
गहराते जा रहे थे – सावित्री के गम !
“उस की मांग अटपटी है, संभव .” रौनक बता रहा था . “उसे …सुकुमार …सुंदर …कोमल …और प्रशिक्षित लडके चाहिए ! वह चाहता है कि …. …..” रौनक ने संभव की आँखों में देखा था . संभव चकित था . “वह चाहता है कि ……”
“तुम उसे अरेस्ट क्यों नहीं करते ….?” संभव ने जोर दे कर पूछा था . “यह जानते हुए भी कि …..ये आदमी ……?”
“ये आदमी ….पूरे विश्व का गुरु है !” मुस्कराया था , रौनक . “तुम भी तो जानते हो कि लोग किस कदर इस के पैरों पर पड़े रहते हैं …? धन के ढेर पर बैठा है . तुम जितना कहो …….”
“लेकिन …तुम ….?” संभव ने बात पलटी थी . “मैं जिस रौनक को जानता हूँ ….वह रौनक तो …..?”
“तुम्हारा मित्र था ….!” हंसा था , रौनक . “अब तो तुम एक जिम्मेदार पुलिस ऑफिसर से बातें कर रहे हो . देखो, संभव् ! मैंने ….महकमे में आ कर कई बार …उंगलियां जला लीं थीं . टक्कर ले ली थी ….! सच के साथ खड़ा हुआ था . पर नतीजा ……..”
“नतीजा ……?” संभव पूछ रहा था .
“जेल जाते-जाते बचा !” रौनक सहज हो आया था . “अब मुझे …..दलदल में तैरना आ गया है ….अब मैं …..आग और पानी दोनों पर …ब-खूबी चल लेता हूँ . अब मैं …..वर्दी उत्तरने के बाद ….रौनक होता हूँ ….! कभी मिलो ……”
“मुझे भी गोता मार कर मछली पकड़ना ……बड़े दिन में आया , मित्र !” संभव ने स्वभावत अपनी डींग मारी थी .
“यह मछली ….?” रौनक का प्रश्न था .
“नहीं ! यह मछली नहीं है !” संभव संभला था . “सावित्री …..एक सती-नारी का नाम है, रौनक ! कभी मिलोगे तो …जान जाओगे ….कि …”
“अभी क्या चाहिए ….?” रौनक ने बात काटी थी .
“थोड़ी सी शिफारिश ….! इंस्पेक्टर रमेश को इशारा कर दो कि ….”
“कर दूंगा !” रौनक ने वायदा किया था . “लेकिन मेरा काम ….?”
दोनों मित्र ….आज एक लंबे अंतराल के बाद आमने-सामने खड़े थे . हार-जीत का वही मुकाबला आज भी दोनों के बीच खड़ा था . दोनों आज भी अपराधों के ही आमने-सामने खड़े थे ….लड़ रहे थे …..जूझ रहे थे ….! लेकिन अपराध थे कि ….असंख्य होते ही जा रहे थे !
“करूंगा ….!” संभव ने स्वीकारा था . “विचित्र संसार है , यार !” संभव ने हाथ झाडे थे . “जिसे न देखो ….वही भला !” वसः हंस रहा था . “आज शाम को रमेश को ……सावित्री दीदी के घर भेज देना .” संभव ने अपना पक्ष संभाला था .
“तुम ……..” रौनक लरज़ आया था . “काम की चीज़ हो , तुम ….!” उस ने संभव की प्रशंसा की थी .
न जाने क्यों संभव को लगा था कि …..कलकत्ता माँ की गोद जैसा था ! यहाँ आ कर वह बहुत ही सुरक्षित महसूस करता था . उसे कोई न कोई मदद मिल ही जाती थी . उसे कभी लगता ही नहीं था कि ….कलकत्ता आ कर उस ने कोई भूल की हो . जब कि बाहर की दुनियां ……विचित्र थी ! ढोंग था ….फरेब था …..छल था …….स्वार्थ था ….और ….और भी …….
“और पारुल भी तो है ….?” उस के कान में चुपके से प्रश्न कूदा था . “तुम्हारी ….अमर ….अभीष्ट ….., पारुल !!” वह सुन रहा था . “अब तो ….महारानी …..राजमाता …..राजरानी ……बनने के स्वप्न पर सवार है ! एक राज-तंत्र का निर्माण करने की ठान ली है , पारुल ने . काम-कोटि को एक साम्राज्य का नाम देना है …एक संज्ञा देनी है ….बहुत बड़ी संज्ञा ….जिसे लोग जानें ….ज़माना जाने ….और मानें कि वो सब पारुल का ही है ….!”
“पागल है !” हंस गया था , संभव . “सी …इज मैड …. !!” उस ने प्रतक्ष में कहा था . .! “उस मूर्ख …घोड़े – राजन पर सवार हो कर तो वह ….शहर से बाहर भी न जा पाएगी ….!!”
“कहाँ हो ……?” सावित्री ने संभव को फोन पर पकड़ा था . “थक गई हूँ, संभव !” उस ने शिकायत की थी . “अकेली जान …..और …इतना बड़ा तूफान ….!”
“पहुँच रहा हूँ , दीदी !” संभव का उत्तर था . “आप के काम में ही उलझा था . ” उस ने कहा था .
“चलो, कोई तो है …..जो मेरा है ….!” एक लंबी निस्वांस ली थी , सावित्री ने . “सच, संभव ! लगता है कि ….मेरा तो जनम ही बिगड़ गया ….!”
“निराश क्यों होती हो , दीदी ….? मैं हूँ , न ! सब ठीक हो जाएगा …..” संभव ने दिलासा दिया था . “राजन नहीं लौटा ….?” उस ने प्रश्न पूछा था .
“नहीं ….!” सावित्री ने बताया था . “शायद ………”
“नहीं लौटेगा …..!” संभव ने स्पस्ट कहा था . “गीदड़ है ….!!” संभव तनिक असहज हो आया था . “अब पारुल को नोच-नोच कर खाएगा ….!” वह कह रहा था . “ब्लाडी …स्वाइन ……!!” गलियां दे रहा था , संभव .
न जाने क्यों राजन को गरियाता संभव आज सावित्री को बहुत अच्छा लगा था . सावित्री को लगा था – कि उस का भी एक भाई था !
संभव और रमेश दोनों ही आज सावित्री को पराए नहीं लगे थे .
दिमाग पर धरा राजन का आतंक हिला था …दुला था ….और ..ढह गया था . सावित्री को लगा था कि उस के पक्ष को समर्थन देने उस के दो भाई आज उस के घर आए थे ! अकेली संतान थी वह -सेठ धन्ना मल की . उसे कभी बहिन-भाइयों का साथ और समर्थन मिला ही कब था ? हमेशा से वह भूखी निगाहों से औरों में ही सहारे खोजती आ रही थी .
“तुम्हारा मन पसंद नाश्ता ….” सावित्री ने विहंस कर कहा था . “गरम -गरम …कचौड़ियाँ …..आलू की हींग वाली सब्जी ….रायता और ……”
“मुझे भी बहुत पसंद है , दीदी !” रमेश चहका था . “मेरी माँ भी ……”
“मारवाड़ी हो ….?” सावित्री ने सीधा प्रश्न किया था .
“जी,जी …हाँ …!” हंसा था , रमेश . “खूब पहंचाना , आप ने !”
“भाई हो ! बहिन न जानेगी तो कौन जानेगा …?” सावित्री ने मुक्त कंठ से कहा था .
हवा में एक अजीव-सा एका सिमिट आया था . प्राणियों की परख जब मिल जाए तो मान लो कि उन के पूर्व जन्म के संस्कार होंगे !
“आप के मदन-गोपाल कैसे हैं , दीदी ….?” संभव ने बात मोडी थी .
“कृपालू हैं ….दयानिधान हैं …..महरवान हैं ….!” सावित्री भक्ति-भाव से भरी थी . “इन के चरणों में आ कर …परम-शान्ति पा लेती हूँ, संभव ! वरना …तो …..न जाने मेरा क्या होता ….?” सावित्री ने खुले आसमान को निहारा था . “तुम से एक विनती और करूंगी . पारुल …को ….”रुकी थी, सावित्री.
“वो तो महारानी बन गई , दीदी !” संभव कहना तो चाहता था पर रुक गया था .
“ये आदमी नदी में क्यों कूदा ….?” रमेश का प्रश्न था . वह अचानक पूछ बैठा था . सावित्री अभी तक उत्तर देने के लिए तैयार न थी . वह तनिक घबरा गई थी . “बिना किसी कारण के तो कोई यों …छलांग लगाने से रहा ….?” रमेश ने सावित्री को निहारा था .
“पारुल को पकड़ने के लिए ….राजन ….ने …..”
“क्या पारुल नदी में डूब रही थी ….?”
“नहीं …! उस की परछाईं ……पानी में तैर रही थी …..! राजन का कहना है कि वह …पारुल के लिए ….पागल हो गया है ! उस की परछाईं को पकड़ने के लिए ….उस ने ….”
“कहाँ, दीदी ….?” रमेश हंसा था . “ये तो नहीं चलेगा .” उस ने अश्वीकार में सर हिलाया था . “आप तो जानते हैं कि ….क़ानून अँधा है ….बहरा भी है ….और बिलकुल बेकार है ! बिना गवाह-सबूत के ….फ़ाइल नहीं चलती .” रमेश ने सामने रखी अपनी फ़ाइल को निहारा था . “इस का पेट पतोहर से नहीं भरता , दीदी ! ठोस सबूत चाहिए . राजन ……”
“राजन तो यहाँ नहीं है …..” सावित्री ने बताया था .
“आने दो …! तब तक ….! तब तक जांच जारी रहेगी .” रमेश ने कहा था . “लेकिन हमारा वायदा है ,. दीदी कि ….हम ….!” उस ने कुछ सोच कर कहा था . “परछाईं पकड़ने के लिए …कोई नदी में कूदेगा , भला ….?” रमेश का अंतिम प्रश्न था .
सावित्री की त्योरियां चढ़ गईं थीं . उस ने महसूसा था कि राजन ने उसे फिर एक बार ….फँसा लिया था !
फिर से अकेली हुई सावित्री को अपने बाबू जी के स्वर सुनाई देने लगे थे .
बाबू जी ….सेठ धन्ना मल अपनी ऐनक के ज़रिए बारीक-से-बारीक सच को समझ लेते थे ! उन्हें सब कुछ दिखाई देता था . सब कुछ सुनाई पड़ता था . यहाँ तक कि अबोले भाव भी वह ताड़ जाते थे . तभी तो बाबू जी ‘राजन’ का मात्र नाम सुन कर कसक गए थे .
“एक ….जौकी से …..?” उन का वही प्रश्न आज फिर सामने था .
“जौकी छोटा होता है , क्या ….?” सावित्री का भी प्रश्न था .
“बड़े-छोटे पैदा होते हैं , बिट्टो ! बनते नहीं . राजन कभी बड़ा होगा ही नहीं .”
सच था . राजन जहाँ था ….वही खड़ा था …! राजन ……एक कदम भी तो आगे नहीं चला था ! राजन अब गोटें अवश्य खेलेगा . पुलिस को क्या-क्या बयान देगा – कौन जाने ….? अभी तक तो उस के लौट आने तक की संभावना न थी . पारुल की परछाईं पकड़ने ….नदी में कूदना कोई तर्क-संगत …तथ्य न था . सावित्री संभल गई थी …..! हो सकता था ….कि राजन ने उसे यों ही बताया हो ….और हो भी सकता था कि ….नदी में छलांग लगाने की घटना ….
“पुलिस तो पूरी छान-बीन करेगी …!” सावित्री की समझ में आ गया था .
मामला सेठ धन्ना मल की बेटी और उस के प्रेमी के बीच की बात को ले कर था ….!!
गहराते जा रहे थे – सावित्री के गम ….!!!
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श्रेष्ट साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !