“फॉट विद द ओल्ड मैन!” राहुल सोफी के सामने खड़ा-खड़ा सफाई दे रहा था। “लेकिन ये आदमी चीज क्या है जी?” राहुल ने सोफी की आंखों में देखा है। “काठ ही कहो, निरा काठ!” वह बताता है। “भावना नाम की किसी वस्तु को यह जानता तक नहीं। जरूर कोई बेरहम ..”
“कौन आदमी?” सोफी पूछ ही लेती है। वह तटस्थ है। वह विचार मग्न है। राहुल के चेहरे पर छपे प्रपंच को वह पढ़ने का प्रयत्न करती है।
“यौर डैड!” राहुल सपाट आवाज में कहता है। “मैंने खूब कहा – भाई थोड़े दिन और छोड़ दो उसे। सोफी का मन लग गया है वहां। वह प्रसन्न है। लेकिन ना! ही वॉन्टस यू बैक। एंड इमीडिएटली।” राहुल हाथ झाड़ता है। “वॉट ए मैन यार? करते क्या हैं ये श्रीमान?” राहुल सीधा प्रश्न दागता है।
“रिटायर्ड फौजी हैं।” सोफी सहज भाव से कहती है।
“बाप रे बाप! भगवान बचाए! तभी तो मैं कहूं कि ..?”
सोफी चुप थी। वह गंभीर थी। वह एक साथ सर रॉजर्स और राहुल के बारे में सोच रही थी। दोनों ही शायद अपनी जासूसी की कला में दक्ष थे। कोई कह ही नहीं सकता था कि राहुल एक जासूस हो सकता था। यहां तक कि बेचारी मां सा को पता तक नहीं था कि उनका लाड़ला बेटा कैसी-कैसी मुसीबतों के साथ खेलता रहता था।
जासूसी, युद्ध लड़ने से पहले लड़ा वह युद्ध है जिसपर सारी जीत हार का भार लदा होता है। दुश्मन की जानकारी मुकम्मल होना युद्ध जीत जाने का पहला मुद्दा होता है। और सर रॉजर्स इस कला के उस्ताद हैं – वह मानती है। वरना तो वियतनाम की जेल से सात सालों के लंबे अरसे के बाद यों भाग कर अमेरिका पहुंच जाना कोई गुड़िया गुड्डों का खेल नहीं।
और राहुल? इनके भी कोई कारनामे तो जरूर होंगे! सोफी सोचने लगती है। वरना सर रॉजर्स इनका चुनाव करते ही नहीं।
“जाना तो होगा ही सोफी!” राहुल अब उदास है। “सॉरी सोफी!” वह सोफी के बहुत निकट आ गया है। “ऐसा तो नहीं कि ओल्ड मैन इज इन हरी टु गैट यू मैरिड?” राहुल एक बेतुका सा प्रश्न पूछ लेता है।
प्रश्न है कि एक जादू की छड़ी का काम करता है। सोफी के देखे चंद पलों पहले के एक स्वप्न को उसके सामने ला खड़ा करता है।
वह और राहुल उदयपुर स्थित रॉयल पैलेस में भारतीय परंपरा के अनुसार प्रणय बंधन में बंधने के लिए सजे-वजे खड़े हैं। सभी भारतीय हैं। सब कुछ उसी तरह है जिस तरह सोफी सोचती रही है। मंत्रोच्चार की धुन, देसी बैंड-बाजों का ठठ, राजस्थानी धुनें बजाता और राजपूत स्त्रियों के गीतों की धुनें .. और .. और हां मां सा? मां सा का गुलाब सा खिला चेहरा देख सोफी का भी मन खिल उठता है। और फिर उसकी अपनी मां का चेहरा भी उसे याद हो आता है।
जालिम को भूल कैसे गई सोफी? मां सा का मारा वो मायावी मंत्र – घर आंगन में किलकारियां भरते बच्चे और चहकता आस-पास .. एक घर परिवार और .. एक पुरुष? हां, एक पुरुषार्थी पुरुष और उसका सहवास?
“जाना तो होगा ही!” सोफी मन में दोहराती है। “सर रॉजर्स के पास जरूर कोई खास खबर होगी।” वह मन में दोहराती है। “और ये श्रीमान जी?” वह राहुल को आंखें भर कर देखती है। लेकिन अपने मन के भाव व्यक्त नहीं करती।
एक जासूस के सामने अब दूसरा जासूस जो डट जाता है।
हां, मां सा को सोफी का जाना बहुत अखर गया है।
मां सा की आंखें सजल हैं। उनका मन उदास है। वह खोई-खोई सी इधर-उधर डोल रही हैं। उनका मन आज काम में रम नहीं रहा है। और दिनों जैसी चहक और चुहल उनकी वाणी में नहीं है। लेकिन क्यों? क्या वह सोफी को अपनी बहू तो नहीं मान बैठीं?
“मेरा इरादा तो मुझे भी पता नहीं मां सा!” सोफी मूक संवाद बोलती है। “मैं आपको झूठा वायदा नहीं दूंगी।” सोफी गंभीर स्वर में कहती है।
मां सा ने आंसू पोंछ लिए हैं। शायद उन्होंने भी पराई चीज समझ कर सोफी को छुआ तक नहीं है। वह जानती हैं कि स्त्री का गात उस समय तक कोरा होता है जिस समय तक एक पुरुष उसे स्पर्श नहीं कर लेता, और उस स्पर्श के बाद से ही तो स्त्री का जीवन आरंभ होता है।
राहुल के बप्पा का स्पर्श मां सा आज तक कहां भूली हैं।
राहुल का जासूस होना फिर एक बार सोफी को अखर गया है।
न जाने क्यों वह अपने राणा सांगा और पद्मिनी के प्रसंग को काट कर अकेली अमेरिका जाने के लिए खड़ी हो जाती है।
“अबकी बार साउथ का टूर बना कर आना सोफी।” राहुल मांग करता है। “और हां गाइड तो मैं ही होऊंगा!” वह हंसा है। “तब तुम देखना मेरी तैयारी।” वह अपनी शेखी बघारता है। “इतिहास का एक-एक पन्ना ..”
लेकिन सोफी हंसी है। वह जोरों से हंसी है। वह हंसती ही रही है। राहुल बमक जाता है। वह सहम जाता है। लेकिन सोफी दिल खोल कर हंसती रहती है।
“वॉट एन एक्टिंग?” सोफी सोचती है। “सुपर्ब एक्टिंग करता है राहुल।” वह अपने मन में दोहराती है। “कितना भोला दिखता है ये आदमी? वह अनुमान लगाती है। “और रॉबर्ट?” न जाने कहां से रॉबर्ट उसके पास आ खड़ा होता है। “बिलकुल भोंदू है रॉबर्ट।” सोफी फिर से हंसी है। “एक दम डोप है।” न जाने क्यों आज उसे रॉबर्ट अच्छा सा लगा है। “कोई अलछल नहीं है रॉबर्ट में। एक सपाट रोमांटिक किताब का खुला पन्ना है वह। और राहुल ..?” उसने फिर से निगाहें उठा कर राहुल को परखा है। “खोजना होगा इस आदमी को।” वह निर्णय लेती है।
“क्या कुछ गलत कह दिया मैंने?” राहुल सकपका कर पूछता है।
लेकिन सोफी मौन ही बनी रहती है। वह कोई उत्तर नहीं देती।
“सोफी ..!” बतासो रो पड़ती है। “तेरा जाना कहीं मेरी जान न ले ले!” वह सुबकियों के बीच से कहती है। बतासो लिपट जाती है सोफी से। सोफी कुछ समझ नहीं पाती। बतासो भी अब उसके लिए एक रहस्यमय पहेली बन जाती है।
लो, कालिया भी आ गया!
वह दो ऊंट लाया है। दोनों ऊंट सजेवजे दो छोटे-छोटे पहाड़ों से रेत पर आ खड़े होते हैं। सोफी उन दोनों ऊंटों को अँखिया कर देखती है।
“आप का जाना जमा तो नहीं सा!” कालिया कह रहा है। “मेरा तो मन था कि आपको काली खो ले चलता।” वह कह रहा है।
“तो काली खो नाम है उस जगह का?” सोफी चहक कर पूछती है।
“हां सा! काली खो ही कहते हैं उसे। कई योजन पार चलकर काली खो आती है।” कालिया एक रहस्य पर से परदा उठाता लगता है। “लेकिन मेरे तो राजू गाजू सीधे वहीं लगते हैं जा कर!” वह अपने दोनों ऊंटों को देखता है।
“तो राजू गाजू हैं ये दोनों?” सोफी प्रश्न करती है।
“हां सा!” कालिया हंसता है। “कितनी समझ है इन दोनों में!” वो ऊंटों की प्रशंसा करता है। “और मैं ठहरा निरा मूरख!” वह हाथ फैला कर बताता है।
लेकिन अब सोफी जानती है कि न तो कालिया मूरख है और न ये बतासो अनजान है। ये दोनों भी सर रॉजर्स के चुनिंदा दो मोहरे हैं। क्या कमाल है – सर रॉजर्स का? सोफी अपने डैडी की दूर दर्शिता पर हैरान है।
“चलते हैं सा!” कालिया कह रहा है। “लंबा रास्ता है।” उसने सोफी को समय का ज्ञान कराया है। “लौट कर भी तो आऊंगा!” वह कहता है।
सोफी इशारा पाते ही राजू को थपकी देती है। राजू अपनी गर्दन पर सोफी के पैर को टिकाता है। सोफी एक छोटी छलांग के बाद राजू पर कसी काठी पर जा बैठती है। कालिया गाजू पर सवार हो जाता है। दोनों ऊंट आदेश पाते ही चल पड़ते हैं।
राहुल तनिक हिला है। मां सा भी तनिक हिल हिला कर ठहर गई हैं। सोफी ने मुड़ कर उन दोनों को नजरों में भर कर देखा है। फिर वह अपनी दृष्टि मोड़ लेती है।
न जाने क्यों रेगिस्तान के इन सूने प्रसारों ने उसका मन मोह लिया है। अब वह इन सूने-सूने विस्तारों को छोड़ संपन्न अमेरिका की ओर जा रही है। अचानक ही उसके सामने अपना घर, अपना फार्म, अपना घोड़ा और अपना अकूत वैभव कौंध सा जाता है। कितनी विविधता है – दोनों ठिकानों के बीच वह सोचती है। लेकिन सुख जैसी कोई चीज कहां मिले – आप नहीं जानते। और विपन्नता तो भ्रामक शब्द है। आदमी के मन को जो सुहाए वही संपन्नता होती है।
“क्या रॉबर्ट अपने वर्ल्ड टूर से लौट आया होगा?” सोफी अचानक ही स्वयं से प्रश्न करती है। “क्या कहेगी वह रॉबर्ट से? यही कि वह अपना रास्ता नापे। कहेगी कि वह अब राहुल के साथ है। और क्या बताएगी कि उसका मन बहक गया है।”
व्याकुल है सोफी। व्यथित है उसका मन। जुदाई जैसा कुछ आज उसके मन में भरने लगता है। हालांकि उसने अपने शरीर के हाल को राजू की हाल के साथ मिला लिया है फिर भी शरीर से कहीं ज्यादा उसका मन डोल रहा है।
प्यार की पीड़ा का पहली बार अहसास होता है सोफी को।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड