सूनी-सूनी आंखों से राम लाल ठहर गए दृश्य का जायजा ले रहा था।
कल्लू चुनावों में व्यस्त था। उसके पास मग्गू और आचार्य घनानंद जैसे दो समर्थ खिलाड़ी थे। उसका चुनाव जीतना तय था। कदम मोहन मकीन की सेवा में व्यस्त था। स्वामी अनेकानंद का झूठ पर्ण कुटीर में तालों के भीतर बंद था। सारा क्रिया कलाप ठप्प था।
राम लाल खुली आंखों आए श्रद्धालुओं को लौट कर जाते देखता रहता था।
“क्या आनंद लौटेगा?” यही एक प्रश्न था जो बार-बार, हर बार और हर पल राम लाल के दिमाग में हुए घाव पर कौवे की तरह बैठ खोंट मारता रहता था। “अगर आनंद नहीं लौटा तो?” फिर से प्रश्न उलटा हो लाश बन जाता और राम लाल को डराता।
खाली-खाली पलों में राम लाल अपने विगत में डोलने निकल जाता।
अनाथ बालक था वो। गुरु जी की सेवा में लग गया था। गुरु जी की मृत्यु के बाद फिर अनाथ हुआ था और नए ठिकाने की तलाश में भागा था। और फिर वो रोमी का ढाबा – वो नरक भी भोगा था उसने। वहां से भागा था तो अपना एक ठिकाना बनाया था जिसे पुलिस ने बया के घोंसले की तरह फाड़ कर फेंक दिया था। सपना टूटा था तो वो भी टूटा था लेकिन मरा नहीं था।
बंबई में बर्फी से हुई मुलाकात ने तो उसे निहाल कर दिया था।
खाली बैठा राम लाल लंबे पलों तक आज फिर बर्फी के पास बैठा ही रहा था। सब कुछ दिया बर्फी ने और कुछ भी नहीं दिया। हंस पड़ा था राम लाल। ठगी है – दुनियादारी, उसकी समझ ने बताया था। कभी लगता है सब कुछ मिल गया तो कभी लगता है सब कुछ उजड़ गया।
राम लाल ने जन कल्याण आश्रम की बनती बिल्डिंग को अंखिया कर देखा था।
“अब तो चार कदम चलने लगा है मोहन।” राम लाल को कदम ने बताया था। “मतलब कि पुण्य फलने लगा है।” खुश हो कर राम लाल ने ही कहा था।
क्या है ये पुण्य पाप का लेखा जोखा? कौन रखता है इसका हिसाब किताब? कौन बताता है कि कब उसका क्या होगा?
“अगर आनंद नहीं आया तो सब मिट्टी में मिल जाएगा।” उसका अंत: करण बोल पड़ा था।
पसीने छूट गए थे राम लाल के। यूं सफलता के सोपान चढ़ते-चढ़ते वो लुट जाएगा, उसने तो कभी सोचा ही न था।
“कल्लू को बुलाओ।” उसके दिमाग ने आदेश दिया था। “कल्लू से पुछो कोई तरकीब।” उसे आदेश मिल रहा था।
लेकिन राम लाल का मन न माना था। उसे कहीं आनंद पर भरोसा था। उसे आनंद से दगा खेलने की उम्मीद न थी। वह समझ रहा था कि अगर आनंद की मां का देहांत हो गया होगा तो उसे आने में वक्त तो लगेगा। और उसने आनंद को खाली हाथ भी न भेजा था।
यों रोज-रोज आनंद का इंतजार करना राम लाल को भारी पड़ने लगा था।
राम लाल पलट कर सोचता तो लगता जैसे आधी जिंदगी पलक झपकते ही बीत गई थी। बर्फी और बच्चों के साथ जिया वो वक्त मात्र एक लमहा जैसा लगता। लेकिन अब ये इंतजार का एक पल – एक-एक क्षण युग समान लंबा हो जाता। इतनी निराशा उसने पहले कभी नहीं भोगी – वह महसूसता है।
राम लाल का दिन जन कल्याण आश्रम से चल कर माधव मानस इंटरनेशनल तक जाता और फिर वहीं से लौट कर पर्ण कुटीर पर पहुंच थोड़ा विश्राम करता। फिर उठता और होटल पहुंच जाता निरुदेश्य।
पर्ण कुटीर पर बैठा-बैठा वह विश्राम कर रहा था तब कदम आया था।
“गुरु। आपके नाम का टेलीग्राम आया है।” कदम ने सूचना दी थी। “शायद आनंद बाबू की ओर से आया है।” कदम ने अपना अनुमान बताया था। “आपको ही देंगे – बाबू ने कहा है।”
राम लाल ने नई निगाहों से कदम को निहारा था।
“मैं ले लूंगा।” राम लाल आहिस्ता से बोला था।
लगा – राम लाल को जैसे आनंद के आने की आहट मिल गई थी।
एक पल के लिए राम लाल को मिला आनंद का टेलीग्राम संजीवनी बूटी जैसा लगा था।
टेलीग्राम के लिफाफे की कमर को सहलाता राम लाल रंगीन सपनों से जा मिला था। राम लाल जानता था कि टेलीग्राम ट्रेन से ज्यादा तेज चलता था। जब तक आनंद बंबई पहुंचेगा तब तक वो आराम से उसके आगमन का संदेश और सलीका तैयार कर लेगा।
राम लाल का मन हुआ था कि कल्लू को पुकारे। लेकिन न जाने क्यों आज राम लाल को कल्लू के हाथों लगी दो बटेरें याद हो आई थीं। मग्गू और अब आचार्य घनानंद – कल्लू के पास दो अमोघ अस्त्र थे। जबकि उसका अकेला आनंद न जाने कब …
“लौटेगा! लौटेगा!” राम लाल का हिया उमग आया था। उसने खुशी-खुशी टेलीग्राम का लिफाफा फाड़ा था और उसे बाहर खींच लिया था।
लिखा था – प्लीज सेंड रुपीज 20000 इमीडिएटली
राम लाल की उंगलियां ठहर गई थीं। निगाहें थम गई थीं। सांसें फूल गई थीं। वह बेहोश होने-होने को था। वह जमीन पर सीधा लेट गया था। उसके दिमाग में – प्लीज सेंड रुपीज 20000 लगे घन की तरह घनघना रहा था। उसे लग रहा था कि आनंद उसे दो फाड़ों में चीर रहा था। आनंद उसे अब …
“क्या हुआ गुरु?” कदम होटल से लौटा था तो पूछा था।
राम लाल ने केवल निगाहें भर कर कदम को देखा था। वह बोला कुछ न था। लेकिन कदम ने ताड़ लिया था कि जरूर ही मिले टेलीग्राम में कोई अशुभ समाचार लिखा है।
“खैरियत तो है?” कदम ने राम लाल का सर सहलाया था। “लो पानी पी लो।” कदम ने उसकी सहायता की थी।
राम लाल ने पानी पिया था। उसी पल उठ कर खड़ा हो गया था। राम लाल ने निर्णय लिया था कि वो बीस हजार रुपये आनंद को भेज देगा।
“न जाने आनंद किस मुसीबत में फसा था?” राम लाल ने मुड़ कर सोचा था। “आज, अभी उसे 20000 रुपये की जरूरत क्यों आन पड़ी थी? न जाने आनंद …”
आज पहली बार राम लाल ने आपने संचित खजाने को बांटने का निर्णय लिया था।
सावधानी से राम लाल ने 20000 के नोट गिने थे और गड्डी बना कर रूमाल में लपेट लिए थे। वो मान रहा था कि आनंद को रुपये फौरन चाहिए थे। वह मान गया था कि रुपये भेज कर वह आनंद का मन जीत लेगा। वह महसूस रहा था कि अब आनंद अवश्य लौट आएगा।
“आनंद कहां है?” अचानक राम लाल ने जानी पहचानी आवाज सुनी थी। लेकिन उसे उस वक्त तक विश्वास न हुआ था जब तक कि बर्फी उसके सामने न आ खड़ी हुई थी।
“तुम …?” राम लाल के मुंह से अनायास निकला था।
“क्यों? मुझे भूल गए?” गरजी थी बर्फी। “आनंद को कहां छुपा रक्खा है?” उसने राम लाल से पूछा था।
“विपासना पर बैठा है।” राम लाल ने बताया था।
“झूठ।” तड़की थी बर्फी। “मैं सब जानती हूँ।” उसने आंखें नटेरी थीं। “पैसे दो। विक्की होटल बना रहा है।” बर्फी ने बताया था और राम लाल के हाथ से रुपयों का रूमाल खींच लिया था।
इससे पहले कि राम लाल संभलता बर्फी 20000 रुपये ले कर चलती बनी थी। आश्चर्य हुआ था रम लाल को कि बर्फी अभी तक न उसे भूली थी और न आनंद को। उसे सारी खबर थी।
राम लाल को आज फिर एहसास हुआ था कि उसके संचित खजाने के द्वार खुले पड़े थे। अब लूट होगी। अब फिर से वो वहीं लौट आएगा जहां से चला था। सब गोल-गोल घूमता है – राम लाल को एहसास हो रहा था। कोई कहीं नहीं पहुंचता – केवल पहुंचने का भ्रम बना रहता है।
तो क्या कल्लू भी कहीं नहीं पहुंचेगा – राम लाल ने अपने आप से प्रश्न किया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड