कल्लू ने महसूस किया था कि वो आज कल जमीन पर नहीं कांटों की सेज पर सोता था।

आनंद के जाने के बाद गुरु को जैसे रोग लग गया था। कब आएगा आनंद – आम प्रश्न था जो गुरु दिन में दो चार बार पूछ लेते थे। सच था। अगर आनंद न लौटा तो सवा सत्यानाश था। कब तक उल्लू बनाते लोगों को? और जब लोगों को पता चलता कि …

कल्लू भी दहला जाता। उसकी आंख खुल जाती तो नींद लौट कर ही न आती।

और फिर खुली आंखों से वो मग्गू को मछली की तरह बिन पानी के तड़पते देखता। चुनाव हार जाने की चिंता में मग्गू सूख-सूख कर छुहारा हो गया था। सनातन का नारा देने के बाद से आज तक उस दिशा में वो एक कदम भी न चले थे। चलते भी तो कैसे? न मग्गू को सनातन का ओर छोर आता था और न ही उसे सनातन की टांग पूंछ का पता था। दिन घोर संकट में बीतता और बेहद बुरे सपनों में रात गारत हो जाती।

“कल्लू। एक आदमी – माने एक साधु आया है।” कदम की सांसें उखड़ रही थीं। “झगड़ा कर रहा है।” कदम ने सूचना दी थी। “कहता है – अभी मिलेगा वो स्वामी अनेकानंद से।” कदम ने झगड़े का सबब भी बयान किया था।

“भगा क्यों नहीं दिया?” कल्लू ने कड़क स्वर में पूछा था।

“नहीं रे। वो एक लंबा चौड़ा आदमी है …” कदम की आवाज अटक गई थी।

“चल। देखते हैं तेरे लंबे चौड़े आदमी को।” कल्लू ने बांहें चढ़ाते हुए कहा था।

कल्लू ने देखा था कि आदमी वास्तव में ही लंबा चौड़ा था। सर पर भगवा पगड़ी पहने, लंबा चोगा धारण किए और पैरों में खड़ाऊं पहने वो कल्लू को स्वामी विवेकानंद जैसा लगा था। उसके हाथ में एक मोटा लट्ठ लगा था। चेहरा तेजोमय था। आंखें बड़ी-बड़ी थीं और आवाज रौबदार थी। कल्लू को एक अलग ही संदेश मिला था।

“आप कौन?” कल्लू ने सीधा भिड़ते हुए प्रश्न पूछा था।

“किशोर कामलीवाल।”

“यहां क्यों?” कल्लू के प्रश्न में तलखी थी।

“स्वामी से भेंट करनी है।”

“नहीं मिलेंगे। विपासना पर हैं।” कल्लू का उत्तर था।

“ढोंग है। झूठ है। मैं नहीं मानता …” किशोर कामलीवाल भिड़ गया था।

“देखो। आश्रम माधव मोची का है। सरकार में मंत्री हैं। तीन पांच की तो अंदर हो जाओगे।” कल्लू ने सीधा उस आदमी को आंखों में घूरा था। “चाहिए क्या वो बोलो?” कल्लू का अगला प्रश्न था।

“म … म … मैं … मुझे।” गड़बड़ा गया था किशोर कामलीवाल।

“काम चाहिए?” कल्लू ने उसे सुझाव दिया था।

“हां-हां। काम चाहिए।” उसने हामी भरी थी।

“नाम चाहिए?” कल्लू का अगला प्रश्न था।

“हां-हां। वही तो।” किशोर खिल उठा था।

“और नामा भी चाहिए?

“हां-हां। मैं … मैं” गदगद हो गया था किशोर कामलीवाल।

कल्लू किशोर कामलीवाल को बांह पकड़ कर अपने साथ ले गया था।

कदम – जो अभी तक खड़ा-खड़ा सूख रहा था हरा हो गया था।

“ये रहा तुम्हारा कमरा।” कल्लू ने किशोर कामलीवाल को होटल माधव मानस इंटरनेशनल की ऊपर वाली मंजिल पर पहुंचा दिया था। “आराम से रहो सहो।” कल्लू हंसा था। “खाना दाना सब मुफ्त।” उसने ऐलान किया था। “रही काम की बात तो – टैम लगेगा।” कल्लू ने किशोर कामलीवाल को समझाया था। “पहले तुम्हारा हाल हुलिया ठीक ठाक करना होगा।” कल्लू मुसकुराया था। “निरे गंवार लगते हो।” कल्लू बताता रहा था। “सभ्य समाज के लिए सभ्य और सम्मानित व्यक्ति ही दरकार होता है, किशोर भाई।” कल्लू ने किशोर को पते की बात बताई थी।

किशोर कामलीवाल फाइव स्टार के उस भव्य कमरे को आंखें फाड़-फाड़ कर देखता ही रहा था और होते करिश्मे को भी समझने की कोशिश करता रहा था।

कल्लू ने किशोर कामलीवाल के आगमन का जिक्र गुरु राम लाल से नहीं किया था।

लेकिन जिस तरह से गुरु राम लाल ने आनंद बाबू का स्वामी अनेकानंद में रूपांतर किया था, अब कल्लू चाहता था कि किशोर को सनातन का अवतार बना कर मग्गू को पेश कर दे। और हारी बाजी जीत ले। मग्गू के संदेश आ रहे थे। लेकिन उसके पास अभी तक कोई विकल्प नहीं था। लेकिन आज तो वो मालामाल हो गया था। कल्लू के दोनों हाथों में लड्डू थे और मुंह भी घी शक्कर से लबालब भरा था। उसका मन बल्लियों उछल रहा था।

कल्लू ने फौरन फोन किया था और अपने भाई को बुला लिया था।

“इसे स्वामी विवेकानंद का अवतार बनाना है भाई।” कल्लू ने किशोर की ओर इशारा किया था। “जान लगा कर काम करना भाई। ये काम मेरा है।” कल्लू ने भाई को सब कुछ समझा दिया था।

“फिकर नॉट भाई।” कल्लू का भाई भी हलीम सलीम किशोर को देख खुश हो गया था।

तभी फोन पर मग्गू ने उसे बुलाया था। कल्लू ने बिना कोई बहाना किए आज फोन उठा लिया था।

“हां जी सर …?” कल्लू ने हंसते हुए कहा था।

“कुछ काम बना कल्लू?” मग्गू का वही घिसा पिटा प्रश्न था।

“इतवार को मिलते हैं।” कल्लू ने सीधा ऐलान किया था। “मैं काम से लगा हूँ।” उसने संकेत दे दिया था।

जैसे गुरु राम लाल ने आनंद बाबू को गुरु मंत्र दे कर सफल स्वामी अनेकानंद बना दिया था, उसी तरह अब कल्लू भी किशोर कामलीवाल को एक सनातनी अवतार के रूप स्वरूप में मग्गू की पॉलिटिकल पार्टी में उतार देना चाहता था। लेकिन गुरु मंत्र क्या दे, उसकी समझ में न आ रहा था।

“कितने पढ़े लिखे हो?” कल्लू ने किशोर कामलीवाल से सीधा प्रश्न पूछा था।

“बी ए किया था।” किशोर का उत्तर था। “आगे नौकरी की तलाश में डोला फिरा लेकिन किसी ने दांत तक नहीं देखे। मेरे जैसे लट्ठे कट्ठे को देख लोग डर जाते हैं। तब मैंने संन्यास ले लिया। लेकिन … संन्यासी …?”

“भूखे मरते हो?” कल्लू ने कटाक्ष किया था।

“हां।” किशोर मान गया था।

“कोई काम आता है?” कल्लू ने फिर से पूछा था।

“नहीं।” किशोर ने दो टूक उत्तर दिया था।

कल्लू बहुत खुश था। उसे भी गुरु राम ला की तरह बटेर हाथ लगी थी।

Major krapal verma

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड

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