मुनीर खान जलाल को शगुफ्ता के साथ रोता बिलखता छोड़ राम चरन अकेला इस्लामिक सम्मेलन में शरीक होने चला आया था।
राम चरन जमा इस्लामिस्टों के लिए नया था। लेकिन वह अनाड़ी न था। वह इन पुराने पुरोधाओं के लिए एक नया और चतुर खिलाड़ी था। उसने दो नहीं चार-चार आंखों से सामने बैठे उन मुल्ला मौलवियों को देखा परखा था जिनके जंग खाए इरादे अब काम नहीं कर पा रहे थे। उन्हें किसी नए और होनहार शहजादे की तलाश थी जो इस्लाम की डूबती नइया को पार लगा देता। राम चरन को पता था कि वो लोग चाहते क्या थे – और उसे देना क्या था। वह अब न तो मुसलमान था और न ही हिन्दू था। जो भी वो था – अब केवल और केवल अपने लिए था – संघमित्रा के लिए था।
“तुम्हारे खरीदे द्वीप पर नहीं शगुफ्ता अब मैं अपने जीते महाद्वीप एशिया में बसूंगा।” राम चरन हंस रहा था। “आँखें तो मेरी अब आ कर खुलीं, डियर।” वह बता रहा था। “मैं तो औरों के लिए कमाता रहा – खटता रहा। कभी देश के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर मैंने जान झोंकी। लेकिन अब मैं अपने लिए ही लड़ूंगा।” राम चरन का खुलासा था। “इस्लाम की बैसाखियों पर सफर करने वाले ये बूढ़े शासक अब थक चुके हैं।” उसने जमा मौलवी और मुल्लाओं को गौर से देखा था। “हाहाहा। तुम चलो शगुफ्ता! मैं भी कहीं न कहीं पहुंच जाऊंगा।” ये अकेले राम चरन का रिसॉल्व था।
“हमें हिन्दुस्तान से बड़ी उम्मीद है मुनीर साहब।” जमील मुलादी तुर्क ने एक लंबे वाद विवाद के बाद अकेले मुनीर को संबोधित कर कहा था। “हिन्दुस्तान फतह होने के बाद तो यूरोप और अमेरिका हमारी झोली में आसानी से आ गिरेगा।” वह तनिक मुसकुराए थे। “ये लोग लड़ने का जज्बा खो बैठे हैं।” उनका तर्क था। “अकेला हिन्दुस्तान ही है जो जंग में उतर सकता है।” उनका कहना था। “आप की तैयारियां ..?”
राम चरन बड़े ही इत्मीनान के साथ कुर्सी से उठा था। उसने जमा जमात को नई निगाहों से देखा था। उसे पता था कि जमात क्या सुनना चाहती थी। बड़ी ही संगठित आवाज में राम चरन ने अपनी की तैयारियों का बखान किया था।
“आप का हुक्म आते ही हम कश्मीर से चलकर सरहिंद पहुंचेंगे।” राम चरन बता रहा था। “लखनऊ से दिल्ली होते हुए हम इन से सरहिंद पर मिलाप करेंगे।” राम चरन ने जमात के खिलते चेहरों को पढ़ा था। “मद्रास से उठा भयानक सैलाब हैदराबाद पहुंचेगा।” उसने खुलासा किया था। “तभी बंबई में इस्लाम के गरजते बादल अहमदाबाद – गुजरात जा पहुंचेंगे। और बंगाल और बांग्लादेश मिल बैठेंगे और चलकर पटना पहुंच जाएंगे।” राम चरन की पूरी जंग की मुहिम को सबने सुना था। “जहां तक दिल्ली का सवाल है इसे हम इस बार कब्रगाह बनाएंगे। बाग बगीचों के बीच अपने पूर्वजों के मजारों को महफूज रख कर इसे मुगल म्यूजियम बना कर इबादत के लिए सुरक्षित रख देंगे।” तालियां बज उठी थीं। “और हैदराबाद अब खलीफात की सीट ऑफ जजमेंट बनेगा।”
खुशी की लहरें उठीं थीं और जमात के आर पार होती चली गई थीं।
जमात को उनका चिर इच्छित शहजादा मिल गया था। उन्हें विश्वास हो गया था कि ये मुनीर खान जलाल उन्हें हिन्दुस्तान जीत कर दे देगा और ..
“बहुत खूब। बहुत खूब।” जुमलों ने जन्म लिया था। “जनाब। हम भी आपका खयाल रक्खेंगे – मुनीर साहब।” एक वायदा लौटा था जो सरासर झूठा था।
मौसम के साथ-साथ महफिल का मूड भी बन आया था। जोरों का जश्न मना था। सब का दुलारा राम चरन – मुनीर साहब बना उन हारे थके पुरोधाओं का प्यार लूट रहा था।
“सोने की चिड़िया नहीं जनाब अब तो हीरों का हाथी है हिन्दुस्तान।” एक सही-सही अनुमान लगाया गया था और ये बात पूरे मुस्लिम जगत में खुशबू की तरह फैलती ही चली गई थी।
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मेजर कृपाल वर्मा रिटायर्ड