मुझे हर शाम
की तन्हाई में
तुम्हारा चेहरा
दिखने लगा
है माँ!
मेरा बचपन
तुम्हें सोचकर
हर शाम
की तन्हाई
में लौटने
लगा है
माँ
ऐसा प्रतीत
होता है
मानो शाम
को थककर
तुम्हारे पहलू
में फ़िर
एकबार लौट
रही हूँ
मैं
तुम्हारे गुलाब से
कोमल स्पर्श से
एक बार फ़िर
नया होंसला मिलता
है माँ!
कहाँ चली गई
हो..!!
शाम की तन्हाई
में तुम
बहुत याद
आती हो
माँ!
मेरे दिल
की यह आवज़ सुन
फ़िर एकबार चुपके
से मुझसे शाम की
तन्हाई में आकर
मिल जा माँ…!