” हम्म! यो..!! यो हमारे पेै पाई भी कोनी ले सकदा..!!”
दर्शनाजी बड़बड़ाती घूम रहीं थीं.. सुनीता वहीं थी।
” कर लेन दे! माँ-बेटियाँ ने कोशिश कुछ भी कोनी दें हम!”।
दर्शनाजी की बातों से साफ़-साफ़ ज़ाहिर हो रहा था.. कि रमेश को हिस्सा मिलना मुश्किल है। इस पर भी सुनीता का घबराना ख़त्म नहीं हो रहा था।
घर में सामान लाने की बजाए रमेश अब रंजना पर ही रोज़ के हज़ार पाँच-सौ रुपये ख़र्च कर रहा था.. इन सब तमाशों ने भयंकर झगड़े को जन्म दे दिया था। रमेश घर की और बच्चों की माँगे पूरी करते वक्त बुरी तरह से झल्ला उठता था.. और चिल्लाना शुरू कर देता था.. सिर से पानी अब ऊपर होने लगा था। सुनीता और बच्चे परेशान होकर अब पुलिस को फ़ोन करने लगे थे।
” रखैल पाल रखी है.. इसनें..!! उसके पीछे तमाशे कर-कर नाक में दम कर रखा है!”।
” मेरा रिश्ता है.. उससे..!! रखैल बोलती है!”।
सुनीता पुलिस वाले जो की रामलालजी के घर में बुलाने पर बैठे हुए थे.. उनके आगे ग़ुस्से में बोल पड़ी थी। रमेश भी अपने बचाव में कम न पड़ा था.. रंजना को रखैल बोलने पर वर्दी वालों के आगे ही ग़ुस्से में आ गया था।
” ठीक ही तो कह रहीं हैं!.. ये! अच्छा- ख़ासा परिवार होते हुए.. इन सब तमाशों की तो कोई ज़रूरत ही नहीं थी!”।
पुलिस वालों ने रमेश को डाँटते हुए, कहा था।
दर्शनाजी और रमेश भी वहीं बैठे थे। सुनीता अकेली ही अपनी बात कहे जा रही थी..
” यो बैठ्या बापू इसनें मरवा दिया..!!”
अचानक ही महफ़िल में चल रही पंचायत नया मोड़ ले लेती है.. और रमेश चालाकी से बात का रुख बदल देता है.. बात को रंजना से हटाकर फटाक से अपने पिता पर ले आता है.. और रामलालजी का दुनिया छोड़ने का इल्ज़ाम पुलिस वालों के आगे विनीत पर डाल देता है।
तुरंत बदली हुई बात को किस तरह से संभालते हैं.. विनीत और दर्शनाजी! इस ड्रामे का कौन सा निष्कर्ष निकालती हैं.. वर्दी वाली पंचायत.. फैसला जानने के लिये ज़रूर पढ़िये.. खानदान।