” गड्डी के पहिये में जमा चाकू मार राखे थे.. पहिए चाकू ते पंक्चर कर राखे सैं!”।

रमेश भी अब हो रही पंचायत में शामिल हो चुका था.. रमेश का साफ़-साफ़ शब्दों में यही कहना था, कि गाड़ी के पहियों को चाकू मार-मार कर ही पंक्चर किया गया था.. पंक्चर ठीक करने वाले शख्स ने रमेश को यह जानकारी दी थी.. कि पहियों को कई-कई जगह ज़ोर-ज़ोर से चाकू मार कर पंक्चर किया गया है।

सभी लोगों ने रमेश की बातों को एकदम ध्यान से सुना था.. रमेश की बातों के पूरा होते ही रमा फटाक से महफ़िल के बीच में ही बोल पड़ी थी,” छुटकी ने गार्डन की झाड़ियों में से देखा था.. वो फ़ोन पर किसी से बात कर रही थी.. तू गाड़ी के पहियों के पास झुककर बैठी हुई थी!”।

रमा ने अपना नाम न लेते हुए.. अपनी छोटी लड़की को बीच में लाकर सभी परिवार के सदस्यों के सामने अपनी बात स्पष्ट कर दी थी.. और सभी की नजरें सुनीता पर जा टिकीं थीं। दर्शनाजी को रमा ने आँखों देखा सारा हाल पहले ही बयां कर रखा था, इसलिये इस वक्त सासू-माँ एकदम चुप-चाप खड़ीं रहीं थीं।

” नहीं मुझे क्या पता… मैं ऐसा क्यों करूँगी!’।

सुनीता ने अपनी ग़लती मानने से साफ़-साफ़ इनकार कर दिया था। लेकिन अभी-भी सुनीता ही सबकी नज़रों में गुनाहगार साबित हो रही थी।  जब सुनीता ने अपना गुनाह कबूल नहीं किया था.. तो रमा की बातों को काटते हुए.. तुरंत विनीत बोला था..

” नहीं! नहीं! मैं कह रहा हूँ.. पहियों को पंक्चर करते हुए, ख़ुद मैने इसे देखा था!”

विनीत की कही हुई बात को भी सुनीता ने सबके सामने इनकार कर दिया था।

गाड़ी के पंक्चर होने को लेकर घर में काफ़ी शोर-शराबा हुआ था.. और सबकी अँगुली केवल सुनीता की तरफ़ ही उठी थी.. पर सभी की बातों को नकारते हुए.. सुनीता ने अपने-आप को बेगुनाह साबित ख़ुद ही कर दिया था।

बात की असलियत दरअसल यह थी.. की गाड़ी के पहिये सुनीता ने ही चाकू मार-मार कर पंक्चर कर डाले थे.. ताकि रमेश उस रंजना से मिलने नहीं जा सके। सुनीता को चाकू से पंक्चर करते वक्त वाकई में रमा ने देख लिया था। रमा का कहना सही था.. बेशक वो अपना नाम न लेकर अपनी छोटी बच्ची का नाम लेकर बात कर रही थी।

सुनीता ने घबराते हुए.. अपनी ग़लती बिल्कुल भी नहीं मानी थी.. आख़िर तक सबके सामने वह मना ही करती रही थी.. कि पंक्चर करने में उसका हाथ नहीं है..  उसे कुछ नहीं पता।

” मेरा सोने का कड़ा..!!! मुझे अभी तलाक चाहिये!!”।

देखा! पहुँचे हुए.. खिलाड़ियों के बीच मात खा गई.. न सुनीता! रामलालजी के परिवार में हरेक सदस्य अपने-आप में माहिर खिलाड़ी पहले से ही था.. पंगा तो ले बैठी थी.. सुनीता गाड़ी के पहिए पंक्चर कर! लेकिन इसका भारी भुगतान भी सुनीता को ही करना पड़ा था। इस हरजना भराई में इस बार किसका दिमाग़ चला था.. जानने के लिये पढ़िये अगला खानदान।

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