रामलाल विला में हर सदस्य का दिमाग़ अभी हिस्से को लेकर ही काम कर रहा था.. और घर का हरएक सदस्य जिसमें दर्शनाजी भी शामिल थीं.. रमेश को नियंत्रित करने के चक्कर में और कहीं अच्छी तरह से फ़साने के चककर में घूम रहा था.. ताकि एक हिस्सेदार हमेशा के लिये ख़त्म हो जाए.. और आधा-आधा यानी के विनीत और दर्शनाजी का फिफ्टी-फिफ्टी की हिस्सेदारी हो जाए। सुनीता भली भाँति जानती थी, कि विनीत और दर्शनाजी रमेश को हिस्सा कभी नहीं देंगे.. इसलिये यह लोग रमेश के दिमाग़ को इधर से उधर लगा कर रखतें हैं। फ़िर भी सुनीता के दिमाग़ में बार-बार यही चल रहा था.. कि पहले लड़की रास्ते से हट जाए.. फ़िर थोड़ी आसानी हो जाएगी.. सुनीता को मन में बार-बार यही डर सता रहा था.. कहीं ऐसा न हो! इसका सारा जीवन यूँहीं लड़की के साथ ही निकल जाए। सुनीता दर्शनाजी को लगातार रंजना और उसकी माँ को लेकर चुगली करती ही रहती थी..

“ आप देखना! इसकी माँ में बहुत अक्ल है! ये माँ- बेटियाँ आपसे हिस्सा रखवा कर ही रहेंगी”।

“ यो हमारे पे हिस्सा..!! सुई की नोक के बराबर भी हिस्सा कोनी लें सकें ये हमपे! जान्या!”।

दर्शनाजी का सुनीता की चुगली का हमेशा एक ही दो टूक जवाब हुआ करता था.. कि रंजना और उसका परिवार रामलालजी की संपत्ति में से एक आना भी नहीं ले सकते।

“ पहले यो तो हमसे ले-ले!”।

दर्शनाजी का कहने का मतलब यह था.. कि रमेश का भी हिस्सा उसके ख़ुद के घर में नहीं बनता। विनीत ने फैक्ट्री एरिया से लोहा समेट दिया था, और अब केवल रोज़ का हिसाब-किताब ही रह गया था..जिसमें रमेश का काम चलना मुश्किल हो जाता था.. अपनी समस्या को लेकर रमेश केवल एक ही इंसान के पास दौड़ता था.. वो थीं.. दर्शनाजी! रमेश के पास पैसे ख़त्म होते ही दर्शनाजी परिस्थिति को देखते हुए.. तुरंत ही कोई दूसरा रास्ता निकाल देतीं थीं। अबकी बार भी दर्शनाजी ने कुछ ऐसा ही किया था।

“ इस पुराने डिब्बे ने बेच दे ने!”।

पुराना डिब्बा यहाँ दर्शनाजी मुकेशजी की दी हुई, सुनीता की कार को बोल रहीं थीं। कार को बेचने वाली बात दर्शनाजी ने कई बार दोहराई थी.. जब तक के रमेश के दिमाग़ में पूरी तरह से यह बात फिट नहीं हो गयी थी।

फ़िर क्या हुआ.. क्या बेच दी.. रमेश ने दहेज की गाड़ी.. गाड़ी बेचने के बाद फ़िर कितने दिन काम चला रमेश का! गाड़ी के बाद फ़िर क्या..??

तरह-तरह के दिमागों के रंग और उनके नतीजे जानने के लिये पढ़ते रहिये.. खानदान।

Discover more from Praneta Publications Pvt. Ltd.

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading