कविता !!
रात का अवसान आ चुका है –
नीद किसी कर्ज ही तरह बाकी है !
तंग आ चुका हूँ,
सपनों के खाखों में –
तेरे अंग भरते-भरते !
प्यार का मुकाम तो कई बार आ चुका है !
तेरा आना किसी फर्ज की तरह बाकी है !!
तेरे फूल -से अंगों को ,
सींचा है भावनाओं की –
क्यारिओं में बार-बार !
मंहक तो कई बार आ चुकी है ,
पर प्यार के तराने तू बजता रह –
तेरी तर्ज तो अभी आना बाकी है !!
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कृपाल