देखो! लिख रहीं हूँ

मैं

याद आ रही है

तुम्हारी आज बहुत

माँ!!

तुम होतीं तो

आज मेरी

लेखनी पढ़

तारीफों के पुल

बाँधती

बेशक कैसा भी हुनर

उभरा है

मेरा माँ!

तुम शब्दों की चाशनी

से उसे रोज़

साँवरतीं

तुम्हारा चेहरा देख

मैने कलम

पकड़ी है

माँ!

जानती हूँ

मेरी कलम में

समा कर

प्रेरणा बन

गई हो

तुम मेरी

हर शब्द तुम्हारा

चेहरा बन

मुझे देखता

चलता है

माँ!

लिखते समय तुम्हें

याद कर

तुम्हारे तारीफों

रूपी शब्दों को

याद कर

मन खिल उठता

है मेरा

मुस्कुरा उठता

है! मन

खिल उठती

हूँ मैं

तुम होतीं

तो मुझसे

ये कहतीं

तुम होतीं

तो मुझसे

वो कहतीं

तुम्हारा चेहरा

अब प्रेरणा

बन गया

है मेरा

बस इसी

तरह से मेरी

कलम में

मुस्कुरा कर

समायी रहना

तुम माँ!

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