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राजा दशरथ

Raja Dashrath
प्यारे ये जेल है,
सीखचों से बाहर झांकती जिन्दगी ...
रंग भरे सपनों को निहारती जिन्दगी ..
बुहारती पाप-पुण्यों के पथ -बेजान बैठी जिन्दगी..
अजीब ही एक खेल है,
प्यारे ये जेल है।
कतरे-कतरे कटते दिन से टपकता लहू ...
फूटते फफोलों के आर-पार से आती पीड़ा ...
यादों के परिंदों की देहों से टपकती अपार वेदना ...
क्यों हुआ ..कैसे हुआ - का चुन्मुनाता एहसास ''
गुजरती रश्मियों की रेल-पेल है ..
प्यारे ये जेल है।
भाग-भाग कर आती हैं - यादें , मुरादों की कतारें ....
ढलते दिन के साथ गरूव हो जाती हैं - सभी मुलाकातें ...
निःशेष बचता है - मौन ,अँधेरा , पश्चाताप की ललकारें ..
क्यों हो जाता है - ये सब - अपने ही हाथों ........?
जिन्दगी उल्टा खेल है,
प्यारे ये जेल है।

जेल से रिहा होने के एक साल बाद दशरथ फिर जेल में लौट आया है ।

एक जश्न जैसा मन रहा है . जैसे कोई उत्सव हो – सब मिल कर मना रहे हैं . तरह -तरह के अभिवादनों का जन्म हो रहा है . तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं । तरह-तरह के नाम धरे जा रहे हैं ।

“ओए ! मदारी लाल !!” भापे की कर्कश आवाज़ गूंजी है । सब ने भापे को घूरा है । सत्यधारी हरिश्चंद्र की भूमिका निभाता भापे तनिक मुस्कराया है । उस ने दशरथ को अपांग देखा है । दशरथ दुबला हो कर लौटा है । भापे को पता है कि जेल में पाँच साल में दशरथ में जान पड़ गई थी । लेकिन आज जैसे वह मरणासन्न ही था । “आ गया – ससुराल में …?” भापे ने व्यंग मारा है .

हां-हां – का शोर….तालियाँ …गालियाँ …सब चला है । कहीं सच ही कहा है , भापे ने -सभी बंदी भाई मान लेते हैं ।

“भूखा मर गया , भापे ! ” दशरथ ने भापे के पैर छु कर कहा है । “हरामजादे लोग बैठे हैं – बाहर !” उस का चहरा विद्रूप हो आया है । “जेल से छूट कर आया है – यह जान कर हर किसी को करंट मार जाता है…जैसे !” सच्चाई बता रहा है – दशरथ । “नहीं,भाई ! तुम्हारे लायक कोई काम नहीं । ” उस का चेहरा काला पड़ गया है । ” मन तो होता कि …साले का …मर्डर कर दूं ! पर ….फिर ….”

सारे बदी भाइयों के चेहरे ही उतर गए हैं । जैसे सब के लिए जेल से छूटने के बाद यही भयावह स्थिति है – बाहर ! कैदी का खिताब पा कर – जेल से बाहर निकलने के बाद भी , आदमी जैसे जेल में ही बना रहता है !

“काम नहीं मिला , कोई ….?”चटनी ने पूछा है ।

“दस हज़ार की नौकरी मिली थी ” दशरथ ने सूचना दी है । “राम बाबू ने दया दिखा कर , रख लिया था !”

“राम ने ….दशरथ को नौकरी दी ……! हा-हा – हां…..!! हो-हो-हो….” एक हास्य लहरी उठ खड़ी होती है । “साला – घोर कलयुग है ….!!”

“की …क्यों नहीं , तूने …..?”हाथी पूछ रहा है । “बेबकूफ ….! दस हज़ार की नौकरी ….?”

अब दशरथ ने हाथी को घूरा है ।

हाथी – एक बूढा सरदार है । फटी कमीज़ और घुटनों तक लटक आए घुटन्ने को पहने खड़ा – नंगे सर …गंजा …सरदार ..एक दयनीय द्रश्य को जन्म देता लगा है ….दशरथ को ।

दशरथ जानता है कि …हाथी को उस के बेटों ने ही जेल में बंद करा दिया है । हाथी के नाम पर घर है । घर पर बैंक से मोटा कर्जा उठा लिया है – बेटों ने । हाथी से कर्जा चुकाने के लिए चेक दिलवा कर बाऊंस करा दिया है । बैंक ने केस कर हाथी को जेल में बिठा दिया है । बहू -बेटों के दोनों हाथों में लड्डू लगे हैं , बेटों के हाथों पैसे आ गए ….और बहुओं की …बूढ़े से जान छूट गई ! कौन सेवा करे …? ये तो सरकार ही पागल है जो …..इस हाथी को चराती है ……

“तुमने अच्छा उल्लू खींचा है .. सरकार का ….. काका श्री ?” दशरथ हंसा है । “साले …ये एक्ट ,कानून ….और धाराएं बनाने वाले …..मूर्ख हैं ! “

सब हंस रहे हैं …..जोर-जोर से हंस रहे हैं ….! यहाँ कानून पर खुल कर प्रहार होता है । कानून हो ही गया है – हास्यास्पद …….!!

“छोड दी …. दस हज़ार की नौकरी …..तूने …..?” नागिन का प्रश्न है ।

“ओ,ब्बे ! यतीम ….!!” दशरथ गरजा है! “कभी देखे हैं – दस हज़ार ….?” दशरथ का प्रश्न है ।

सभी जानते हैं कि नागिन अनाथ है । उसे अपने माँ -बाप तक का पता नहीं । कोई मंदिर के सामने उसे कूड़ेदान में पटक कर चली गई थी। बगैर नाम-गाँव के वह पंडित के पल्ले बंधा और उस ने तंग आ कर इसे जेल भेज दिया । उसे अब न कोई मिलने आता है ….न वह किसी को जानता है ! जाए तो जाए कहाँ ..?

“साले ! एक वक्त का बिल चुकाने के लिए …दस हज़ार काफी होते हैं ! जब मैं और सीमा बैठते हैं …”

“हो हो हो ….!! हा हा हा ……!!सीमा ……? ओब्बे ..साले …कमीने …तू नहीं सुधरेगा ……”

सीमा का नाम लेते ही एक औरत – गंध हर बंदी-भाई की नांक के आस-पास मंडराने लगती है । औरत ही जैसे उन सब की जान है …जहां है …मन है ….और मंजिल है ! हर आँख एक पल के लिए संजोए सपनों के पार देख लेती है ! सब की बांहों में अब ‘औरत’ है …सब अब संवाद बोलते हैं ‘ओ, माई डार्लिंग ….मेरी अपनी ….मेरी सर्वस्व ….तू ही….महान है ,री ……’

“ये वही……..चोट्टी है ….रे ….? सीमा ……….?” भापे पूछ रहा है । “इसी ने तो तुझे लात मार कर जेल भेजा था …?”

“अब वो बात नहीं है ,भापे !” दशरथ बताने लगा है । “सीमा मुझे प्यार करती है !

हा हा हा …..!! हो हो हो ….!! एक साथ हंस पड़े हैं – सभी बन्दी – भाई !

“सच, भापे …! मैं ….मैं …….”

“साले , बेबकूफ ….! औरत किसी की भी सगी नहीं होती !” भापे ने स्पस्ट कहा है । “औरत …और प्यार ….?”

दशरथ चुप है…..! आहात है …..!!

“ले , मारदिया …९०००० का हाथ …!!” अपनी ही आवाजें सुनता है – दशरथ ।

“दो दिन …फाइव -स्टार !” सीमा ने प्यार से केश को समेटा है । “ओए ! माई राजा ….!!” सीमा बेहद प्रसन्न है। “जुग -जुग जी, साले !” चूम लिया है , सीमा ने मुझे.. “चल सेमी फाइनल में, नया बना है, मिर्ची का है । ” सीमा बताती रही थी .

और वो दो दिन ….उस सेमी फाइनल पाँच सितारा होटल में …सीमा के साथ …..

‘क्या कुछ नहीं गुजरा ……रे ! काश …! उस सेमी फाइनल में ही …जिन्दगी का फाइनल …हो जाता …? सीमा के साथ …उसी की बांहों में …और उन पलों में ये सूरज न डूब जाता….और ना ही ये चाँद बाहर ही खड़ा रह जाता …सितारे भी उस समागम पर जा पहुंचते …जहाँ वक्त ठहर जाता है ….!!!! सीमा के साथ ….उफ़ …….

“हवा होती है – औरत …!” भापे फिर से बोल पड़ा है । ” हम से पूछ । ” वह उचक कर सब के सामने खड़ा है । ” एक से एक …तड़पती मछली -सी काया …एक से एक हसीं …और एक से एक …..”

“ओए …! भापे …..!!!!”

“मदारी लाल !हमने तो जी भर कर जिया जिन्दगी को……! चबा लेता था , मैं ….”

“डूबा कहाँ,भापे ….?”

“आदमी डूबता ही इसी महा सागर में है ! “टीसा है ,चटनी। ” मैं भी तो पिंकी पर मर मिटा था । अब तो वो मिलाई पर भी नहीं आती …?”

“नए के साथ …भाग गई, तेरी पिंकी …….”

हा हा हा …!! हो हो हो ………!!!

चलो रे ….!! चाय ले लो …………

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मेजर कृपाल वर्मा

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