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लेख– आख़िर हम मानवीय मूल्यों को क्यों बिसारते जा रहें?

बीते दिनों उसी राजधानी नई दिल्ली के पांडव नगर और मयूर विहार में दो युवकों की हत्या रोडरेज की वज़ह से कर दी गई। जिस दिल्ली को आम बोलचाल की भाषा में कहते हैं, दिल्ली है दिल वालों की। फ़िर ऐसे में काहे का दिल और दिल्ली? हम मानसिक रूप से इतने कमजोर और असहनशील होते जा रहें, कि छोटी-छोटी बातों पर मार-काट को उतावले हो जाते हैं। फ़िर काहे कि पिपहरी बजाते हम फिर रहें विश्वगुरु बनने की। मानवतावादी दृष्टिकोण और मूल्यों को तो हम देहरी पर रख चुके हैं। जो एक स्वस्थ सामाजिक संरचना के लिए काफ़ी विकट स्थिति निर्मित कर रहा है। रोडरेज की बढ़ती घटनाओं का ज़िक्र करें, तो यह अब देश की राजधानी तक सीमित नहीं, इसका दायरा उत्तरप्रदेश, देश के दिल मध्यप्रदेश के साथ हर तरफ़ बढ़ता जा रहा। यह अपने आप में काफ़ी गम्भीर और चिंतनीय मसला है; कि छोटी सी बात को लेकर सड़क पर बहस इतनी लंबी खींच जाती है, कि नौबत जान से मरने और मारने की आ जाती है। ऐसे में क्या कहें कहीं हम संवेदनशीलता और सहनशीलता को एकदम खो तो नहीं चुके हैं? ऐसा है तो यह किसी भी देश के लिए चिंताजनक बात है। ऐसे में अगर यह पहलू अपने पैर व्यापक रूप से उस देश में पसार रहा, जहां की जड़ में संवेदनशीलता और सहानुभूति का अद्भुत रस भरा अतीत से रहा है। तो ऐसे में स्थिति काफ़ी जटिल और भयावह समझ आती है।
                       ऐसे में हमें समझना होगा, कि आज किस दिशा में हमारा समाज चल पड़ा है। जिस तरफ़ नज़र उठाओ अराजकतावादी परिवेश ही दीप्तमान हो रहा है। जैसे देश आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा है, जाति-धर्म की सियासत में उलझा है। उससे भी भयंकर स्थिति समाज में बढ़ती अराजकता की हो रहीं। आज हमारे समाज का दुर्भाग्य देखिए; भाई,भाई के खून का प्यासा हो चला है, बेटे को बाप भोली आँखों से नहीं सुहा रहा। ऐसे में प्रश्न तो यहीं किस युग की तरफ़ बढ़ रहे हम। कहीं सिर्फ़ कहलाने के लिए तो हम वैज्ञानिक औऱ आधुनिक युग में परिवेश तो नहीं कर रहे, क्योंकि हमारा सामाजिक परिवेश बढ़ तो जंगलराज से भी बद्दतर दिशा की ओर रहा। छोटी-छोटी बात पर आज लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो उठते हैं। अगर यह उस महान संस्कृति वाले देश में हो रहा। जहां के संत कवि रहीमदास जी ने कहा है, कि क्षमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात; का रहीम हरी का घट्यो, जो भृगु मारी लात। इसका भावार्थ कम शब्दों में यहीं है, कि माफ़ करने वाला बड़ा होता है। अगर हिन्दू धर्म के तथ्यों पर इसी बात को समझें, तो एक बार ऋषि भृगु ने भगवान विष्णु की सहिष्णुता की परीक्षा लेने के लिए उनके वक्ष पर ज़ोर से लात मारी। मगर क्षमावान भगवान ने नम्रतापूर्वक उनसे ही पूछा, “अरे! आपके पैर में चोट तो नहीं लगी? क्योंकि मेरा वक्षस्थल कठोर है और आपके चरण बहुत कोमल हैं।” तो उसी क्षण भृगु महाराज ने क्रोध करके स्वयं को छोटा प्रमाणित कर दिया, और विष्णु भगवान क्षमा करके और भी बड़े हो गए। जब यह परम्परा औऱ संस्कृति सिर्फ़ हमारे देश औऱ समाज का हिस्सा है। फ़िर आज का आधुनिक होता समाज छोटी-छोटी बात पर दूसरे की जान लेने पर तुलकर अपनी ही विरासत को कमजोर तो कर ही रहा, साथ में सामाजिकता की डोरी को भी छिन्न-भिन्न कर रहा।
       आज ज़मीन-ज़ायदाद के लिए लोग अपनों की जान ले रहें हैं। जो रिश्तों की डोर कमजोर कर रहा। तो सड़क पर बेलगाम रफ्तार की वजह से होने वाले हादसों में लोगों की जान जाने की खबरें भी अब अखबारों की आम सुर्खियां हैं, लेकिन हद तो तब हो जाती है। जब कई बार घटनाएं ऐसी होती हैं जो हमें अपनी तरफ देखने पर शर्मसार औऱ सोचने पर मजबूर करती है, कि हम किस दिशा में कूच कर रहे। देश भर से रोडरेज की खबरें अक्‍सर आती हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्‍ली में तो आए दिन ऐसी खबरें सुनने को मिलती हैं कि सड़क पर मामूली कहासुनी में उक्त व्यक्ति की जान चली गई, और पुनः हाल-फिलहाल में भी ऐसी दुःखद ख़बर पढ़ने को मिली। ऐसे में सवाल यही लोगों में आखिर इतना गुस्‍सा औऱ नफ़रत आती कहां से है? जो दूसरे का क़त्ल तक कर देते हैं। ऐसे में अगर किसी मामूली बात पर हुई बहस औऱ झड़प किसी के प्रति जानलेवा हमले में तब्दील होने लगे तो यह न केवल अराजकता का मामला है, बल्कि सामाजिक रूप से दरकते मानवतावादी दृष्टिकोण की निशानी है।

                                 सड़क पर चलते हुए छोटी-छोटी गलतियां जैसे अचानक किसी ने ब्रेक लगाई न लगी और आपस में गाड़ियां टकरा गई। गलत साइड पर चलने की वज़ह से आपस में टक्कर हो गई। अगर इन बातों के लिए किसी की जान ले ली जाएं। वह किसी भी दृष्टिकोण से जायज़ नहीं हो सकता। ऐसे में अगर रोडरेज के बारे में कुछ तथ्यात्मक पहलू को समझें तोसड़क रोष यानि रोडरेज शब्द की उत्पत्ति 1980 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई थी, लेकिन वर्तमान में यह लोगों की जान भारत में तेज़ी से ले रहा है। जो एक चिंताजनक बात है। वैसे रोडरेज का अर्थ समझे तो इसका आशय एक वाहन या अन्य मोटर वाहन के चालक के अक्रामक या क्रुद्धभरे रवैये से है। जिस असभ्य व्यवहार से सामने वाले को कभी-कभी मौत का सामना भी करना पड़ता है। अरस्तू ने कहा था, गुस्सा किसी को भी आ सकता है, यह बेहद आसान बात है। पर सही वक्त पर सही कारणों से, सही ढंग से क्रोध करना इतना आसान नहीं है। ऐसे में अगर कुछ समय पूर्व दिल्ली में एक शख्स ने मोटरसाइकिल सवार दो युवकों को कार से ठोकर इसलिए मार दिया क्योंकि उसने कार सवार शख्स को सार्वजनिक जगह पर सिगरेट पीने से मना कर दिया था, तो ऐसी घटना को ही रोडरेज की संज्ञा दी जाएगी। आज अगर हमारे देश औऱ समाज में रोडरेज की बात आम हो रहीं। तो उसके निहितार्थ बिल्कुल स्पष्ट हैं, कि एक तरफ़ सामाजिकता कमजोर पड़ रहीं, दूसरी ओर कानून का पालन सही से हो नहीं रहा औऱ सबसे बड़ी बात हमारी समाजिक व्यवस्था में लोग उग्र होते जा रहें। आज के दौर में देश में रोडरेज की समस्या गम्भीर मुद्दा बनता जा रहा।
रोड़ पर आज यह प्रवृत्ति आम बात हो चुकी है कि वाहन चलाते समय किसी अन्य गाड़ी से महज अपनी गाड़ी छू जाने पर दो पक्ष मरने-मिटने पर उतारू हो जाते हैं, बिना यह सोचे-समझें की इस जीवन का क्या मोल है। हाल के वर्षों में सड़कों पर लोगों के व्यवहार में जिस तरह का मनोवैज्ञानिक बदलाव आया है और वे छोटी-छोटी बातों पर जानलेवा टकराव के लिए तैयार दिखते हैं, शायद यही वजह है कि अब इस मसले पर संसद में भी चिंता जाहिर की जा रही है और देश में रोडरेज की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए ठोस कानून की जरूरत पर बल दिए जाने की आवश्यकता है। रोडरेज की बढ़ती घटनाओं पर अगर गौर किया जाए; तो इसके बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यह है, कि यह लोगों के व्यवहार से जुड़ा मनोवैज्ञानिक मसला होने के साथ सामाजिक हैसियत से भी जुड़ा हुआ है। साथ में जीवन में आगे रहने की जो सीख हमें बचपन में सिखाई जाती है, उसे सडक़ पर भी अपनाया जाने लगा है।
        ऐसे में आगे रहने की चाहत औऱ सामाजिक श्रेष्ठता की धमक ही सडक़ पर चलने वाले की गाड़ी से अधिक उसके अहं को चोट पहुँचाती है, जो सडक़ पर खूनखराबे को बढ़ावा देने का कारक बनती है। कुछ वर्ष पूर्व की एक ओर दास्ताँ का जिक्र करूँ तो बिहार के बोधगया में महज सड़क पर आगे निकलने के मसले पर रॉकी यादव नाम के एक युवक ने दूसरी कार में बैठे एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी थी। रॉकी यादव को अदालत से उक्त रोडरेज के मामले में भले उम्र कैद की सजा मिली थी। लेकिन यह कैसा समाज निर्मित हो रहा जहां झूठे सामाजिक अहंकार औऱ ख़ुद को आगे रखने की फ़िराक़ में लोगों की जान ली जा रहीं। ऐसी मानसिकता बिगड़ते सामाजिक माहौल, कमजोर होती सामाजिक संवेदना, सहनशीलता औऱ अपनेपन की भावना का लुप्तप्राय हो जाना है। साथ में समाज में कमजोर होती नैतिक शिक्षा औऱ अपने अतीत के नैतिक सन्दर्भों को भूलना भी ऐसी घटनाओं के बढ़ने का कारक है।
     ऐसे में इससे निपटने का सख़्त प्रयास क़ानूनी औऱ सामाजिक दोनों स्तर पर होना चाहिए, क्योंकि छोटी बात पर उग्र होकर किसी व्यक्ति की जान ले लेना सभ्य, मर्यादित औऱ उस संवैधानिक देश में उचित नहीं जहां लोगों को जीवन जीने का निर्बाध अधिकार मिला हो। अगर देश में गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक तीन लोग प्रतिदिन राह चलते छोटी-मोटी बात औऱ आपसी विवाद की वज़ह से मारे जा रहें, तो यह देश औऱ समाज सभी के लिए चिंतनीय बात होनी चाहिए। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में रोडरेज के 3782 मामले दर्ज हुए, जिसमें 4702 लोग घायल हुए औऱ 1300 से अधिक मामूली बात के संघर्ष में जीवन गंवाए। इसी प्रकार 2016 में 1600 से अधिक रोडरेज के मामले देश में दर्ज हुए। ऐसे में अगर बीते कुछ समय पूर्व भाजपा सांसद रतनलाल कटारिया की तरफ़ से रोडरेज के मुद्दे पर सदन का ध्यान आकृष्ट किया गया था। उसके बाद भी अभी तक इन घटनाओं पर अंकुश नहीं लग पाया है। तो इससे निपटने का माक़ूल क़ानूनी और सामाजिक उपाय अब ढूढ़ना होगा। इसके अलावा अगर अवाम सडक़ पर यातायात नियमों का पालन करें, जाम होने पर हड़बड़ी न करके, राह चलते वक्त ग़लती होने पर सामने वाले व्यक्ति से माफ़ी मांग ले, साथ में सड़क पर गड़बड़ होता देख पुलिस सहायता लेकर और लेन को बदलते समय सही इंडिकेटर दे, जिससे दूसरों को परेशानी न हो और गाड़ियों के टकराव की स्थिति न बने। तो ये छोटे- छोटे प्रयास अपने स्तर पर रोडरेज की विभीषिका को कम कर सकते हैं।