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आदमी चाहे तो आसमान छू ले !

mount everest

महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा .

भोर का तारा- नरेन्द्र मोदी !

उपन्यास अंश :-

“और ….और …जापान ….?” मैं पूछ रहा था .

“घुटने टिका दिए थे,जापान ने !” उन का उत्तर था .

“और ….और …सुभाष ……….?”

“ला-पता …….!!” हाथ झाड़ते हुए बताया था,दादा जी ने . “आज़ाद हिन्द फ़ौज ने भी तो घुटने टिका दिए थे ….? हार गए थे …..रन-बान्कुरे ….!! और फिर ……”

सपना टूटते क्या देर लगती है …? जब तक बयार बह रही होती है ….आसमान भी साफ़ होता है …रोशनी बरकरार रहती है ….तब तक समय भी साँसों के साथ-साथ सरकता रहता है ! अच्छा …हो …या बुरा …घटता ही चला जाता है ! जैसे ही किसी आहट से आँख खुलती है …. सपना चला जाता है !!

“किसी ने तलाशा नहीं,सुभाष को …..?” मैं पूछ रहा था .

“कौन तलाशता उसे ….?” दादा जी का प्रतिप्रश्न था .

“क्यों ….? आज़ाद हुए भारत ने ….अपने उस सपूत का ….पता …”

“कौन …पूछता है, नरेन्द्र ….? रात गई ….बात …गई ….!” दादा जी टीसे थे . “सुभाष बाबू को यहाँ कौन चाहता था ….? सत्ता हाथ में आने के बाद तो …. खेल ही अलग से आरम्भ हुआ !” दादा जी गंभीर थे . “कौन मरा …कौन जिया ….कौन जाने ….? कितने बर्बाद हुए – किस ने गिनती की ….? किसी को क्या मिला – कोई नहीं जानता …! हाँ ! एक बात अवश्य उजागर हो कर आई !”

“वो …क्या ….?”

“जो अंग्रेजों के मित्र थे – माल उन्हीं को मिला ! जो उन के शुभचिंतक थे …वही मुनाफे में रहे ! बाकी को समझ क्या थी ….? लड़ने-मरने वाले आदमी को कभी कुछ मिला है, क्या ….?”

“नहीं ….!”

“तो फिर सुभाष बाबू को क्या मिलता …..? वो आ भी …जाते तो शायद ……”

“शायद देश के कर्णधार होते …..?”

“नहीं,नरेन्द्र ! सुभाष के दुश्मन तो पहले से ही उस का विकल्प सोचे बैठे थे ! वो जानते थे कि ….सुभाष सत्ता में अपनी दावेदारी अवश्य करेगा ….! वह हक़ मांगेगा …हक़ ले कर रहेगा …! वह इतना समर्थ है ….कि ….”

“वह स्वयं क्यों नहीं लौटे …..?”

“कहाँ से लौटते ….?” दादा जी ने मुझे पूछा था . “थे कहाँ ….? लोग कहते थे – हवाई जहाज़ गिरा …और वो लाश हो गए …..! लोग कहते थे कि ….वो अलग जहाज़ ले कर मंचूरिया की ओर उड़ गए ….! कुछ कहते कि …वो साधू बन गए ….! और कुछ लोग कहते कि …..वो ….”

“खोजा किसी ने नहीं …..?”

“नहीं ….! और अगर खोजा भी तो ….केवल इस लिए कि …कुछ इस तरह की पुष्टि हो जाए कि …’न बांस रहे …और न बांसुरी !’

मैं न जाने क्यों एक जिद्दी बालक की तरह उस दिन …दादा जी से खूब ही लड़ा था ! जैसे सुभाष को न खोज पाना …दादा जी का ही कसूर था – मैं उन से रूठ गया था ! मैं खफा था ! मैंने खाना भी नहीं खाया था ! मैं सोच रहा था कि मैं ….सुभाष बाबू को ज़रूर खोज लूँगा …! जाऊंगा …मंचूरिया तक ….! पैदल …चल कर जाऊंगा ….!! और उन को खोज कर ले आऊँगा ! मैं उन्हें खोज कर ही रहूँगा …और उन्हें पूछूंगा …कि …..

“काल का ग्रास बना आदमी ….लौट भी आए …तो ….उस की कोई अहमीयत नहीं होती,नरेन्द्र !” दादा जी बताने लगे थे . “हो सकता है …कि …नेता जी ने भी यही सोचा हो ….और वो ला-पता हो गए …हों ….?” अब दादा जी ने भी अपना मत पेश किया था . “हो सकता है …..” वह कहते रहे थे …पर मैं था कि सुन ही न रहा था .

मैं भी सोच रहा था . मझे भी तो किसी ने नहीं तलाशा था …? आज घर छोड़े मुझे साल होने जा रहा था ! किस-किस ने मुझे खोजा होगा ….? क्यों खोजे …मुझे कोई ….? मैंने स्वयं से ही प्रश्न पूछा था !!

और दादा जी को भी किस ने खोजा था ….? वो भी तो अकेले …यहीं मौत की घड़ियाँ गिन रहे हैं ? जीवन -यापन भी एक यतीम की ही तरह करते हैं . लोगों की दया-दुआ पर ही पलते हैं . और मैं ….? कौन था , मैं …..? मैंने पूछा था . क्यों था -मैं …? मैं जानना चाहता था ! एक मन तो आया था कि …घर की ओर मैं …स्वयं ही लौट चलूँ . पर फिर मेरा मन न माना था ! वह कहीं और भी भटक लेना चाहता था ! मैं कुछ और भी सटीक उत्तर खोज लेना चाहता था ! जीने के लिए कुछ ऐसे ठोस प्रमाण चाहिए थे मुझे ….जो ………

“मिलता किसी को कुछ नहीं है , नरेन्द्र !” दादा जी का सपाट उत्तर था . “भ्रम है …..माया है ….मोह है ….!! आत्मा …तो अकेली है ….!”

“मैं नहीं मानता ,ये दर्शन ,दादा जी !” मैं नाराज़ था .

दादा जी हँसे थे . बहुत देर तक हँसते ही रहे थे ! उन की समझ में कुछ आ रहा था . वह महसूस रहे थे कि …मेरा मन बिदक गया था ! उन्हें पूर्वाभास था कि …मैं अब रुकूंगा नहीं …? और वो भी मुझे रोकने के लिए समर्थ न थे !

“फ़कीर हूँ,बेटे !” दादा जी कहते रहे थे . “लेकिन तुम्हारे लिए तो मैंने कुछ जोड़ लिया है ! जाना चाहो ….तो जाओ ….!! तिखाल में धन धरा है ! लेते जाना . मेरा इंतज़ार …मत करना नरेन्द्र ! मेरा क्या …? रहा …या ..कि …गया …!!” वह खिलखिला कर हंस पड़े थे . “हंस तो अकेला ही जाता है,बेटे !” वह बता रहे थे .

“और …अब मेरी उड़ान ….?” मैंने भी स्वयं से पूछा था .

“वाद नगर ….?” उत्तर था .

“गलत ….!!” मैंने जोरों से कहा था . “खाली हाथ वाद नगर न लौटूंगा ! मेरी मुराद मिली कहाँ है,मुझे ….?”

फिर एक अन्धकार था ! फिर मेरा रास्ता गुम था ! फिर मेरी बुद्धि भ्रमित थी ! फिर से एक घोर निराशा ने आ घेरा था , मुझ ! स्वतंत्रता संग्राम का पूरा ब्यौरा सुन कर मैं घायल हो गया था ! सुभाष का ला पता होना ही मुझे तोड़ गया था . सुभाष की इस तरह की नियति होगी ….कोई कैसे अनुमान लगा सकता था ….? जिस नेता जी ने देश में एक जलजला ला दिया हो …आज़ादी की मशाल रोशन कर दी हो …देश के युवकों को जांन देने पर राज़ी कर लिया हो …. ‘खून के बदले खून’ का नारा दिया हो ….और जो संसार के इतिहास में जगह पा गया हो ….वह यों गुमनामी के दलदल में समा जाएगा …., बुरा लगा था , मुझे !!

अपने देश वासियों से भी शिकायत थी , मुझे !

लेकिन हाँ, वाद नगर के लोगों के साथ मेरे संवाद अभी भी चलते रहते थे ! मैं चाहता रहता था कि …मैं …एक दिन जब वहां लौटूंगा …तो मेरे पास सब कुछ होगा …! नाम…नखरा …घन-माल ….और एक सौहरत ….सब कमा कर साथ ले कर चलूँगा ! तब लोगों को बताऊंगा ….दिखाऊंगा ….और कहूँगा ,’आदमी चाहे तो आसमान छू ले !’ यों गरीबी में दिन काटते …तुम गधे हो ! उठते क्यों नहीं ….? गरीबी कोई ढोल है -जिसे तुम पीटते रहते हो ….?

“गंगा सागर का मेला पड़ा है !” दादा जी ने मेरा ध्यान तोडा था . “चलोगे ….?” उन्होंने पूछा था .

“क्या है , ये गंगा सागर ….?” मैं पूछ ही बैठा था .

“सब से श्रेष्ठ तीर्थ है , हम हिन्दूओं का ….!” वह बोले थे .

“तब तो मैं अवश्य ही चलूँगा !” मैंने सहर्ष कहा था .

तीर्थों पर जा कर ही तो लोगों की मुरादें मिलती हैं ….. मैंने अपने आप से ये एक वायदा किया था !!

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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!