फ़ोन पर रोना आज के ज़माने में समझने वाली बात ही थी।ऐसा लगता था,कि सुनीता को रमेश पसन्द आया ही नहीं, पर इस बात को खुल न कह पा रही थी। कौन सा डर था,सुनीता के अंदर जो अपने-आप को खुलने ही नहीं दे रहा था। ऐसा तो नहीं कि सुनीता में खुद में ही कोई कमज़ोरी थी,जो उसे रमेश के नापसन्द होने को खुल कर बता ही नहीं पा रही थी। समाज की नज़रों में और वैसे भी रमेश में कोई भी कमी न थी..देखने में अच्छा ख़ासा नोजवान था…कद काठी भी मस्त थी,एकदम फ़िल्म का हीरो लगता था। पर सुनीता का हिसाब कुछ अलग सा ही लग रहा था..उसे रमेश की फ़िल्मी पर्सनालिटी से कोई लेना-देना ही न लग रहा था। फ़िर क्या चाहिए था सुनीता को..क्या और किस तरह का चाहती थी..सब कुछ कहने में असमर्थ और खुद अपने-आप को समझाने में फेल हो गई थी सुनीता।
खैर! सुनीता के भाईसाहब सुनील जी दिल्ली से इंदौर आ पहुँचे थे,सुनीता को लेने। रमेश के बड़े भाईसाहब विनीत जी का स्टेशन जाना हुआ था सुनील जी को लेने,बहन को विदा करवा आज ही दिल्ली वापिस लौटना था। बड़े भाईसाहब के स्वागत में दर्शना देवी जी ने केवल एक सब्ज़ी,रोटी व अचार परोसा था,थाली में। भोजन परोसने का तरीका भी कोई ख़ास न था। सुनीता यह सब ख़ड़े होकर देख रही थी..पर कह कुछ नहीं सकती थी…कहती भी कैसे..नई ससुराल और एकदम नए लोग। भोजन परोसने के इस अंदाज़ को देख सुनीता फ़िर एक बार अपने मायके के खयालों में खो गयी थी”जब भाभी को लेने उनके मायके से भाई आये थे,तो हमनें तो पूरा का पूरा डाइनिंग टेबल ही भर डाला था, खाने के बाद मिठाई और पान वगरैह तो अलग से थे ही,किस तरह का खान-पान है,इनका।और रमेश ने तो हमारे घर मेहमानों की ख़ातिर दारी करने का तरीका देख ही लिया था, फ़िर भी अपनी माँ से कुछ बोलता क्यों नहीं”। रमेश का अपने घर में अलग होना और जब देखने आए थे दिल्ली तब कोई और रमेश होना यह सब कुछ समझ न पा रही थी,सुनीता। आख़िर बात क्या है? खैर!कोई बात न थी,मामला नया था,हर घर के अपने मेहमाननवाज़ी के तरीके होते हैं। अब शाम का समय हो गया था,सुनीलजी ने बहन के साथ सभी घर वालों को मोटी विदा देकर चलने की तैयारी कर ली थी। आख़िर खाते-पीते घर की लड़की जो थी..सुनीता। सुनीता के पिताजी का भी तो अच्छा खासा बिज़नेस चल रहा था…दिल्ली में। बहन-भाई को विदा करने स्टेशन तक पूरा परिवार साथ गया था, बल्कि दर्शना जी की आँखों मे तो बहु को मायके जाता देख आँसू आ गए थे…इस पर सुनीता के भाईसाहब श्री सुनीलजी का कहना हुआ था,” देखो! कितनी अच्छी सासु माँ हैं ,बहु के मायके जाने पर कौन सी सास के आँखों में आँसू आते हैं”। कोई ख़ास लेना-देना या रीति-रिवाज़ तो न किया था सुनीता के ससुराल वालों ने पर हाँ! ठीक-ठाक तरीके से सुनीता और सुनील जी को रेल में बिठा कर आ गए थे। इन ग्यारह दिनों के बीच इंदौर में ही सुनीता ने अपने ससुर और पारिवारिक बिज़नेस यानी के इन लोगों की फैक्ट्री के भी दर्शन कर डाले थे। पूरा परिवार एक दिन शाम के समय सुनीता को अपनी फैक्टरियों के दर्शन करा लाया था। पर सुनीता के दिमाग़ की सुई केवल रमेश और उसके घर के तौर तरीकों पर ही अटकी रही थी। कारोबार को देख कर भी उसका ध्यान दूसरी तरफ़ की मोह-माया यानी के पैसे की तरफ़ आकर्षित बिल्कुल भी न हुआ था। एक बार भी सुनीता के दिमाग़ में यह बात न आई थी,”अरे! इतना बड़ा फैक्ट्री का शेड, वो भी दो-दो..फ़िर तो इनके पास बहुत रुपया पैसा होगा”। रुपये और पैसे के ख़याल से सुनीता का दिमाग़ कोसों दूर था…हमसफर मन को भाया ही नहीं था..यह एक बात सुनीता के मन के किसी कोने में दब गई थी,जो ज़बान पर तो आना चाहती थी,पर नहीं आ पाई।
सारे परिवार से विदा लेकर दोनों बहन-भाई अब रेल में बिल्कुल अकेले सफर कर रहे थे,कि भाई का बहन से पूछना हुआ था,”रोया क्यों करतीं थीं, तुम फ़ोन पर..कोई विशेष परेशानी तो मुझे नज़र न आई है,क्या,रमेश तुम्हारे साथ पहले दिन से ठीक है?”सुनील जी का सुनीता से रमेश के बारे में पूछने का वही मतलब था,जो कि एक नव विवाहित बालिका से उसके घर वाले पूछते है। सुनीता की गर्दन अपने भाई के सवाल पर हाँ में ही हिली थी। या तो वो प्रश्न को ठीक ढँग से समझ न पायी थी, या फ़िर उत्तर देना नहीं चाहती थी। बस,भाई से एक बात ज़रूर कह उठी थी, सुनीता”आपसे और पिताजी से यह उम्मीद न थी, मैंने सोचा था,कि आप दोंनो अपने जैसा ही मेरे लिये भी पसन्द करोगे”। इस बात का सुनीलजी ने कुछ इस प्रकार से उत्तर दिया था,”मैने पिताजी से लौट चलने को कहा था, पर उन्होंने मेरी एक न सुनी ‘। क्यों लौटाना चाहते थे,सुनीलजी पिताजी को इंदौर से,आख़िर माजरा क्या था? खैर! बहन-भाइयों के बीच विस्तार से कोई भी बातचीत न हुई थी,सुनील जी की उम्र भी कोई बहुत ज़्यादा न थी,केवल पाँच साल ही बड़े थे,सुनीता से। रेल में दोनों बहन-भाई का आपसी बातचीत में समय अच्छा बिता था,और देर रात को ही दिल्ली पहुँच गए थे…सुपर फ़ास्ट एक्सप्रेस ट्रेन जो थी।
स्टेशन पर पिताजी और अपने भतीजे यानी के सुनीलजी के बड़े सुपत्र अभिमन्यु को देख सुनीता खुशी से उछल पड़ी थी। ट्रैन के रुकते ही सुनीता गाड़ी से नीचे उतर पिताजी के गले से लग गई थी। पिताजी, भतीजे और भाई के साथ खुशी -खुशी सुनीता अब घर पहुंच गई थी। सुनीता लोगों का घर दिल्ली के एक अपार्टमेंट्स में हुआ करता था। माँ और भाभी को बिल्डिंग में ऊपर खड़ा सुनीता की खुशी दुगनी हो गई थी। माँ ने सुनीता की तरफ़ देखते ही कहा था,”पहले से भी अधिक गोरी नज़र आ रही है”। ऊपर घर में पहुँच कर पहले की तरह भाई भतीजों में रल-मिल गई थी,सुनीता। पर सुनीता के और रमेश के आपसी सम्बंध के विषय में किसी ने भी न माँ ने न ही पिताजी ने कोई भी सवाल न किया था, सिर्फ़ इस विषय में अभी तक एक ही सवाल था.. जो की सुनील जी ने रेल में अपनी बहन से पूछा था। इस तरह के सवाल आम घरों में माँ या भाभी ज़रूर पूछ लिया करतीं हैं।
दो चार दिन मायके में अच्छे बीतने के बाद एक दिन सुनीता ने माँ और पिताजी के व्यवहार में थोड़ा अन्तर महसूस किया, ऐसा लगा उन्हें देखकर की किसी की कोई बात उन्हें परेशान कर रही है,जो वो अभी किसी को भी बताना न चाहते है। क्या थी वो एक ऐसी बात जो केवल सुनीता के पिता श्री मुकेश जी और माताजी श्रीमती अनिता जी के बीच ही थी।
अचानक बात का खुलासा हुआ था..मुहँ से निकल ही पड़ा था…इंदौर से श्री रामलाल जी का फोन आया था।