सूरज निकलने से बहुत पहले राम चरन जग गया था।

ढोलू शिव मंदिर के परिसर में वह अकेला निफराम डोल रहा था। उसकी पैनी निगाहें ढोलू शिव मंदिर की महानता को बड़े गौर से देख रही थीं। लिखा – ढोलू शिव की मूर्ति अष्ट धातु की बनी थी। इस मंदिर को सम्राट विक्रमादित्य ने बनवाया था। शिव की स्थापना कब हुई इस बारे में भिन्न-भिन्न मत थे। लेकिन ढोलू शिव मनोकामना पूरी करते थे – यह सर्व मान्य सच था।

“क्या आप मेरी मनोकामना भी पूरी करेंगे?” राम चरन ने मूक प्रश्न पूछा था और वह हंस गया था।

मंदिर के पीछे बगीचा था। छायादार पेड़ उगे थे। पेड़ पुराने और विशालकाय थे। उनकी गहरी छाया का लोग खूब आनंद लूटते थे। बगीचे के बीचों-बीच से एक गुप्त सुरंग थी। ये सुरंग मंदिर के नीचे बने तहखाने तक जाती थी। राम चरन का मन तो था कि सुरंग के भीतर जाता लेकिन वो डर गया था।

तनिक से फासले पर बनी बावली थी। राम चरन बावली की भव्यता को देख दंग रह गया था। इतनी सुंदर संरचना वह पहली बार ही देख रहा था। तीन मंजिला थी बावली। हर मंजिल का एक मतलब था। अंत में पानी से भरा तालाब था – निर्मल जल से लबालब भरा तालाब! पेड़ों के प्रतिबिंब तालाब में प्रहरियों की तरह तैनात थे।

राम चरन का मन तालाब में नहाने का बन आया था।

डरते हुए राम चरन ने आस पास को परखा था। सब कुछ शांत था। वहां दो चार चिड़ियों के सिवा और कोई न था। राम चरन बावली की सीढ़ियों पर बैठ गया था। पवित्र जल से भरा जलाशय उससे बतियाने लगा था।

“तुम तो बहुत बड़े तैराक हो!” जलाशय ने जैसे उसे पहचान लिया था। “आओ! लगा दो छलांग!”

और स्विमिंग सूट में सजावजा राम चरन एक ऊंची – बहुत ऊंची मीनार से गहरे समुद्र में डाइव मार रहा था। तालियां बज उठी थीं। जय जयकार हो रहा था। इनाम इकरार बंट रहे थे। उसकी प्रशंसा के पुल बांधे जा रहे थे और अचानक ही वह विजेताओं की कतारों में आ खड़ा हुआ था।

“ए पार्ट ऑफ लाइफ!” राम चरन होंठों में चुपके से बुदबुदाया था।

तभी आसमान पर उग आया सूरज उसे सलाम ठोक बैठा था।

“क्या करूं?” राम चरन ने स्वयं से प्रश्न पूछा था। “नहा लेता हूँ!” कहते हुए उसने अपने जर्जर कपड़े उतारे थे और सीढ़ियों पर रख तालाब में मछली की तरह कूद गया था। एक लंबे अंतराल के बाद आज फिर उसकी मुलाकात हुई थी – मित्र पानी से! खूब तैरा था वह। लेकिन तभी उसके दिमाग में खतरे की घंटियां बज उठी थीं!

राम चरन ने झटपट अपने मैले कुचेले कपड़ों से शरीर पोंछा था और कपड़े पहन मंदिर में लौट आया था।

एक दक्षता के साथ राम चरन ने मंदिर को झाड़ा पोंछा था। हर चीज को ठीक ठिकाने पर रक्खा था। धूप दीप जलाए थे। अगर बत्तियां सुलगाई थीं। मंदिर की घंटियां बजा कर उसने साधु स्वर सुने थे और ढोलू शिव की वंदना की थी।

अब राम चरन को पंडित कमल किशोर के आने का इंतजार था।

लेकिन चलते फिरते लोग मंदिर को खुला देख दर्शन लाभ के लिए चले आ रहे थे। लोग पुजापा चढ़ा रहे थे। राम चरन को प्रणाम कर रहे थे। कुछ लोग तो उसके चरण स्पर्श के लिए भी झुके थे लेकिन राम चरन ..

आज की होने वाली घटनाओं का अब राम चरन को बेसब्री से इंतजार था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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