इतवार का दिन था। छुट्टी थी। सब शांत था। लेकिन कल्लू के दिल दिमाग में आज तूफान उठने बैठने लग रहे थे। वह पूरी तरह से आंदोलित था। उसे भी अब राम लाल की तरह एक चेला तैयार करना था।
वह होटल के कमरे में पहुंचा था तो किशोर कामलीवाल उसे भाई के तैयार किए परिधान में सजा वजा मिला था। कल्लू उसे निगाहें भर-भर कर देखता ही रहा – कई लंबे पलों तक। कल्लू को काम बनता दिखा था। हाथ में पीतल की मूठ वाली छड़ी पकड़े किशोर कामलीवाल कल्लू को किसी भी श्रेष्ठ संत महंत से कम न जंचा था। यहां तक कि स्वामी अनेकानंद भी किशोर कामलीवाल के सामने तेल बेचता लगा था। कल्लू अपनी पसंद पर बलिहारी था।
“मंत्री जी चाहते हैं कि तुम पार्टी का प्रचार प्रसार संभालो।” कल्लू ने संभल कर दांव फेंका था। “चुनाव आ रहे हैं। पार्टी प्रवक्ता का पद खाली है।” कल्लू ने किशोर कामलीवाल की आंखों में झांका था। “लेकिन उसके लिए बोलना – मतलब कि स्टेज पर पब्लिक के सामने बोलना आना जरूरी है।” कल्लू ने शर्त सामने रख दी थी। “आता है कुछ?” उसने सीधा प्रश्न पूछा था।
“आता है।” किशोर कामलीवाल ने विहंसते हुए कहा था।
“सनातन के बारे कुछ बोलो।” कल्लू ने आग्रह किया था।
किशोर कामलीवाल ने अपने आप को संयत किया था। फिर वह कमरे में पड़ी छोटी मेज के पीछे आ खड़ा हुआ था। उसने गला खंखारा था। बोलने से पहले एक छोटी तैयारी की थी।
“देवियों और सज्जनों।” किशोर कामलीवाल ने बोलना आरंभ किया था। “सनातन का सबसे बड़ा मंत्र है – वसुधैव कुटंबकम।” किशोर कामलीवाल की धारदार आवाज कमरे में गूंजी थी। कल्लू ने लपक कर दरवाजा बंद कर दिया था। “वसुधैव कुटंबकम सबसे बड़ा सत्य होता है मित्रों।” किशोर ने आगे कहना आरंभ किया था। “लेकिन हम और हमारा समाज आज इस मंत्र का महत्व भूल गया है। हमारा सारा ज्ञान और ध्यान आज धन संचय पर केंद्रित है। पैसा-पैसा हमें केवल पैसा चाहिए, चाहे जिस कीमत पर मिले। लेकिन दोस्तों क्या आप नहीं जानते कि ये अंधी पैसे की दौड़ हमें अंधा बना रही है? समाज किस गर्त में जा रहा है – हम किस हाल में इस अंधी दौड़ के परिणाम भोग रहे हैं, क्या आप नहीं जानते?”
“बहुत खूब।” कल्लू ने ताली बजाई थी। “चलेगा किशोर। दौड़ेगा सनातन।” कल्लू बेहद खुश था। “लेकिन … लेकिन तुम्हारा नाम …?” कल्लू को तुरंत ही अगली जरूरत सूझ गई थी।
“नाम तो …”
“नहीं चलेगा।” कल्लू ने सर हिलाया था। “किशोर कामलीवाल – किशोर ढपलीवाल – क्या समझते हो कि पब्लिक को पसंद आएगा?” कल्लू ने प्रश्न पूछा था। “नाम होगा – आचार्य घनानंद।” कल्लू ने ऐलान किया था। “जमेगा तुम्हारी पर्सनेलिटी पर किशोर।” कल्लू ने ताड़ जितने लंबे किशोर कामलीवाल को देखा था। “तुम्हारा पुराना नाम और तुम्हारे गुण मेल नहीं खाते।” कल्लू ने खोट बताया था। “लेकिन यह नया नाम घनानंद तुम्हारा बेड़ा पार कर देगा।” हंसा था कल्लू।
किशोर कामलीवाल मान गया था। उसे तो काम चाहिए था, नाम चाहिए था और अब उसे नामा पाने की भी फिक्र थी।
“क्या मिलेगा बाबू?” किशोर कामलीवाल ने शर्माते हुए पूछा था।
“कल मंत्री जी के साथ हुए इंटरव्यू के बाद तय होगा।” कल्लू ने साफ-साफ बताया था। “हो भी सकता है कि मंत्री जी …?” कल्लू ने आंखें तरेरी थीं।
किशोर कामलीवाल का चेहरा दप से बुझ गया था।
“जो सवाल पूछें सच-सच बोलना है किशोर।” कल्लू ने हिदायत दी थी। “बहुत कम बोलते हैं मंत्री जी। लेकिन नजर इतनी पैनी है कि पूछो मत।” कल्लू ने खबरदार किया था किशोर कामलीवाल को।
होटल के बाहर आते ही कल्लू को बहारों ने बुला लिया था।
“दो-दो दौड़ने वाले घोड़े होंगे तुम्हारे पास पारखी।” बहारें बता रही थीं। “ये दौड़ दिल्ली से पहले नहीं रुकेगी।” एक अनुमान कल्लू के सामने आया था। “सी एम और पी एम का मिला आशीर्वाद कल्लू को याद हो आया था। “आचार्य घनानंद की दहाड़ अगर देश ने ठीक से सुन ली तो बेड़ा पार था।” कल्लू का अपना मत था।
शाम को मग्गू के घर जाने से पहले कल्लू न तो राम लाल से मिला था और न ही कदम से। उसे अपने कदम बहके-बहके लगे थे।
“मैंने सांप पकड़ लिया है। बोरे में बंद है। अब बीन तुमने बजाना है – संभल कर। तनिक सी भी गलती हुई तो मानो मर गए।” कल्लू मग्गू को बताने लग रहा था। दोनों मग्गू के घर बंद कमरे में बैठे मंत्रणा कर रहे थे। छोटी मेज पर शराब की बोतल और दो गिलास रक्खे थे। स्नैक्स की खुशबू कमरे में किलोल कर रही थी। कल्लू का मन खिल उठा था। लेकिन मग्गू खबरदार था।
“इतना खतरनाक है …” मग्गू ने डरते-डरते पूछा था।
“तुम्हारे राजनीतिज्ञों से भी ज्यादा खतरनाक है।” कल्लू ने बात का खुलासा किया था। “लेकिन विष को मारने के लिए विष ही तो चाहिए।” कल्लू ने मग्गू को समझाया था। “ये देश की राजनीति पर छा जाएगा।” कल्लू ने मग्गू के चेहरे को पढ़ा था। “सांप और नेवले का मुकाबला है।” कल्लू ने सारा खेल समझाया था। “चोट पर चोट चलेगी।” कल्लू हंसा था। “और विपक्ष हारेगा और हम जीतेंगे।” हंसा था कल्लू।
मग्गू की जान में जान लौटी थी। जिस तरह बंबई शहर में नारी शक्ति का ढोल पिटा था उसे देख मग्गू ने हार मान ली थी। लेकिन आज एक जादूगर की तरह कल्लू ने उसकी पीढ़ा हर ली थी। वह अपने मित्र का आभार मान रहा था। खुश हो कर मग्गू ने दोनों के लिए पटियाला पैग बनाया था। फिर दोनों के गिलास टकराए थे – चियर्स। करारे स्नैक्स रौंदता कल्लू अपनी कमर थपथपा रहा था।
“है कौन – ये सांप?” मग्गू की पैग लगाने के बाद हिम्मत लौटी थी तो पूछा था।
“आचार्य घनानंद।” कल्लू ने जोर से जयघोष किया था। “देखोगे तो दंग रह जाओगे। कल्लू ने प्रशंसा की थी आचार्य घनानंद की। बोलता है तो धरती हिलती है दोस्त।” कल्लू ने संभलते हुए कहा था। “कल देखना …”
सहसा मग्गू को स्वामी अनेकानंद याद हो आया था। उसे याद हो आया था कि किस तरह से राम लाल ने जन कल्याण आश्रम की नींव डाल दी थी और किस तरह से वो जनमानस को लूट रहा था। अगर उसका भी ये आचार्य चल पड़ा तो शायद …
“बात इस बार दिल्ली तक जाएगी दोस्त।” कल्लू ने गिलास से लंबा घूंट भरा था। “तुम्हारी जोट में जुटेगा ये आचार्य। एक और एक ग्यारह होगा दो नहीं।” कल्लू खुल कर हंसा था। “वो आचार्य घनानंद – सनातन और तुम माधव मोची। दोनों का मेल अनमोल होगा। सनातन के सामने एक उदाहरण मानो इसे मित्र।” कल्लू ने उनके मिशन की नई व्याख्या की थी। “हिंदू एक हो गया तो – दुनिया में बचेगा ही क्या?” कल्लू ने दूर की कौड़ी ला कर मग्गू के हाथ में थमा दी थी।
मग्गू ने गिलास खाली कर दिया था। कल्लू ने गिलास खाली कर दिया था। अब एक नई बिसात बिछी थी।
“क्या लेगा?” मग्गू सीधा सौदे पर उतर आया था।
“क्या दोगे?” कल्लू ने उसी से पूछा था।
“तू ही तय कर।” मग्गू ने मुंह मोड़ लिया था।
“पहले रोटी लत्ता और प्रमोशन भत्ते पर रख लेते हैं।” कल्लू ने राय दी थी। “चल पड़ा तो …?”
“चलेगा …?” मग्गू ने ऊंची आवाज में फिर से पूछा था।
“दौड़ेगा।” कल्लू ने गिलास में पैग डाला था। “लंबी रेस का घोड़ा है। लेकिन कल तूने बड़ी ही सावधानी से उसे दो एक सवाल पूछने होंगे।”
“जैसे कि …”
“तुम्हारी आयु क्या है?” कल्लू हंस रहा था। “अविवाहित हो या …?” उसने मग्गू के हाथ पर हाथ दे मारा था। “और पूछ लेना – क्वालीफिकेशन।”
“ठीक है।” मग्गू मान गया था। “फिर …?”
“अगले ही इतवार को बंबई में शंखनाद होगा सनातन का।” कल्लू ने अगला कदम भी मग्गू के सामने रख दिया था।
बिछुड़ने से पहले दोनों दोस्त गले मिले थे।
“याद है कल्लू, जब पी कर हम दोनों समुंदर किनारे रात भर पड़े रहते थे?” मग्गू भावुक था।
“वक्त वो ही अच्छा था रे …!” कल्लू मान रहा था। “ये साली घटिया जिंदगी मुझे रास नहीं आती मग्गू।” टीस आया था मग्गू।
लेकिन नीरव हुई रात ने उन दोनों की शिकायत नहीं सुनी थी।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड