“मैं और नहीं चल सकती धीरज।” नब्बो ने करुण गुहार लगाई थी। “देख। देख पैरों में कैसे मोटे-मोटे छाले पड़ गए हैं।” नब्बो की आंखें भर आई थीं।
धीरज ने मुड़ कर नब्बो के पैरों का जायजा लिया था। दोनों पैर मोटे-मोटे छालों से भरे थे। उसका हिया पसीज गया था। वह हैरान था। नब्बो को यों भगा कर ले जाना अब उसे महज एक बेवकूफी लगी थी।
“चलते हैं नब्बो।” धीरज ने नब्बो की बांह गही थी। “लोग हमारा पीछा कर रहे होंगे। हो सकता है पुलिस भी हमारी तलाश में हो।” धीरज ने नब्बो को खतरों के बारे बताया था।
नब्बो का चेहरा बिगड़ गया था। रो पड़ी थी नब्बो।
“चल। मैं सहारा देता हूँ। किसी तरह सड़क तक तो पहुंचना ही होगा नब्बो।” धीरज ने अंतिम इलाज बताया था।
और अब नब्बो का हाथ धीरज के कंधों पर था। वह जैसे-तैसे चल रही थी। कराह रही थी। सुबक रही थी। लेकिन धीरज उसे खींचे चले जा रहा था।
अचानक तालियां बज उठी थीं। शूटिंग देखते दर्शक नब्बो की एक्टिंग से द्रवित हो उठे थे।
“मारवेलस, प्रतिष्ठा जी।” राधू रंगीला ने प्रतिष्ठा की एक्टिंग की प्रशंसा की थी। “ओर मानस जी।” राधू मुड़ा था। “वो डायलॉग – हमारा प्यार नब्बो, आप चाट गए?”
“ओ हां। गलती हो गई भाई जी।” मानस ने मान लिया था।
“पैक अप।” राधू रंगीला का आदेश आया था। “सड़क पर पहुंचें।” उसका आदेश था।
सड़क के एक किनारे पर बैठी नब्बो बेदम हुई छालों से भरे पैरों को देख रही थी। धीरज खाली-खाली सड़क को मारक निगाहों से देख रहा था। तभी उसे एक ट्रक आता दिखाई पड़ा था। वह बीच सड़क पर दोनों हाथ ऊपर उठाए आ खड़ा हुआ था। ड्राइवर ने जोरों के ब्रेक लगाए थे। ट्रक एक झटके के साथ रुका था। सैकिंड ड्राइवर कूद कर ट्रक से बाहर आया था।
“अबे। कहीं और जा कर आत्म हत्या कर।” सैकिंड ड्राइवर रोष में था। “हमें जेल क्यों भिजवाता है।” उसका उलाहना था।
“नहीं भाई।” धीरज ने कांपते कंठ से कहा था। “वो … वो देख1” धीरज ने नब्बो की ओर इशारा किया था।
“वो …!” सेकिंड ड्राइवर का सुर बदला था। “वो … तो …?” वह नब्बो को देखता ही रहा था।
अब ड्राइवर और हैल्पर भी नीचे आ गए थे। तीनों नब्बो के हुस्न को देख बेहोश होने को थे। फिर तीनों ने एक दूसरे को देखा था।
“इसे तो ले जाएंगे – फ्री।” सैकिंड ड्राइवर बोला था।
“मैं नहीं जाऊंगी अकेली।” नब्बो जोरों से रो पड़ी थी।
“चल यार। एक के साथ एक फ्री।” ड्राइवर हंसा था। “ले चलते हैं इसे भी।”
“कहां जाएगा?” हैल्पर ने पूछा था।
“कहीं भी …” धीरज का उत्तर सुन तीनों सकते में आ गए थे।
“बिलकुल पागल है क्या?” ड्राइवर ने पूछा था।
“तुम कहां जा रहे हो?” धीरज ने पूछा था।
“हैदराबाद।” हैल्पर बोला था।
“ले चलो हमें भी हैदराबाद भाई।” धीरज विनम्रता पूर्वक बोला था।
बात बन गई थी।
सिनेमा को ले कर राधू रंगीला का अपना एक अलग फंडा था। वह अपने दर्शकों को देश और दुनिया से जोड़ना चाहता था।
मनाली से ले कर हैदराबाद तक के देश दर्शन के लिए राधू रंगीला ने मुकम्मल तैयारियां की थीं। एक ट्रक था – मालवाहक जिस पर एक हैल्पर, एक सैकिंड ड्राइवर और एक मास्टर ड्राइवर तैनात थे। तीनों फिल्म जगत के जाने माने कैरैक्टर एक्टर मनोहर, महाजन और मुरारी थे। गंजा, लंगड़ा और पल्टू तीनों अपने-अपने फन में माहिर थे। नब्बो और धीरज को ट्रक में लिफ्ट दे कर हैदराबाद ले जाना उनका काम था।
उनके पीछे-पीछे चलती शूटिंग वैन थी। वैन में कैमरे फिट थे और हर प्रकार की शूटिंग सुविधा लगी थी। शूटिंग क्रू को वैन में रह कर मनाली से लेकर हैदराबाद तक पूर्व निर्धारित शूटिंग साइट्स पर कहानी को फिल्माना था।
राधू रंगीला को प्रतिष्ठा और मानस के साथ कार से कॉनवॉई के साथ आना था।
मालवाहक ट्रक में गंजा, लंगड़ा और पल्टू अब नब्बो और धीरज को छुपा कर हैदराबाद ले जाने का जुगाड़ बना रहे थे।
“आराम से …। आराम से चढ़ो भाई जी।” नब्बो को सहारा गंजा दे रहा था। “हम किस लिए हैं?” उसने अपना कंधा आगे किया था। “रकखो पैर।” वह हंसा था।
और जब नब्बो ने गंजे के कंधे पर पैर रक्खा था तो धीरज की त्योरियां चढ़ गई थीं।
“दोनों आराम से रहना।” ड्राइवर पल्टू आदेश दे रहा था। “दुनिया देखने के लिए खिड़की है, लेकिन तुम्हें जब तक हम न कहें दिखना नहीं।” उसने हिदायत दी थी। “पुलिस को परछाईं भी दिख गई तो फिर हम सबकी खैर नहीं।”
धीरज सतर्क था। वह जानता था कि उन तीनों की नजर नब्बो पर थी।
माल वाहक ट्रक में घोंसले के मानिंद बने उस ठिकाने में जब नब्बो और धीरज सट कर साथ-साथ बैठे थे तो दोनों के मन प्रसन्न हो गए थे। शरीर की गर्मी ने सब कुछ गरमा दिया था।
“ओ माई गॉड।” धीरज नहीं ये तो मानस था जो आहें भरने लगा था।
“ओह हैवन्स।” नब्बो नहीं प्रतिष्ठा थी जो आद्र हो आई थी।
लेकिन दोनों का ये मिलन इस प्रेम कहानी में प्रासंगिक न था। लेकिन मिलना तो था।
“यू आर माई एक्सीलेंट ड्रीम।” मानस ने संवाद बोला था।
“यू आर ए ड्रीम सुपर्ब।” प्रतिष्ठा का उत्तर था।
बात बनने को थी। लेकिन गंजे ने सारा गुड गोबर कर दिया था। खड़खड़ा कर हिला दिया था घोंसला। फिर जोरों से बोला था – मौज में तो हो?”
“हां-हां। हम ठीक हैं।” नब्बो और धीरज एक स्वर में बोले थे।
पूर्व निर्धारित दस ठिकानों पर हैदराबाद तक शूटिंग चली थी। कहीं एक प्रांत का जिक्र चला था तो कहीं लोकेशन के आसपास बोले जाने वाली भाषा का परिचय था। कहीं किसी नदी का जिक्र था तो कहीं किसी पर्वत माला का परिचय था। कहीं इलाके की पोषाक और पहनावे का जिक्र था तो कहीं वहां के खाने पीने का परिचय था।
हर बार धीरज और नब्बो की भोली और निष्पाप आंखों ने उन आश्चर्यों को देखा था, सराहा था और प्रश्न पूछे थे। दो भोले भाले पहाड़ियों ने पहली बार भारत दर्शन किया था तो वो दंग रह गए थे। उनका देश इतना विशाल था, इतना महान था और इतना विविध था, यह जान कर वो हैरान रह गए थे।
“यह है हैदराबाद।” नब्बो ने गंजे से पूछा था।
“हाथ कंगन को आरसी क्या – हैदराबाद से आगे फारसी क्या?” गंजे ने जुमला कसा था और वो तीनों खूब हंसे थे। “भाई। कुछ गड़बड़ हो गया हो तो बुरा मत मानना।” लंगड़े ने आखिरी संवाद बोला था। कृष्ण सागर की बगल में माल वाहक ट्रक उन दोनों को सड़क पर उतार कर गायब हो गया था।
“पैक अप।” राधू रंगीला ने आदेश दिए थे। “दो दिन का अवकाश।” उसके बाद अगला सैट लगेगा।” उसने ऐलान किया था।
मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

