जब तुम पडे थे अंतिम शय्या में
बिलख रहे थे सब आस पास
तुम्हारी साँसे भी मौन थी 
जैसे तुम हमारे प्यार को मौन करके जा रहे हो
मैं कितना अब रो लूँ, चीख चिल्ला लूँ 
भला अब कैसे तुम जग पाओगे फिर से शोर मचा पाओगे

कैसे अब नहीं कर पाउँगी मैं, तुमसे अनगिनत बातें जिनके शब्द कम और मायने हजार थे, 
कैसे जान पाऊँगी प्यार करने की तुम्हारी मौन अभिव्यक्ति
जैसे तुम जा रहे ऐसे तो कोई जाता भी नही
कंधो पर कुछ पल का सहारा देकर हमेशा तो कोई रुलाता नहीं

याद आओगे प्रियतम तुम मुझे जब जब आयेगा बसंत, पतझड़, शीत और सूरज
याद आएगी हमेशा तुम्हारी मौन अभिव्यक्ति
याद आएगा मुझे हर एक पल
अफसोस होगा कि बिछड़ने से पहले तुमसे इतना प्रेम क्यों नही कर लिया कि उस प्रेम की विरह में रोते रोते मैं भी तुम्हारे चित्त में मिल जाऊँ।

मैंने कब कहा निभाओ जग की रीत और बनाओ साथ जन्मो का रिश्ता
मगर एक जन्म में भी आधी तन्हा उम्र के बीच में जाना ये भी तो एक नादानी है जो तुम कर गये।। 
हाँ, तुम बिछड गये, 
बिछड गये।

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