” नहीं अब इसको तो अब मैं ऐसे ही थोड़े ही छोडूंगा.. इसके मेरे पास पाँच हज़ार से भी ज़्यादा फ़ोटो हैं! जाएगी कहाँ..!!”।
रमेश ने सुनीता को रंजना के विषय में बताया था।
रंजना द्वारा इतने तमाशे करने पर भी रमेश रंजना का पीछा बिल्कुल भी नहीं छोड़ना चाहता था.. यहाँ भी रमेश का रंजना के प्रति प्यार नहीं था.. जो उसे इस रिश्ते से बाँधे हुए, था.. बल्कि मामला संपत्ति को लेकर ही था.. यहाँ भी! एक बार रमेश ने.. नहीं-नहीं एकबार नहीं, कई बार रमेश ने सुनीता के आगे रंजना की भोपाल में ज़मीन की चर्चा की थी.. रमेश का कहना था… कि रंजना की ज़मीन पर यानी उसके पिता के हक पर उसके चाचा ने कब्ज़ा कर रखा है! रमेश को अपने ऊपर पूरा भरोसा था.. कि वो गुंडे ले जाकर ज़मीन पर से कब्ज़ा छुड़वा लेगा! और फ़िर रंजना का माल उसका! यह बात दर्शनाजी भी जानती थीं.. माँ और बेटा एक ही जैसे जो थे.. दर्शनाजी के कानों में यह बात पड़ने के तुरंत बाद ही ख़ुश होकर उन्होंने रमेश से कहा था..
” चलो ! अगर या बात सही निकलती है! तो इसनें जितने भी पैसे इस छोरी पर ला राखें सैं! सब निकल जांगे!”।
दर्शनाजी रमेश से रंजना की ज़मीन वाली बात सुनकर ख़ुश थीं.. तसल्ली हो गई थी.. माँ को! कि चलो! जितने पैसे मेरे बेटे ने इस लड़की पर लगाए हैं! सब वसूल हो जाएँगे.. सौदा घाटे का नहीं रहेगा!”।
” अगर ये सीधी तरह से नहीं मानी! तो मैं इसे अपने बच्चे की माँ बना दूंगा! फ़िर देखूँगा कहाँ भाग कर जाएगी!”।
रमेश पर लडक़ी को लेकर बुरी तरह से जूनून सवार था।
” Hello! देखिए ! मैं आपको आख़िरी बार बता रही हूँ! आपके हस्बैंड बात नहीं मान रहे हैं! रोज़ मेरे मकान मालिक का दिमाग़ ख़राब करते हैं! आज भी हमारे यहाँ खड़े थे। अगर अबकी बार नहीं माने तो मैं अंदर करा कर ही छोडूंगी!”।
रंजना ने सुनीता को फ़ोन करके बताया था।
वो रास्ते का कांटा जिसके लिए सुनीता रात और दिन परेशान थी.. कब और कैसे निकल गया.. पता ही नहीं चला। रंजना और रमेश की कहानी का अंत जानने के लिए पढ़िये खानदान।