चहेरे पर मुस्कुराहट आ जाती है, जब याद आता है वो दिन जब यह छोटा नन्हा सफ़ेद गुलाब का फूल हम घर लाए थे, आ गई न वो ही संसकारो वाली बात …मन नहीं था पर बच्चों की ज़िद्द पर लेने चले गए थे। डॉक्टर के पास… भोपाल का बहुत नामी डॉक्टर जो हर ब्रीड के बारे में नॉलेज रखता है… मैने तो कह दिया था देखने में अच्छी नहीं हुई तो नहीं लाएंगे.. डॉक्टर को पहले ही बता दिया था कि स्त्रीलिंग चाहिए। गाडी में सोचते हुए जा रही थी कि पता नहीं कैसी ऑर्डर की होगी..ठीक-ठाक नही लगी तो ऑर्डर कैंसिल कराकर घर वापिस—गाडी का रूकना और हमारा डॉक्टर की क्लीनिक पर पहुँचना था..फाटक से उतरकर अन्दर गई थी मैं,.. ओह! दरवाज़े पर पहुचंकर जो देखा क्या बताऊ… सफ़ेद छोटा सा प्यारा गुलाब..गोल मटोल छोटे से पिंजरे में..डॉक्टर के कम्पाउण्डर राजू के साथ खेल कूद में वयस्त… बस वहीं दिल दे बैठी थी।
गोद में लेकर गले से लगा लिया था। वो आत्मिक स्पर्श जो आज तक मुझे याद है,जैसे जानवर को नहीं मैने अपने तीसरे बच्चे को अपनाया हो , चहेरे को पुचकार कर गोद में भरकर घर ले आये थे… गाड़ी में बैठते ही शरारतें शुरु हो गईं थीं महरानी जी की…छोटा सा मुँह निकालकर इधर-उधर कूदना औऱ झाँकना कन्ट्रोल में नहीं आ रही थी…शरारती कहीं की।
नाम हाँ.. नाम क्या रखूं… पूरा चेहरा गौर से देखने के बाद मेरी नज़र कानो पर गयी …झुके हुए प्यारे से छोटे-छोटे कान मानो पेपर कटिंग से बनाये गए हों..आधे सफेद और हल्के सुनहरे बस! फिर क्या था… मुँह से निकल गया..कानू! सफेद शरीर, हल्के सुनहरे और सफेद कानो वाली मेरी कानू
आज तुम्हारा पहला दिन था….टोकरी में बिस्तर लगा दिया था… प्यार सा बेबी घर आकर सो गया था… अब यही टोकरी तुम्हारा बेडरूम थी……