भोर का तारा -नरेन्द्र मोदी !!
महान पुरुषों के पूर्वापर की चर्चा !!
उपन्यास अंश :-
मैंने पाल पुरोहित को एक नए संबोधन से पुकारा था . मैंने उन्हें अपना दादा मान कर ‘दादा जी’ की उपाधि दे दी थी . बहुत प्रसन्न हुए थे , वे ! अब तक का पूरा का पूरा संचित दुलार, प्रेम और सौहार्द -सेवा उन्होंने अपने पोते – माने कि मैं , पर निछावर कर दी थी !
विचित्र मिलन था – हम दोनों का …..?
“बिलकुल तुम्हारी ही उम्र थी मेरी ….जब मैं गाँव से भाग कर …कलकत्ता चला आया था ! स्कूल छोड़ कर …..घर-बार छोड़ कर ….गाँव -प्रान्त छोड़ कर मैं ….आज़ादी के एक दीवाने की तरह …कलकत्ता भाग आया था !!”
“पर …दादा जी …..” मैं प्रश्न करना चाहता था .
“पर – नहीं , प्रिय बेटे ….! वो वक्त बड़ा बलवान था ! फिजा पर कुर्बानियों का अमंगल झूम-झूम आया था ! दीवानगी के गीत …मात्रभूमि की स्तुति …और देश भक्ति के गीत …विरोध और प्रतिरोध के वक्तव्य ….सब हवा पर लहराता रहता था ! हम सब के दिमाग में एक ही बात घर कर गई थी – अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल कर ही दम लेना ….!!”
“क्यों ….?”
“क्यों कि ….अंग्रेजों ने जो बंगालियों के साथ विश्वासघात किया था …जो बंगाल का विभाजन कर …हिन्दू-मुसलमान में आपसी फूट डाल कर ….’डिवाईड एंड ….रूल ‘ का फार्मूला अपनाया था …वो अब जनता की समझ में समा गया था ! लोग समझ गए थे कि अंग्रेज किसी के भी सगे न थे ! न किसी के मित्र थे ….और न ही किसी के शुभ चिन्तक थे ! शाशक थे ….और उन का उद्देश्य भारत पर शाशन करना ही था ! उन्हें धन कमाना था …और देश को पूर्णतया गुलाम बनाना था !! हथकंडे – जो अंग्रेज अपना रहे थे ….वो अब लोगों की निगाह के नीचे आ गए थे . कुछ भी छुपा न रहा था ! जिस तरह से अंग्रेजों ने दमन नीति का निर्माण किया था …उस से तो साफ़ ज़ाहिर था कि हम …उन के गुलाम थे …उन के कोड़े खाने के लिए थे ….बेगार भुगतने के लिए थे …जुहार -सलाम बजाना ही हमारी नियति थी ….और साहिब के सामने पड़ना तक …हमारे लिए जुर्म था ! और पुलिस के किए अत्याचारों ने तो नाक में दम कर दिया था ….!!”
“फिर …..?” अब मैं ध्यान मग्न हो कर अपने दादा जी को सुन रहा था .
“बम ….बना ….!!” उन्होंने कान खड़े करने वाली सूचना दी थी . “देश बन्धु क़ानूनगो ने ….बम बना दिया था ! पहला टारगेट …बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के …मजिस्ट्रेट……किंग्स फोर्ट को बनाया गया था !”
“क्यों ….?”
“इसलिए कि वो …हरामजादा था ! उस ने लोगों का जीना हराम कर दिया था !! रात-रात वो पुलिस की गस्त लगा कर …निरपराध लोगों को उठवा लेता था . नाम होता था ‘स्वराज़ी’ ….और जो भी धरपकड़ में फंस गया – सो तो गया ….!! और फिर उस के जुल्म ढाने के तरीके भी तो विचित्र ही थे ! रूहें कांपती थीं ….उस के नाम से ….!!!”
“मरा ….वो ….?”
“नहीं ….! बच गया था ….!! खुदी राम बोस और …प्रफुल्ल मणि ने …यूरोपियन क्लब से जाती …उस की बग्घी पर …बम मारा था ! बग्घी तो उड़ गई थी ! सब जल-भुन कर राख हो गया था . लोगों के हर्ष का ठिकाना न था ! प्रसन्नता के पारावार हवा पर लहरा उठे थे !! पर …….”
“पर …..?”
“पर ….बाद में पता चला था कि ….मरने वाली दो औरतें थीं . बैरिस्टर कैनेडी की पत्नी ….और उस की बेटी की मौत हो गई थी !! “
“फिर ….?”
“फिर क्या ….? फिर तो कहर ही बरपा था !! अंग्रेजों ने पूरी जान झोंक कर गिरफ्तारियां कराईं थीं ! अरविंदो घोष ….और उन के बड़े भाई …वरिन्द्र कुमार घोष समेत ….सैंतीस लोग पकडे थे ! अलीपुर सैशन कोर्ट में केस चला था ! जैसे कुंभ का मेला था – इतनी भीड़ थी ! अंग्रेजों ने भी ऐतिहात तो बरता था …! उन का पूरा -का-पूरा तंत्र एक जान था ! टेलीग्राम का अनुसंधान तब हो चुका था ! वह सब एक जुट थे ….एक जान थे …..और हम …..?”
“अलग-अलग थे …..बंटे हुए थे …..?” मेरा प्रश्न था .
“हाँ ! मान लो !! फिर भी ….जनता अब हमारे साथ थी ….! सहादत देनेवालों के क़त्ल तक हुए थे ….पर केस थमा नहीं था ! प्रफुल्ल मणि ने आत्महत्या कर ली थी . खुदी राम बोस पकडे गए थे . अरविंदो जेल में थे . खुदी राम ने सजाए मौत स्वीकार ली थी ….और ….”
“और क्या-क्या हुआ था , दादा जी ….?”
“वन्दे मातरम ……! हाँ,हाँ ! खुदी राम बोस ने ही तो वन्दे मातरम का नारा दिया था …..और फांसी झूल गया था …..!!” दादा जी रोने लगे थे .
“वन्दे मातरम् …..!!” मैंने पुकारा था ….और अपने दादा जी के आंसू पौंछ दिए थे !!
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श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!