खानदान 148

खानदान 148

“ये बात कैसे सबके सामने पहुँची..!! कि मेरे पास लाख रुपये आ गए हैं!”। रमेश बुरी तरह से चिल्ला कर बोला था। सब एकदम चुप हो गए थे.. किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया था। ” कोई बात ना.! यो पैसे रमेश ने धर लेन दे!”। माताजी ने बेटे के लिए. लाड़ दिखाते...
खानदान 148

खानदान 147

” मामले को ऐसे मत छोड़! प्रहलाद से कहकर थाने में कंप्लेंट दर्ज करवा.. कि इन्होंने बैंगलोर दाख़िले के पैसे नहीं दिए! प्रहलाद का भी हिस्सा बनता है.. वो थाने जाकर लिखित में शिकायत दर्ज करवा सकता है”। धीमे और निराशा भरे स्वर में मुकेशजी ने सुनीता से फ़ोन पर...
खानदान 148

खानदान 146

लोन की कहानी जैसे-तैसे सुनीता ने दबा ली थी.. दोनों मां-बेटा घर आ गए थे.. गाँव से भी बस लाख रुपये का ही इंतेज़ाम हो पाया था। प्रहलाद के फ़ीस के पैसे पूरे नहीं हो पाए थे.. साथी मित्रों के पिताओं ने जैसे-तैसे अपनी जमा-पूँजी से अपने बेटों के दाख़िले करा दिए थे। पर प्रहलाद...
तुमसे मुलाकात

तुमसे मुलाकात

” हमें नहीं पढ़ना है! यहाँ..!! भोपाल कोई जगह है! दिल्ली जाकर पढ़ना चाहते हैं.. हम!”। बिटिया ने कॉलेज के दाख़िले को लेकर ज़िद की थी.. और उनकी ज़िद अपनी जगह सही भी थी.. आख़िर अव्वल अंकों से बारहवीं जो पास की थी.. बिटिया ने! दिल्ली भेजने और पढ़ाने में हमें...
खानदान 148

खानदान 145

” तन्ने पेलयां न बताया कि तन्ने पाँच-लाख रूपये की ज़रूरत सै! तो हम इंतज़ाम करते.. अब इतनी जल्दी इतने रुपये कित्ते देंगें! कोशिश करेंगें! गाम में कोई हमनें देता हो तो!”। रमेश के चाचा ने रमेश से कहा था। अब तो गाँव में रमेश और प्रहलाद के रोज़ के फ़ोन जाने लगे...