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तुम संग होली

holi

हर त्यौहार के साथ ही मुझे अपना बचपन याद आ जाता है। और सारे साल भर के त्यौहार मेरी आँखों के आगे घूम जाते हैं.. कैसे मैं अपने माँ-बापू संग और अपने भाइयों संग ख़ुश होकर सारे त्यौहार मनाया करती थी। सभी त्यौहारों में होली का दिन ख़ास हुआ करता था। माँ! तुम्हें याद है.. जब हम पुराने घर में रहा करते थे.. और मैं छोटी थी.. तो न जाने कितनी सहेलियाँ बना रखीं थीं.. मैंने। माँ.. जब हमारी पहली होली थी.. पुराने घर में.. तो आज भी सोच कर ज़ोरों से हँसी आ जाती है.. मुझे! सुबह होते ही जब तुम हमारे सबके लिये दही बड़े बना रहीं थीं.. और मैं दही-बड़ों का स्वाद लेकर बाहर जाने ही वाली थी.. कि अचानक से मेरी सारी सहेलियों ने घर पर ही धावा बोल दिया था.. और चेहरे की रंगत ही बदल दी थी.. बहुत दिन लग गए थे.. शक्ल पूरी तरह से साफ़ होने में।

स्कूल भी मैं बहुत दिन तक वही रंगीन चेहरा लेकर गई थी। माँ! मुझे अच्छी तरह से याद है.. जब तुमनें कहा था,” आइन्दा से होली वाले दिन रंगों से खेलने से पहले.. सरसों के तेल की मालिश कर लिया करो.. फ़िर चेहरे पर रंग पक्के नहीं होंगें”।

आज तक तुम्हारी यह सीख होली के त्यौहार पर खूब काम आती है। बस! त्यौहार वाले दिन तुम्हारे हाथ के खाने की खुशबू कहीं खो गई है। होली वाले दिन हमारी ख़ास फरमाइश तो तुम्हारे हाथ के दही-बड़ों की ही होती थी.. हम तीनों बहन-भाई मज़े और चटखारे लेकर खाया करते थे.. तुम्हारे हाथ के लज़ीज़ दही-बड़े। अपने घर त्यौहार मना कर माँ.. हम लोग मामाजी के यहाँ भी होली मनाने जाते थे.. न माँ!.. उनके संग भी होली खेलने में खूब मज़ा आया करता था।

याद है.. तुम्हें माँ.. एक बार तुमनें और पिताजी ने मिलकर हाथ से कितनी अच्छी गुंजिया बनायीं थीं.. सच! में वैसी गुंजिया आज तक नहीं बनी.. वो भी क्या दिन थे.. तुम्हारे संग..  यादगार बन कर रह गए। एक बार तो हम ज़बर्दस्ती ही पिचकारी ख़रीद लाए थे.. और तुमनें हमें कितनी डांट पिलाई थी,” ज़रूरत ही नहीं थी.. तो फ़ालतू का ख़र्चा किया ही क्यों! “। ऐसा कहा था.. तुमनें।

पिचकारी और रंगों का त्यौहार तुम्हारे संग कब और कैसे बीत गया.. पता ही नहीं चला.. तुम कब त्यौहारों में यूँ अकेला छोड़कर चलीं गयीं .. पता ही नहीं चला.. आज भी होली पर उड़ते हुए.. गुलाल में तुम्हारा चेहरा नज़र आता है.. और एक बार फ़िर से बचपन में लौट कर तुम संग होली मनाने को जी करता है।