जब जिंदगी ने ऑंखें खोली थीं तो मैंने उससे हाथ मिलाया था!
अनगिनत वायदे थे जो जिंदगी ने मुझसे किये थे। मुझे साकार होने वाले सपने दिखाए थे। मुझसे कहा था – सत रंगी है दुनिया कृपाल! देखोगे तो दंग रह जाओगे। चलो, आओ आगे बढ़ो और एक के बाद दूसरा कीर्तिमान कायम करते ही चले जाओ .. मैं तुम्हारे साथ हूँ!
लेकिन जिस दिन सुरेश ने पदार्पण किया था उसी दिन से हवा का रुख मुझे मुड़ गया लगा था। सुरेश हमारे अंग्रेजी अध्यापक का बेटा था। अब उसे हर मायनों में मेरे साथ जोड़कर नापा जाने लगा था। अब हवा में बात थी कि प्रथम तो सुरेश ही आएगा – कृपाल नहीं! और यही हुआ भी था!
हम दोनों को लेकर अध्यापकों में दो गुट बन गये थे। सुरेश को प्रथम बनाने के लिए सारे गलत हथकंडे अपनाए गए थे। सुरेश प्रथम था और मुझे दूसरे नम्बर पर ला दिया गया था!
यह पहली शिकस्त थी मेरी!
अब मैंने पढ़ने का इरादा ही बदल दिया था। मैं स्कूल गया ही नहीं था। मुझे स्कूल जाने का उत्साह सिमट सा गया लगा था। मुझे लगा था कि – मेरे गुरुजन जिन्हें मैं पूज्य मानता था, उनका मान करता था और उनमें अटूट श्रद्धा लेकर चलता था, अगर पढ़े-लिखे लोग होकर बेईमान हो सकते थे – तो अगर अनपढ़ डाकू बन रहे थे तो दोश उनका भी नहीं था! और अगर आगे पढ़-लिख कर मुझे बेईमान ही बनना था – तो फायदा क्या था पढ़ने का?
“स्कूल क्यों नहीं आता ..?” मेरे मित्र कारे ने घर पर आ कर मुझे ललकारा था। “अरे, है क्या ये साला सुरेश?” वह कह रहा था। “बेईमानी से नम्बर हासिल किये हैं! मास्टर का भतीजा है .. इसलिए ..?”
“छोड़ यार!” मैंने बेमन कहा था। “क्या धरा है पढ़ाई-लिखाई में?” मैंने उससे पूछा था। “मैं न पढ़ूँगा अब!” मैं साफ नाट गया था।
“तो मैं भी स्कूल नहीं जा रहा हूँ।” उसका उत्तर था।
और वह रोज-रोज मेरे घर आता था, मेरे ही साथ रहता था पर स्कूल नहीं जाता था। और अंत में वह मुझे स्कूल लेकर ही लौटा था।
लेकिन अब स्कूल आने वाला कृपाल कोई और ही था!
मैंने अब जिंदगी को बिन पतवार की नाव की तरह मझ धार में खुला छोड़ दिया था! “डूब या तैर, तेरी मर्जी!” मैंने उससे हाथ छुड़ाते हुए दोस्ती तोड़ ली थी।
अब नए-नए दोस्त अब रहे थे। बहुत सारे विद्यार्थी मिडिल स्कूलों से आ गये थे। शिव चरन भी उनमें से एक था। वो मेरे और कारे के बीच में आकर बैठा था तो कारे ने जंग छेड़ी थी। वह नहीं चाहता था कि हम दोनों के बीच कोई तीसरा घुसे। जब मार-पीट पर नौबत आ गई थी तो मैंने कारे को समझा लिया था और शिव चरन को स्थान बांट दिया था!
“ये मिडिलची है, कृपाल!” कारे ने मुझे सतर्क किया था। “कम मत तोल इसे!” वह कहता रहा था। “अव्वल नम्बर का ..”
“छोड़ यार!” मैंने सहज अंदाज में कह दिया था। “मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा?” मैंने लापरवाही से कहा था।
सच भी था। अब मैं किसी भी पूर्व ग्रह से मुक्त था। मैं हर तरह से स्वस्थ और मस्त था। क्लास को टॉप करने की या कि प्रथम आने की लालसा से मैं तो पहले ही ना कर चुका था। जो हो, सो हो – का एक सहज अंदाज अपनाते हुए मैं बिन पतवार की नाव की तरह जीवन प्रवाह में बहने लगा था!
“आप लोग मुंह देखा टीका करते हैं!” कारे अंग्रेजी अध्यापक तिवारी जी से लड़ रहा था। “दोनों कॉपियों को देखो!” उसने मेरी और अपनी परीक्षा पुस्तिकाएं उनके सामने रख दी थीं। “कृपाल को 32 नम्बर और मुझे 14 नम्बर?” वह गरजा था। “क्यों भाई!” उसने पूछा था। “अरे, वर्ड बाई वर्ड नकल की है!” उसका इजहार था। ” काट लो हैंड राइटिंग के पांच नम्बर!” वह बता रहा था।
और जब तिवारी जी ने उसे शून्य थमाई थी तो तड़प कर 14 नम्बर पर ही राजी हो गया था!
अच्छा परिहास हुआ था उस दिन। मेरी तो रूह ही खिल गई थी!
“कहते हैं कि कृपाल किसी को आगे नहीं निकलने देता!” नए मित्र शिव चरन की शिकायत थी। “कहते हैं कि ..”
“तुम क्या कहते हो?” मैंने मुड़कर उसे पूछा था। “प्रथम आना चाहते हो – आओ! मैं हूँ कौन रोकने वाला?” मैं एलान कर रहा था। “मेरी बात छोड़ो!” मैंने स्पष्ट कहा था। “मैं तुम्हारे लिए ..”
और शिव चरन मुझसे पांच नम्बर ज्यादा हासिल कर प्रथम घोषित हुआ था। मैंने प्रसन्नता व्यक्त की थी। लेकिन उसे अभी भी संतोष नहीं था। उसकी नजर थी कि वो डिबेट में भी हाथ मारे और नाम पा जाए। मैंने भी वायदा किया था कि मैं डिबेट की कोई तैयारी नहीं करूँगा और उसे पूरा-पूरा मौका दूँगा कि वह अव्वल आए।
वार्षिक उत्सव मना रहा था स्कूल। धूम-धाम मची थी। मैं कहीं नहीं था। अब तो मैं डिबेट की तैयारी भी नहीं कर रहा था। धरम सिंह और महाबीर की धाक जमी थी। दोनों चोट के खिलाड़ी थे। उन्हीं ने सारे इनाम जीत लेने थे। धरम सिंह शिव चरन की मौसी का बेटा था। अतः शिव चरन को लगता था कि वह भी धरम सिंह की विजय में शामिल था। और अब मैं तो उसके लिए बहुत पीछे छूट गया था!
“क्या तुम धरम सिंह और महाबीर को बीट कर सकते हो?” शिव चरन ने अब मुझे एक और भी प्रश्न पूछ लिया था। वह इस प्रश्न का उत्तर जानता तो था, पर उसने मुझे पूछना भी उचित माना था ताकि मेरा पूरी तरह से मान-मर्दन हो जाए!
“क्यों नहीं!” मैंने उसकी आशा के विपरीत उत्तर दिया था। “अभी मेरी उम्र थोड़े ही चुकी है?” मैंने तर्क दिया था।
और मेरे इस उत्तर को लेकर शिव चरन ने स्कूल में एक डिबेट ही शुरू कर दी थी – कृपाल कहता है कि वो धरम सिंह और महाबीर को बीट कर सकता है! उसने मेरे इस उत्तर को अफवाहों की तरह उड़ाया था। उसे उम्मीद थी कि सारे लोग मुझ पर हंसेंगे क्यों कि मैं एक मरियल सा लड़का कितने ऊंचे बोल बोल रहा था? लेकिन न जाने क्यों कोई भी न हंसा था और न ही किसी ने प्रतिवाद किया था!
लेकिन मेरे मन में एक गांठ बन गई थी!
“वार्षिक उत्सव की तैयारियां नहीं करनी कृपाल ..?” वाइस प्रिंसिपल एल एन साहब ने मुझे बुला कर उलाहना दिया था। “अरे भाई! कितना काम है? कल से स्टाफ रूम में बैठो और सब कुछ तैयार करा डालो!” उनके आदेश आये थे।
“क्या जरूरत है सर!” मैंने यूँ ही कहा था। “व्यर्थ में तीन चार दिन की मशक्कत चलेगी?” मेरा विरोध था।
“क्यों भाई क्यों?” एल एन साहब चौंके थे। “इतना वक्त तो लगेगा ही!” वो बोले थे।
“मैं तो कहूँगा सर कि एक घंटे में पूरा काम हो जाएगा!”
“वो कैसे भाई?”
“सारे इनाम तो धरम सिंह और महाबीर ही जीतेंगे!” मैंने बताया था। “तो फिर दोनों को यहां बुला कर आधे-आधे इनाम बांट दें!” मेरा सुझाव था। “समय भी बचेगा और ..”
“मतलब क्या है, तुम्हारा?”
“अन्य विद्यार्थियों को तो मौका मिलने से रहा। हर इवेंट में या तो धरम सिंह होगा या फिर महाबीर! तो फिर ..?”
“फिर क्या करें?”
“कोई भी प्लेअर दो से ज्यादा इवेंट में भाग न ले – नियम बना दें ताकि ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों को अवसर मिले और वो ज्यादा से ज्यादा भाग लें! तभी तो सार्थक मानेंगे उत्सव को!” मैंने साफ-साफ कहा था।
अब हल्ला मचा था। धरम सिंह और महाबीर तुन्नाते-फुन्नाते घूम रहे थे। उन्होंने उत्सव में भाग न लेने का एलान कर दिया था। लेकिन अन्य सभी तो खुश थे। शिव चरन ने ही मुझे सशंक निगाहों से घूरा था। मैं तटस्थ था!
अब मुझे संदिग्ध निगाहों से देखा जा रहा था। धरम सिंह और महाबीर ने खुल कर कहा था कि मैंने ही एल एन साहब को उलटी पट्टी पढ़ाई थी और मैं ही था जो उन दोनों के खिलाफ था! दोनों अपने अभिमान की बांह पकड़ प्रिंसिपल साहब के सामने पेश हुए थे।
“इसमें खिलाफ क्या है भाई?” प्रिंसिपल प्रकाश चंद उनसे पूछ रहे थे। “अगर ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थी भाग लें, सभी को मौका मिले, ज्यादा से ज्यादा लोगों को इनाम मिलें और ..”
“कृपाल नहीं चाहता सर कि ..”
“कृपाल ही क्यों ये तो विनोवा जी भी नहीं मानेंगे!” वह तनिक हंसे थे। “यही तो सर्वोदय है!” उन्होंने बताया था। “कुल दो विद्यार्थी ही सारे इनाम पा जाएं – इस एबसर्ड!” उन्होंने जोर देकर कहा था।
मेरे विचार को और भी बल मिला था, और भी बड़ा हुआ था और अब एक नई उमंग का जन्म हुआ लगा था!
शिव चरन चुपचाप डिबेट की तैयारियां कर रहा था। उसे किसी न किसी तरह मुझे डिबेट में हराना था!
लेकिन मैं तो एल एन साहब के साथ उनकी मदद करने में व्यस्त था। उत्सव पूरे जोशो-खरोश के साथ मनाया जा रहा था। पूरे मनोयोग से सभी विद्यार्थियों ने प्रतियोगिताओं में भाग लिया था। केवल वो दो ही थे – जिनके मुंह अब भी सूजे हुए थे! वो तो मुझे ही अभियुक्त मान बैठे थे।
और जब डिबेट हुई थी तो शिव चरन ही पहला वक्ता था। उसने अपनी डिबेट को एक-एक अक्षर पर जोर देकर पढ़ा था। लेकिन श्रोताओं के बीच एक घोर सन्नाटा ही खेलता रहा था! मेरा अंत में नम्बर आया था। मैं यूँ हीं के अन्दाज में अपनी फर्राटेदार शैली में बोलने लगा था। जो मन आया मैंने बोला था। चूँकि अव्वल आने का तो मुझे कोई शौक रहा ही न था अतः मैं मुक्त था, स्वस्थ था और अपने मन की उमंग के साथ अपने विचारों के उजालों की उड़ान में श्रोताओं को भी साथ ले उड़ा था!
खूब-खूब तालियां बजी थीं और निर्णय भी उजागर हो सबके सामने आ बैठा था!
अन्त में जब इनाम बंटे थे तो धरम सिंह और महाबीर अपने दो-दो इनाम पकड़ विद्यार्थियों के बीच आ बैठे थे। लेकिन नए-नए इनाम लेते विद्यार्थियों के चेहरे गुलाबों से खिले थे। उनके खुले-खिले चेहरों पर एक अनूठा उत्साह भरा लगा था! लगा था जैसे एक जन क्रांति हो कर चुकी थी! एक परिवर्तन था जो अभी-अभी आया था और हम सबके बीच आ बैठा था! और अब भविष्य के लिए भी एक मुद्दा तय हो गया था कि एकाधिकार का दंभ एक भ्रम जाल की तरह आज से ही समाप्त माना जाए!
कारे ने मेरी ऑंखों में झांका था और वह खूब जोरों से हंसा था!
सब खुश थे लेकिन शिव चरन उदास था!
और मैं – मस्त और स्वस्थ था और अपने एक अदद डिबेट के इनाम को लेकर खरामा-खरामा घर चला आया था!

मेजर कृपाल वर्मा