बड़ी होने लगी हैं, कद भी थोड़ा ऊँचा हो गया हैं क़ानू का। सर्दियों का मासूम शुरू ही गया हैं… छत्त पर तितलियाँ आने लगी हैं फूलों का रस पीने सर्दियों के मौसम छत्त गुलाब ओर गेंदो के फूलों से भर जाती हैं…. बहुत सुंदर दृश्य होता हैं हल्की पीली धूप रूपी छत्त के नीचे रंगीन फूलों का बगीचा… बगीचे में खेल -कूद करती हुई मेरी प्यारी क़ानू। दूर बैठकर चुप -चाप यह देखना की कौनसी तितली किस फूल पर जाके बैठेगी फिर धीरे-धीरे झट से उसको मुँह में पकड़ लेना। एक बार में सर्दी में धूप सेक रही थी बोगन बेलियाँ के ऊपर बहुत सुंदर तितली आकर बैठ गयी…बस! फिर क्या था, दूर से ही क़ानू ने तितली को देख लिया था धीरे से बिना आवाज़ पास आई और अपनी नाक को काँटे दार टहनी के बीच में से सावधानी से निकालकर तितली पकड़ कर मेरे सामने ले आई- कहना था ” लो माँ तितली पकड़ो ओर मेरे साथ ओर तितली के साथ थोड़ी देर खेलो” सच! धीरे से अपनी नाक को बचाकर यू तितली को पकड़ना मन भा गया था, सर्दियूँ में क़ानू का रोज़ का काम हो गया था तितलियाँ पकड़ कर लाना और उनसे खेलना ओर फिर छोड़ देना। रंगीन तितलियाँ मुह में दबाकर लाती हुई क़ानू बहुत सुंदर दिखती थी मन होता था गोद में दबोचकर क़ानू ओर तितली को गले से लगाकर रखूँ।अच्छी दोस्ती  हो गयी थी क़ानू की तितलियों के साथ।

बड़ी हो रही थी…बहुत प्यारा सा वाकया मुझे याद आ जाता है जब क़ानू का बचपन मेरी आँखों के सामने घूमता है… पता नही दोस्ती कहूँ या दुश्मनी आप ही तय कीजिये… एक बार मेरी छत्त पर क्रिसमस ट्री जोकि बहुत बड़ा हो गया था चिड़ियाँ ने तिनका- तिनका जोड़कर घोसला तैयार किया और उस क्रिसमस ट्री पर अपने बच्चों के साथ रहने लगी। क़ानू कि नज़र घोसले पर पड़ गयी थी…. समय मिलते ही उस घोसले के नीचे खड़ी हो जाती और भोक-भोक कर चिड़िया ओर उसके बच्चों का जीना मुश्किल कर देती थी, चिड़िया भी कम सयानी न थी, आखिर उसने अपने नन्हे-नन्हे बच्चो की शांति भंग होते देख अच्छा न लगा बस! क़ानू के खिलाफ प्यारी सी प्लानिंग कर डाली बस, अब शाम को जब क़ानू घोसले के नीचे बैठकर भोक-भोक कर थक जाती तो चिड़िया रानी आती उड़ती हुई आती और क़ानू के प्यारे पेपर कटिंग जैसे कानो को छूकर फुर्र से उड़ जाती… क़ानू बुरी तरह से छिड़कर फिर ज़ोर-ज़ोर से भोंकने लग जाती चिड़िया फिर से चक्कर काट के आती और इस बार या तो क़ानू की पूँछ या पीठ को गंदा कर  उड़ जाती…. क़ानू ओर चिड़िया की यह दोस्ती या कह लीजिए दुश्मनी जो करीबन आधे एक घंटे चलती थी, सच! देखने में बहुत मज़ा आता था। समय पूरा हो गया और चिड़िया के बच्चे बड़े हो गई अब चिड़िया ओर उसके बच्चो ने उड़ान भर ली… क़ानू सोच में डूब गई कि अरे मैंने तो अपना काम पूरा किया तंग करने का पर चिड़िया रानी बदला लेने अभी तक नही आई… रोज़ शाम को बाहर आकर क़ानू क्रिसमस ट्री के नीचे बैठ जाती और मासूम आखों ओर चेहरे से घोसले को निहारती ओर यह कहती “कहा चली गयी चिड़ियाँ, नही करूँगी तंग” कहते हैं परमात्मा ने ज़्यादा समझ या यूं कह लीजिए सोचने समझ की शक्ति जानवरो को ज़्यादा दी है इंसानो से अब क़ानू समझ चुकी थी…. की प्यारी सहेली चिड़िया अब कही और जा चुकी हैं – मेरी प्यारी सी भोली बंदर कानू ने बहुत मिस किया अपनी सहेली को ओर पछताती रह गयी कि काश! तंग न करती तो मेरी सहेली मेरे साथ ही रहती।

एक नया दोस्त इन्ही दिनों क़ानू से दोस्ती करने आ गया था, एक छोटा सा grasshopper खेलना चाहता था क़ानू के साथ, गोर से देखा, पलटा ओर मार डाला। मेरे मुह से निकल गया अरे! ये क्या किया आपने खेलने आया था आपके साथ और मार दिया, ऐसा नही करते, मानो समझ में आ रहा था। इस तरह से खेलते-कूदते  नए दोस्त बनाते ओर बिगाड़ते बड़ी हो रही थी क़ानू।

पड़ोस के यहां से चूहे बहुत आ जाते थे चूहे को देखकर बाकी न रहता था, तेज़ी से चूहे के पीछे भागने ओर चूहे को मारकर ही छोड़ना आदत बन गयी थी क़ानू कि। दौड़ती भागती बड़ी हो रही थी क़ानू ओर रोज़ एक नया प्रसंग भी देखने को मिल रहा था। 

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