सेतू का मामला अभी शान्त न हुआ था.. हर दिन मुकेशजी के परिवार में अब चर्चा का विषय बन गया था। सुनीता का दिमाग़ पूरी तरह से पैक हो गया था.. पता नहीं क्यों सुनीता के दिमाग़ में अब नए विचारों के घुसने की जगह ही न बची थी.. सब कुछ सामने दिखते हुए भी सही और गलत पता ही नहीं लगा पा रही थी। क्या बात हो सकती थी.. एक तरफ़ तो रमेश सुनीता को पसन्द ही न था.. उसमें केवल कमियाँ ही नज़र आया करतीं थीं.. तो फ़िर छोड़ दिया होता रमेश को! किसने कहा था, ज़बरदस्ती इस रिश्ते को घसीटने के लिये। दो तरफ़ा दिमाग़ लेकर चल रही थी.. सुनीता.. और दो तरफ़ा ही नहीं कई तरफ़ा दिमाग़ हो चला था.. सुनीता का। अगर किसी रिश्ते को आप पूरी ईमानदारी नहीं दे सकते तो उसे छोड़ देना ही बेहतर होता है। अब देखा जाय तो सेतू का आना भी यही दिखा रहा था, कि रमेश को सुनीता पसन्द नहीं आयी है। अपनी-अपनी तरह की परेशानी दोनों ही पक्षों के साथ थी.. फिर निर्णय क्यों सामने नहीं आया था। खैर! जो भी हुआ.. एक बार फ़िर इसी नाटक के चलते रमेश का सुनीता के लिये फ़ोन आया था.. आदमी शातिर दिमाग़ था.. जानता था, सुनीता एकदम बेवकूफ़ है.. उसके परिवार में उसको लेकर कौन क्या सोच रहा है… आसानी से बता देगी.. और रमेश आराम से आगे की इनफार्मेशन अपनी माँ को देगा.. फ़िर माँ-बेटा मिलकर आगे की प्लांनिंग करेंगें। फ़ोन आया था,” अरे! क्या करूँ मैं! ये हमारे घर में बिल्ली पड़ी है! न! ये सब कुछ करवा रही है!”।

रमेश सुनीता से बिल्ली शब्द रमा के लिये कह रहा था। अब ये बिल्ली कहाँ से बीच में आ गई थी.. पता नहीं। खैर! दर्शनाजी भी रमेश के साथ ही खड़ीं थीं। आदत अनुसार रमेश ने सुनीता से कहा था,” ले फ़ोन अम्मा से बात कर ले!”।

दर्शनाजी तो फ़ोन अपने कान पर लगाकर आदत अनुसार मौके के हिसाब से नाटक करने को तैयार खड़ीं थीं। सुनीता ने हाथ में फ़ोन लिया था.. सीधी-भोली और एकदम संस्कारों में लिप्त होकर सुनीता ने बातचीत शुरू कर दर्शनाजी को रमेश के साथ दिल्ली आने के लिये कहा था,” अम्माजी आप को रमेश के साथ दिल्ली आना पड़ेगा.. आप से सभी बात करना चाहते हैं”।

“ कैसे आऊँगी मैं बेटा! दिल्ली मेरे पैर में बहुत दर्द रहता है.. मेरे से झुकाया नहीं जाता”।

दर्शनाजी का दिमाग़ आगे तक की सोच कर बहुत तेज़ काम करता था.. इसलिये सुनीता की बात सुनते ही फटाक से बेवकूफ बना डाला था, सुनीता को। यह सब बातें वहीं बैठकर अनिताजी भी सुन रहीं थीं.. सुनीता के फ़ोन रखने के बाद उन्होंने सुनीता को एक अलग ढँग से समझाते हुए कहा था,” लोगों की बातों में आना बन्द करके अपने आप को पहचानना सीखो! सुनीता बनो! जिस में खुद की कोई बात हो! ये लोग गलत हैं.. एक कदम आगे बढ़ाने में कोई हर्ज़ नहीं है”।

माँ की बात अच्छी लगीं थीं.. सुनीता को। पर न जाने क्यों अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं हो पा रही थी.. उलझी हुई सुनीता अपने-आप को खो कर कहीं और ही गुम हो गई थी.. ये सुनीता ब्याह से पहले वाली सुनीता न थी.. जो आत्मविश्वास से परिपूर्ण हुआ करती थी। खोई हुई सुनीता ने रमेश और दर्शनाजी जैसे शातिर दिमाग़ लोगों को पता नहीं क्यों जीतने दिया था। मन ही मन हँसते थे.. माँ-बेटा! चलो! बढ़िया बेवकूफ़ से पाला पड़ा है।

फ़ोन-वोन पर भी बातचीत हो चुकी थी.. हर तरह से सेतू का मसला लिया जा चुका था.. अब सारे तमाशे होने के बाद रमेश सुनीता को लेने इंदौर से आ रहा था। रमेश के आने से पहले एक बार फ़िर सुनीता का परिवार शामिल होकर इस मसले को सुलझाने बैठा था। मुकेशजी ने सुनीता से सवाल किया था,” एक बात तू मुझे ईमानदारी से बता.. बेटा! क्या! तुझे रमेश ने ब्याह के बाद से आज तक कोई तोहफ़ा दिया है!”।

“ नहीं पिताजी!”। सुनीता का जवाब था।

“ तू उसी घर में फ़िर क्यों जाना चाहती है! जहाँ तुझे देने के लिये कुछ भी नहीं है। जो तू यहाँ से कपड़े-लत्ते बाँध कर ले जाती है.. वही तू वहाँ से पहन कर आ जाती है.. दो रोटी तुझे मैं भी खिला सकता हूँ, यहाँ बैठा कर.. वहाँ मत जा!”। मुकेशजी ने एक बार फ़िर अपने ढँग से सुनीता को समझाने की कोशिश की थी।

पिता की सही बातों को समझते हुए.. क्यों नहीं अमल करना चाह रही थी.. सुनीता! कौन सा डर अन्दर ही अन्दर लगातार परेशान कर रहा था.. सुनीता को!

“ तुम लोगों को कैसा महसूस होता है.. जब रमेश हमारे यहाँ आता है!”। सुनील ने बाकी के सदस्यों के आगे अपना सवाल रखा था।

“ अजीब सा!”। सभी सदस्यों का एक स्वर में जवाब था।

आख़िर अजीब क्यों महसूस करते थे.. घर वाले रमेश के सामने आते ही.. आख़िर इस घर का दामाद था भई!।

रमेश का व्यव्हार सामान्य न होकर बेहद बनावटी था, और भाषा में मधुरता न टपक कर घमंड और खोखलापन झलकता था.. जो कुछ है ही नहीं उसे दिखाने के चक्कर में रमेश सबको खलता था। एक खोखलापन और झूठी बनावट ही रमेश को सबसे दूर खींच रही थी

“ अरे! ओहो! आप भी आएँ हैं!  अच्छा! अच्छा! “।

ये कौन आ गया था.. किसके शब्द किस पर थे।

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