पंडित कमल किशोर पत्नी राजेश्वरी के साथ दो माह के लिए यू एस जा रहे थे और कस्तूरी किरन को बहिन की शादी करने केरल जाना था।
“मंदिर को किसी अंजान आदमी के हाथ सोंपना – मीन्स डिजास्टर।” राम चरन ये जानता था। ऑपरेशन वंडरफुल की तैयारियां जोरों पर थीं। “वॉट टू डू?” प्रश्न को लेकर चुपचाप लौटा था राम चरन।
तभी कोई आया था। उसने अंदर आने की अनुमति मांगी थी।
“कौन है?” राम चरन ने चौंकते हुए पूछा था।
“कोई जरनल साहब हैं – फौजी।” माया राम ने उत्तर दिया था।
राम चरन तनिक घबराया था। किसी फौजी के वहां आने का सबब वह समझ न पाया था। एक लमहे में अपना और अपने गाढ़े मित्रों का सैनिक जीवन दिमाग में कौंध गया था। एक मर गया था, दूसरा अटैच हुआ था और तीसरा .. वो ..?
“भेजो अंदर।” राम चरन ने दिमाग पर पहरा बिठा माया राम से कहा था।
एक लंबा चौड़ा आदमी अंदर आया था। सफेद हाफ शर्ट पहनी थी। कॉलर खुला था। काली पैंट पहनी थी। पैरों में सैंडिल लटके थे। रंग गोरा चिट्टा था। आंखें बूढ़ी और निस्तेज थीं। उदास-उदास था चेहरा।
“गुड मॉर्निंग।” अंदर आते ही फौजी ने स्वभावतः अभिवादन किया था। राम चरन को कुछ नया न लगा था। वह तो स्वयं सब कुछ जी चुका था।
“गुड मॉर्निग सर।” राम चरन ने उसका हंस कर स्वागत किया था। “बैठिए।” उसने आदर पूर्वक आग्रह किया था। “वॉट कैन आई डू फॉर यू?” राम चरन ने सीधा प्रश्न पूछा था।
“ए लौट!” उसका उत्तर था। “आई एम जरनल फ्रामरोज – नाओ रिटायर्ड!” वह अपना परिचय दे रहे थे। “एंड आई हैव नो वेयर टू गो।” उन्होंने आने का कारण बताया था। “एक घर चाहिए।” उनकी मांग थी। “और मैं ये जानता हूँ कि .. मेरे पास ..” वो चुप हो गए थे।
“बैठिए तो।” राम चरन तनिक हंसा था।
“मेरे पास पैसे ..।” बैठते हुए उन्होंने कहा था।
“आप घर लीजिए, पैसे छोड़िए।” राम चरन मुसकुराया था। “सात नम्बर बंगला है। आप का परिवार ..!”
“मैं हूँ, रोजी मेरी पत्नी है। रानी मेरी बेटी है – जो सर्विस करती है। किसी जर्मन से उसकी दोस्ती है। उसी से शादी करेगी – पता नहीं कब।” वो तनिक हंसे थे। “पूरी उम्र लगा कर ..”
“कुछ नहीं कमाया?” राम चरन ने हंस कर पूछ लिया था। “बट यू आर स्टिल एन ऐसेट, सर।”
“कोई पूछता तक नहीं मेरे भाई। कोई काम नहीं नाम ही नाम रह गया है।”
“ये नाम हमें दे दो?”
“ले लो।”
“साथ में ऑफिस है। कल से आ कर ढोलू ऐस्टेट को संभाल लो।” राम चरन का आग्रह था।
“और घर ..?”
“ये रही चाबी – बंगला नम्बर सात की, आज से आपका हुआ।”
“भाई! मजाक तो नहीं कर रहे हो?”
“नहीं सर। आप देश की आन, बान शान हैं। आप ने जो ..”
जरनल फ्रामरोज अचरज भरी आंखों से राम चरन को देख रहे थे। वो आदमी – आदमी नहीं मानो कोई फरिश्ता था। और जो उन्हें मिल रहा था वो कोई फेवर नहीं वरदान था। बिन मांगे मेवा मिलने की बात कभी सुनी थी, लेकिन आज तो वह सच हो रही थी।
“भाई करना क्या होगा?” जरनल फ्रामरोज ने चलने से पहले पूछा था।
“बहुत काम है आप के लिए सर।” राम चरन हंस रहा था। “चाय पीते हैं।” उसने आग्रह किया था। “गोआ में सैविन स्टार प्रोजैक्ट तैयार होने वाली है। आप को मिलेगी उसकी जिम्मेदारी। उसके लिए स्टाफ और सहायक सभी आप ही भर्ती करेंगे।”
एक और आश्चर्य जरनल फ्रामरोज के पास आ बैठा था।
“ये आदमी है कौन?” जरनल फ्रामरोज के दिमाग में एक प्रश्न पैनी कील की तरह ठुक गया था। “बट बैगर्स कांट बी चुजर्स।” उन्होंने स्वयं ही उत्तर दिया था। “रहने के लिए कोई तो ठिकाना चाहिए?” उन्होंने स्वयं को समझा लिया था।

मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड