रमेश की कही हुई रंजना को लेकर बातें आगे विनीत, रमा और दर्शनाजी तक पहुँच रहीं थीं। इन लोगों को भी रमेश के ऐश आराम से बहुत दिक्कत आ रही थी। सुनीता को भी रमेश का रंजना के साथ यूँ घूमना-फिरना पसन्द नहीं आ रहा था.. जो कि उसे शुरू से ही नहीं आता था। अब तो सुनीता ने पूरे घर में दौड़-दौड़ कर हल्ला करना शुरू कर रखा था,” वो लड़की! वो लड़की!”।
“ ए अपने आप आ जागा! कोई किते न भाजता!”।
दर्शनाजी लड़की वाले नाटक के अक्सर मज़े लेते हुए, कहा करतीं थीं.. मज़े लेकर अपने -आप ही घर लौट आएगा.. इसमें घबराने वाली कोई भी बात नहीं है। वैसे एक तरह से उनकी बात ठीक ही थी.. ऐसे मामलों में अक्सर ऐसा ही होता है.. आदमी परिवार में लौटकर आता ही है। पर अब सुनीता दिन-रोज़ रंजना को लेकर हद से ज़्यादा परेशान हो रही थी.. रमेश भी रंजना के पास से देर रात को घर लौटता था.. जिससे घर में एक बार फ़िर मन मुटाव और झगड़े बढ़ गए थे। रमेश घर आते ही हिस्से को लेकर चीखने-चिल्लाने लग जाता था.. रंजना और उसके परिवार को अब हिस्से की जल्दी थी।
“ अरे! हिस्से के लिये डंडा देना है! हिस्से के लिये!”।
रमेश उस बात की इतनी बुरी तरह से चीखते हुए, बोला करता था.. कि सुनीता घबरा जाती थी। रमेश को पैसे भी अभी तक तो ठीक-ठाक ही मिलते थे, और रमेश भी इधर-उधर से जुगाड़ कर ही लेता था.. फ़िर भी रंजना के संग शाम बिताने के पैसे रमेश को कम पड़ते थे। रमेश की परेशानी पैसों को लेकर अब बढ़ती जा रही थी।
“ बटवारा क्यों न करदी! कर..!!”।
रमेश बटवारे को लेकर अब दर्शनाजी पर भी चिल्लाने लगा था।
“ ये सब इनको रंजना की माँ सीखा कर भेजती है! माँ-बेटियों को बहुत जल्दी है.. बटवारा करवाने की!”।
सुनीता अब साथ की साथ दर्शनाजी के कान भरने लगी रहती थी.. रमेश रंजना को पाने की जल्दी में तेज़ी से बटवारे की ओर भाग रहा था। रमेश की रंजना की जल्द से जल्द पाने की कोशिश और सुनीता का वो डर की कहीं रमेश वाकई में रंजना के साथ न भाग जाए.. सुनीता के डर और रमेश की कोशिशों के साथ जुड़े रहिये और पढ़ते रहिये.. खानदान।