रंजना का किस्सा अब पूरी तरह से ख़त्म हो चुका था.. चाहे वो इंदौर में हो, या फ़िर दुबई में.. रमेश उसके दिमाग़ से उतर ही गया था,.. रमेश के साथ बिताए सारे पल रंजना झटके से भुलाकर अपने जीवन में अब आगे बढ़ चुकी थी। एकबार के ही निर्णय में उसनें रमेश को अपने जीवन से निकाल बाहर फेंका था.. अपने निर्णय पर अडिग होते हुए.. ,रंजना ने फिर कभी रमेश के बारे में सोचा भी नहीं था। रंजना रमेश कहानी एक ही झटके से ख़त्म हो चुकी थी। अब रंजना हर तरह से रमेश के लिए एक अजनबी बन कर रह गयी थी। जिस कहानी का अंत समझ नहीं आ रहा था.. वह इस तरह से ख़त्म हो जाएगी.. सोचा भी न था। अब तो कौन रंजना और कौन रमेश..!

बच्चे बड़े हो रहे थे.. असली मुद्दा अब सामने आ रहा था.. वो था.. हिस्से का। ख़र्चे-पानी का जिम्मा तो रामलालजी के बाद विनीत के ही हाथ में आ गया था.. दर्शनाजी ने अपने लाड़ले बेटे को विनीत की कमर पर लाद दिया था.. बहुत छोटी सोच का और घटिया आदमी निकल कर आया था.. ये रमेश! अब सुनीता को इसकी असलियत देख.. डर लगना शुरू हो गया था.. ” अगर परिवार ने हाथ पीछे खींच लिया.. तो क्या होगा! डर वाले ख़याल निरंतर मन को घेरने लगे थे.. पीछे जाने का अब कोई भी रास्ता नहीं था.. सुनीता के पास! बाहर रमेश सुनीता को काम करने ही नहीं देता.. क्योंकि भई! फैक्ट्री वालों की बहू जो थी.. और सुनीता को नौकरी मिलनी भी मुश्किल ही थी.. नाम की फैक्ट्री का गाना था.. अच्छा या बुरा सिर्फ़ इस रमेश के साथ ही एक आख़िरी उम्मीद बाकी बची थी..  स्कूल के फंक्शन के लिये किसी वशेष तरह की पोशाक की ज़रूरत पड़ गई थी.. प्रहलाद को! जिसके लिये पैसे विनीत ने दे दिये थे.. रमेश किसी भी रिश्ते को अहमियत न देते हुए.. केवल पैसों को ही देता था.. बाप बच्चों के लिये फूला नहीं समाते.. पर यहाँ तो कमाल ही हो रहा था..

” मेरा हिस्सा…!! मेरा हिस्सा..!!”।

रमेश घर आते ही बुरी तरह से चिल्लाने लगा हुआ था।

” अरे! क्या बात हो गई..!”।

सुनीता बोली थी..

” अरे! तुझे क्या फर्क पड़ता है..! मेरा हिस्सा निकल रहा है.. !!”।

रमेश यहाँ प्रहलाद के लिये स्कूल के कार्यक्रम की पोशाक की कीमत को लेकर चिल्ला रहा था.. उसके हिसाब से उसके हिस्से के पैसे निकल गए थे. . इसी बात पर रंजना बोली थी..

” कमाल ही हो गया.. वो जब लडक़ी को खिला-खिला कर आते थे..  तो कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.. यह तो अपना ही बच्चा है! अपने लड़के के लिए इतनी चिल्ला-चोट!”।

” लड़की किसको बोल रही है..!! हैं! रिश्ता था.. मेरा उससे..! मैने ही उसे छोड़ दिया! उसनें मुझे नहीं छोड़ा..!”।

अजीब ही जिद्दी और बदतमीज़ आदमी निकला.. ये रमेश! अपनी बात के ऊपर किसी की आने ही नहीं देता था.. समस्या थी.. हिस्सा और समाधान भी इसी घर में था.. देखते हैं! किस तरह से यह शतरंज का खेल खानदान में आगे चलता है! और खिलाड़ियों की हार-जीत का फ़ैसला कैसे होता चलता है।

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