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सबसे मिली

सबसे मिली

पर्दा उठता है.. स्वर्ग लोक का एक सुन्दर दृश्य.. सभी मकान लाइन से बने हैं.. एक ख़ास मकान का महूर्त दिखाया जा रहा है।

घन्टी बजती है.. टींग!!  टोंग!!… मम्मीजी! गेट खोलिए! लगता है.. मेहमान आने शुरू हो गए!”।

“ हाँ! हाँ! ला! ठहर देखूं”।

मम्मीजी दरवाज़े तक जातीं है, और दरवाज़ा खोलकर देखती हैं…

“ कोई नहीं आया है, अभी बबली है.. कचरा लेने आई है”।

“ मैं ही सारा काम करती रहूँगी, या कोई मेरी मदद भी कराएगा’।

मैंने अपनी माँ से कहा था।

“ चल बता क्या करवाना है.. सब्जी काट दूँ.. मैं.. दोनों मिलकर करेंगें तो फ़टाफ़ट गेस्टों के आने से पहले काम हो जायेगा”।

माँ ने मुझसे कहा था।

“ पता नहीं आज ये रामदुलारी कहाँ मर गई!.. जिस दिन घर में काम होता है.. यह पक्का ही लेट हो जाती है”।

माँ ने घर में काम कर रही कामवाली के ऊपर ग़ुस्सा निकालते हुए कहा था।

“ स्वीटी! बेटा! ये चने उबाल दिए हैं.. मैने! बस! अब तू इन्हें बिल्कुल मत छेड़ना! खाना लगाने से दस मिनट पहले मसाले मिला देंगें!”

“ हाँ! हाँ! ठीक है.. आप बाकी की सब्जियाँ चेक कर लो ! मैं घर ठीक किए देती हूँ”।

घन्टी बजती है!

“ कौन!”

“ बीबीजी मैं!”

दरवाज़ा खुलने के बाद..

“ रामदुलारी! कितनी बार कहा है. . तुझसे कि जब घर में काम हुआ करे, तो ड्रामा बन्द करके थोड़ा जल्दी आया कर”।

मम्मीजी ने कामवाली को झाड़ते हुए कहा था।

“ ओ! का है, न बीबीजी! सफ़ाई वाली के घर लेट हो गई!”।

“ चल अब गप्पे बन्द करके फ़टाफ़ट कर लोग आते ही होंगे”।

मम्मीजी ने कामवाली को जल्दी काम ख़त्म करने का हुक्म देते हुए कहा था, क्योंकि मेहमान आने वाले थे।

“ ठीक है! बीबीजी मैं हाल-हाल सब निपटा लूँगी”।

माँ बेटियाँ रसोई-घर में भोजन की तैयारियों को पूरा करने में व्यस्त हो गईं हैं.. और रामदुलारी यानी के कामवाली घर के काम-काज ख़त्म करने में व्यस्त हो गई है। इतने में दरवाज़े पर दोबारा घंटी बजती है.. टींग!-टोंग!

“ रामदुलारी देखना!”

रामदुलारी का दरवाज़ा खोलना होता है.. इतने में ही रसोई के दरवाज़े से मम्मीजी झाँकर देखती हैं..

“ नमस्ते! जीजी!”।

“ अरे! सुमन! आजा! चल! अच्छा है, तू टाइम से आ गई.. तेरा ही इंतेज़ार कर रहे थे, बच्चे नहीं आए!”। मम्मीजी अपनी बहन से सवाल करतीं हैं।

“ नहीं, जीजी! बच्चों की पढ़ाई थी, तो मैं और ये ही आ गए”।

“ नमस्ते! मैसीजी!, नमस्ते! मौसाजी!”।

“ नमस्ते! नमस्ते!”।

मौसाजी और मौसीजी का स्वागत हो चुका था। अब उन्हें चाय-नाश्ता परोसा  गया था.. और माँ-बेटी उन्हीं के साथ बैठक में बैठ गईं थीं।

“ आपने मकान तो अच्छा खरीदा है!.. जीजी! मैं देख आई.. जीजाजी नज़र नहीं आ रहे!”।

“ सुमन! तेरे जीजाजी महीने के लिये काम से गये हुए हैं.. और मुझे ही मकान के महूर्त की ज़िम्मेदारी सौंप कर गए थे.. कह कर गए थे.. तुम सभी रिश्तेदारों को बुलवा कर पूजा करवा लेना। तो हमनें आज का ही दिन ठीक समझकर महूर्त रखा है”।

मकान के महूर्त पर दोनों बहनों का बैठक में वार्तालाप होता है। बिटिया भी अपनी मौसी से बात करने आ जाती है।

“ बहुत सुन्दर साड़ी पहनी है, आपने, मौसीजी!”

“ अच्छी लगी तुझे! बेटा! तेरे मौसाजी लाए थे!”।

वार्तालाप अभी जारी था, कि फ़िर से डोर-बेल बजती है.. टींग!! टॉन्ग!!

अपनी मौसी व मौसा से बातें कर रही बिटिया बीच में उठकर एक बार फ़िर से घर का दरवाज़ा खोलती है.. पर इस बार बन्द करना ही भूल जाती है.. अब दरवाज़े की कुंडी न लगी है.. हल्का सा बिना ही कुंडी के लगा हुआ है..

“ नमस्ते! नानाजी, नमस्ते! नानीजी! नमस्ते! मामाजी!”।

“ नमस्ते! नमस्ते! नमस्ते!”।

नानाजी, नानीजी, मामाजी भी आ चुके थे। नानाजी के हाथ में खोया वाली गजक का डिब्बा था.. जो उनसे लेकर मेज पर रख दिया था।

“ कुसुम!” नानाजी ने मम्मीजी को पुकारा था।

“ हाँ! पापा!”

“ नहाने का थोड़ा गर्म पानी मेरे लिये इस रामदुलारी से कह कर गुसलखाने में रखवा दे.. थोड़ा नहाऊंगा, फ़िर पूजा में बैठूंगा”।

“ ठीक है! जैसी तुम्हारी मर्ज़ी! पापा!”।

बेटी और पिता का वार्तालाप यहीं समाप्त हो जाता है.. और पिता अपना सामान ले कर नहाने- धोने निकल जाते हैं। और बाकी के सभी लोग बैठक में बातें कर, और हँसी ठठ्ठा कर रहें हैं। दरवाज़ा खुला होने के कारण बाकी के सभी और रिश्तेदार भी आ गए हैं.. चाचा, ताऊ, बुआ और दादी-दादा। सभी का मेल-मिलाप चल रहा है.. और सब एक दूसरे से मिलकर इस मकान के महूर्त पर बेहद खुश भी हो रहे हैं। आज मैं बहुत दिनों के बाद अपने सारे रिश्तों से मिल रही हूँ.. सबसे मिले एक अरसा बीत गया था.. पर आज सबसे मिलकर मेरा वही बचपन मेरे सामने फ़िर से आकर खड़ा हो गया है.. जिसे अब मैं दोबारा कहीं जाने न देना चाह रही हूँ।

घर के महूर्त की पूजा का समय हो आया है।

दृश्य बदली हो जाता है.. पंडितजी घर के महूर्त का हवन कर रहे हैं.. और सभी रिश्तेदार हवनकुंड के चारों तरफ़ बैठे हैं। मैं भी सभी के साथ पूजा में शामिल हूँ। पूजा के दौरान अपने खोय हुए हर रिश्ते को एकबार फ़िर से महसूस कर रही हूँ। पूजा समाप्त होने के पश्चात भोजन-पानी परोसने का दृश्य आ जाता है।

“ कैसी बनी है, सब्जी! नानाजी! मैंने बनाई है!”।

“ अरे! बहुत बढ़िया बेटा! तू तो होशियार है!।

नाना और नातिन का वार्तालाप हो रहा.. और बाकी सभी रिश्तेदार आपस में घुल-मिल रहे हैं. व बतिया रहे हैं।

अब मकान का महूर्त समाप्त हो जाता है.. सभी रिश्तेदारों के चलने का समय हो जाता है.. जाते वक्त सभी एक-दूसरे से गले मिल-कर विदा होते हैं। सभी रिश्तेदार अब चले गए हैं, और मम्मीजी अपनी जगह पर आकर बैठ गई हैं।

“ वैसे ठीक ही रहा सब-कुछ, हम दोनों ने ठीक ही मैनेज कर दिया”।

“ हाँजी! मम्मीजी! सब अच्छा रहा!.. सब लोगों को मकान भी बहुत पसन्द आया, और बाकी सारा arrangement तो था ही अच्छा”।

रात हो चुकी थी.. मकान का महूर्त भी समाप्त हो चुका था। माँ-बेटी आपस में बैठी बातें कर रहीं थीं। स्वर्ग लोक के अन्य सभी मकानों की लाइट जल उठती हैं.. माँ-बेटी की आपसी बातचीत जारी है..

पर्दा धीरे-धीरे नीचे गिरता है..” सबसे मिली “ नाम का नाटक यहीँ समाप्त हो जाता है। स्वर्ग-लोक का यह मकान के महूर्त का नाटक “ सबसे मिली “ सभी दर्शकों को बहुत पसन्द आता है.. तालियों की गड़गड़ाहट से सारा हॉल गूँज उठता है।

पर्दे के पीछे स्वर्ग-लोक के मंच का मकान बनाने के समान का अब पैक-अप हो रहा है.. और सारे कलाकार अपना रोल ख़त्म कर वापिस जा रहे हैं… मैं वहाँ मंच के एक कोने में पल भर के लिये अपने रिश्तों को वापिस आया देख, फ़िर से जाते हुए देख न पा रही हूँ.. मेरी आँखें आँसुओं से भर गई हैं.. “ यह, क्या! आप तो रुक जातीं, मम्मीजी! आप कहाँ जा रही हो! मुझे छोड़कर!”। अपनी भारी आवाज़ और भरे हुए गले से जाती हुईं, मम्मीजी से मैंने कहा था।

“ पर मेरा” मम्मीजी “ का रोल अब ख़त्म हो गया है.. दीदी! मुझे अब जाना होगा। दूसरे रोल की तैयारी जो करनी है”।

महिला यह मुझसे कहते हुए, वहाँ से चली गई थी। मेरी आँखों में भरे हुए आँसू पूरी तरह से छलक गए थे, और मैं रुदन करने से अपने-आप को रोक न पाई थी। क्या! था यह! .. सिर्फ पल भर का नाटक.. जहाँ मैं थोड़ी सी देर के लिये ही अपनों से मिल पाई थी। चाह कर भी कोई मेरे साथ वापिस न लौटा था… क्योंकि नाटक “ सबसे मिली “ अब ख़त्म हो चुका था.. और सभी को अपने नए किरदारों की भूमिका निभाने दूसरे नाटकों में जाना था।

ठीक इसी तरह हम सब भी एक रंगमंच के कलाकार हैं.. और अपने-अपने परमात्मा के दिये हुए रोल कर रहे हैं। परमात्मा अपने रचे हुए नाटक के हिसाब से हमारा रोल ख़त्म करता चलता है.. और रोल खत्म होने के पश्चात नए किरदारों में हमारा जीवन परिवर्तित होता चलता है.. यही सृष्टि का नियम है।