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प्रेम कहानी

prem kahani


तेरी मेरी, मेरी तेरी प्रेम कहानी है मुश्किल दो लफ़्ज़ों में ये बयाँ न हो पाए। एक लड़का और एक लडक़ी की ये  कहानी है,नई दो लफ़्ज़ों में ये बयाँ न हो पाए।
हेमा के हज़ारों सपनें थे,अच्छी सुन्दर लड़की हुआ करती थी,अपने ज़माने में । हेमा के सपने नौकरी को लेकर,या फिर जीवन में कुछ करने के न थे, बल्कि उसके सपनें केवल अपने जीवन साथी को लेकर ही हुआ करते थे।हेमा मेरी बहुत ही करीबी सहेलियों में से आती है। अक्सर अपने दिल की बात मुझसे ही किया करती थी, जो वो और किसी से न कर पाती थी।कॉलेज में, मैं और हेमा एकसाथ ही पढ़े हैं, हमारी आपसी बातचीत में भी हेमा कभी भी जीवन में क्या करना है,या फिर जैसे आम पढ़ी लिखी लड़कियों के सपनें होते हैं, इस तरह की कोई भी बात न कर एक अजीब से ही ख़याल में खोई रहा करती थी। कभी किसी ख़ास इंसान या अपनी पसन्द का जिक्र कभी भी न किया था मुझसे, न ही कभी अपने जीवन साथी को लेकर कोई भी बातचीत की थी, अपनी तरह की एक ही दोस्त थी मेरी, हेमा। कभी -कभी मैं कॉलेज से हेमा के घर भी चली जाया करती थी, अच्छे संस्कारी लोग थे हेमा के घर वाले। पर घर परिवार को देखकर कभी ऐसा न लगा था, कि लड़कियों को पढ़ा लिखा कर नौकरी कराने के पक्ष में हैं। हेमा के परिवार वालों की सोच बस यही थी, कि लड़की या तो इंजीनयर डॉक्टर हो और नही तो भई ब्याह कर के अपना घर बसाए। मुझे ऐसा लगता है, बस!, इसी सोच के कारण हेमा का दिमाग़ कंफ्यूज रहता था,न तो बेचारी डॉक्टर इंजीनयर बन पाई..अब आसान थोड़े ही है, डॉक्टरी करना और इंजीनयर बनना।अपने खुद के परिवार के विचारों में इतनी दब के रह गई थी, की सुन्दर होने और क़ाबिल होने के बाद भी अपनी पहचान कहीं खो चुकी थी। कभी-कभी क्या होता है, कि और किसी के विचार और जीने का तरीका हमारे ऊपर इतना हावी होता चला जाता है, कि हम अपने आप को धीरे-धीरे खोने लग जाते है, हम अपने आप की कहीं खो रहे हैं, इस बात का एहसास हमें कभी-भी नहीं हो पाता। हेमा का दिमाग़ भी ऊँची-ऊँची उड़ाने भरा करता था, कमी तो कोई भी न थी…उसके वयक्तित्व में, पर फ़िर भी अपने आप को पहचानने से कहीं गलती कर रही थी। हम दोनों ने एकसाथ ही B.A की पढ़ाई ख़त्म कर ली थी। और अब M.A में दाखिला ले लिया था, M.A की पढ़ाई रेगुलर न करके कॉरेस्पोंडेंस में दाखिला लिया था, इसीबीच मैंने एक प्लेसमेंट एजेंसी से कॉन्टैक्ट कर एक छोटी सी कंपनी में अपनी नौकरी की बात कर ली थी, क्योंकि मैं पहले पैसे कमाना चाहती थी, घर-वर बसाने की बात तो मेरे दिमाग़ के ऊपर से ही चली जाती थी। मेरे पिताजी खुद भी C.R.P.F की नौकरी में थे, तो घर में नौकरी का रिवाज़ था। वैसे भी में एक दक्षिण भारत के संस्कारों में पली-बड़ी हूँ, तो हमारे यहाँ तो महिलाएँ नोकरी प्रधान ही होती हैं। बस!फिर क्या था, एक छोटी सी कंपनी में मुझे नौकरी मिल गई। उन दिनों इंटरनेट नया-नया था, मैने तुरन्त मेरी सहेली हेमा को फ़ोन करके अपनी नौकरी की खुश खबरी दी थी, और हेमा को भी अपने साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया था, हेमा से मैंने कहा था,”आजा यार हेमा अच्छा ऑफिस है, दोनों साथ काम करेंगें, इंटरनेट भी है, सीखने को मिलेगा”। हेमा ने मेरी इस बात पर कोई ख़ास ध्यान न दिया,क्योंकि उसका दिमाग़ अपने आप के हिसाब से न चलकर अपने परिवार के हिसाब से काम करता था। खुद क्या चाहती है ,यह दिमाग़ में बिल्कुल भी क्लियर न था, शादी करके घर बसना चाहती है, जीवन में कुछ और करना चाहती है, या फिर शायद किसी को अपना दिल दे बैठी है, एक अजीब सा कॉन्फिडेंस लिए लम्बे डग भरती पता नहीं किस ओर जा रही थी, खुद भी न जानती थी। पर कुछ भी कहो देखने में थी बहुत प्यारी, अच्छी तो लगती थी पर रहती थोड़ा कंफ्यूज थी। लेकिन मस्त-मोला टाइप की थी, और हो भी क्यों नहीं बचपन से किसी भी तरह का आभाव न देखा था  हेमा ने। मैं तो उसकी सहेली होने के कारण उसके बारे में जानती हूँ, आना जाना जो रहा है, मेरा हेमा के घर हमेशा से। खैर!में तो नौकरी से लग ही गयी थी, इधर हमारी पढ़ाई पूरी होने के बाद अंकल जी ने यानी हेमा के पिताजी ने उसका ब्याह  पक्का कर दिया था। हेमा ने लड़का खुद न देखा था, बस! पिताजी की पसन्द पर भरोसा करते हुए हाँ! कह दिया था। खैर!,अंकलजी ने हेमा से हाँ या ना का जवाब तो नहीं माँगा था, अपनी ही हाँ को हेमा की  हाँ में बदल दिया था। जिस हिसाब से हेमा ने मुझे बताया था, रिश्ता बुरा न लग रहा था, लड़के की फोटो वगरैह भी न देखी थी, हेमा ने…कहा न बस अंकलजी जी का ही फैसला था। बड़े तो हमारे हक में ही फैसला करते हैं, तो फैसला तो ठीक ही था। लड़का संयुक्त परिवार का था, फैमिली बिसनेस था, लड़के वालों का…किसी की भी आमदनी को लेकर कोई भी हिस्सेदारी न थी। हेमा के  ही ससुरजी के हाथ में पूरा बिज़नेस था। इतनी सी ही जानकारी हेमा ने मुझे फ़ोन पर दी थी। जो उसे उसके पिताजी द्वारा मिली थी। हेमा की ब्याह की तैयारियाँ हो चुकी थीं, अंकलजी ने हेमा के लिए अच्छे ख़ासे दहेज का भी इंतेज़ाम किया था। हेमा को उसके मायके वालों ने  गहना, गाड़ी कपड़े लत्ते सभी  कुछ दहेज में दिया था। बहुत ही  धूम-धाम से ब्याह किया था, हेमा का। ब्याह वाले दिन मैं भी गई थी हेमा से मिलने गई ,दोपहर को काम का लोड होने के कारण शाम को शादी अटेंड न कर पाई थी , हालाँकि हेमा को इस बात का बहुत बुरा लगा था, हम पक्के दोस्त जो थे, पर मैंने उसे भली भांति समझा दिया था। बहुत ही सुन्दर महेंदी लगी थी हेमा के हाथ व पैरों में। मेहँदी का रंग काफी लाल रचा था। फ़िलहाल तो हम कानपुर में रहते थे, पर हेमा का विवाह  बैंगलोर में तय हुआ था। सुना है,काफी अच्छी जगह है, बैंगलोर।  हेमा का विवाह हो चुका था ,मैं काफ़ी दिनों से न मिली थी, हेमा से। मैं भी अपनी नोकरी वगरैह में बिजी हो गयी थी, और मेरी सहेली अपने वैवाहिक जीवन में। फिर अचानक एक दो साल बाद मैने ही हेमा को फ़ोन लगाया था,पूछा था,”और सुना सब ठीक!जीजू कैसे हैं?तू खुश तो है, न”। हेमा ने धीमे से स्वर में उत्तर दिया था, आवाज़ में कुछ दम न लग रहा था, बोली थी,”हाँ!सब ठीक ही है,तू सुना”। हेमा के इस जवाब में थोड़ा सा फीकापन महसूस हुआ था, मुझे वो मिठास और जायका न था, जो कि एक शादी -शुदा लडक़ी की आवाज़ में होता है, हालाँकि मैं तो अभी कुँवारी ही थी, पर और शादी शुदा लड़कियों को देखकर एक्सपीरियंस तो हो ही जाता है। चलो कोई बात नही, होगी कोई बात मन में ज़्यादा विचार न आये थे। सोचा था, जब हेमा कानपुर आएगी अंकल आंटी से मिलने , तो एक बार जरूर मिलने जाउंगी। कुछ दिनों के बाद हेमा का आना हुआ था,और मैं हेमा से मिलने चली गयी। बहुत खुश हुए थे, हम दोनों एक दूसरे से मिलकर, तकरीबन दो साल बाद जो मिल रहे थे, हेमा की गोद में एक साल का बेटा भी था, बहुत ही प्यारा सा बेबी था , उत्कर्ष नाम रखा था, हेमा ने अपने बेटे का। बेटा भी हो गया, ब्याह भी हो गया, पर चेहरे पर एक अजीब सी उदासी थी, हेमा के चेहरे पर वो रौनक ही नहीं थी, जो कि एक शादी -शुदा महिला के चेहरे पर होती है, ऐसा लग रहा था मुझे कि हो न हो कहीं पर कुछ गड़बड़ ज़रूर है। मैंने हेमा को हल्का सा इशारा करते हुए पूछा था, “क्या बात है, बता तो!” मेरे ही मुहँ से निकल गया था,”कहीं ऐसा तो नहीं तुझे जीजू ही पसन्द नहीं आये”। मेरे इस सवाल का ठीक प्रकार से उत्तर न देते हुए हेमा का जवाब हाँ में ही था। मेरा अंदाज़ा एकदम सही निकला था, हेमा को लड़का ही पसन्द नहीं आया था।  फिर एक दिन घूमते हुए, “क्या बात है हेमा, खुल के बता तो”। और फिर सहेली होने के नाते हेमा ने अपनी कहानी कुछ इस तरह से बयाँ की..
“नहीं रिया” कहानी हेमा की ज़बानी कुछ इस तरह से थी..”शादी पर मैं बहुत ही खुश थी, शादी से पहले रीति रिवाज़ों में रमन अक्सर ही हमारे घर आया जाया करता था, पिताजी ने कभी मेरी और रमन की ज़्यादा बातचीत न होने दी थी, क्योंकि हमारे यहाँ लड़का लड़की ब्याह से पहले ज़्यादा न मिलते हैं, खैर!कोई बात नहीं, मुझे कोई भी ऐतराज़ न था, क्योंकि जैसा कि पिताजी ने बताया था, खाते-पीते घर का लड़का है, और अपने ही घर का कारोबार है, तो स्वाभाविक है, हर लड़की के मन में आता ही है, की सब अच्छा ही होगा। मेरे भी मन में रमन को लेकर प्यार भरे ख़याल आने लगे थे, जो कि हर लड़की का एक सपना होता ही है। हाँ! मुझे रमन के बारे में एक बात बहुत ही अजीब सी लगी थी, और वो ये की जब भी माँ उसकी जेब में विदाई के रुपये डाला करती थी, तो रमन ने कभी भी एक बार के लिए भी मना न किया था, बहुत ही अजीब सा लगा था, मुझे…पर सोचा था, चलो कोई बात नहीं, यह कोई बहुत ज़्यादा सोचने का विषय नहीं है, हर किसी का अपना नेचर होता है। रमन से मेरी कोई ख़ास बातचीत भी न होती थी, फ़ोन पर। जैसा कि मैने बताया कि ज़्यादा पसन्द न करते थे, ब्याह से पहले बातचीत। खैर!तू तो जानती ही है, कि मेरी शादी कितनी धूम-धाम और अच्छे ढँग से हुई थी, पिताजी ने बहुत पैसा खर्च कर डाला था, मेरे ब्याह पर जी भर के ख़ातिर दारी की थी, मेरे ससुराल वालों की। रमन के बारे में शादी से पहले यही बताया था, कि लड़का अपने बिज़नेस में है, और B.COm तक पढ़ा है। मशीनरी में भी पूना से ट्रेनिंग करके आया है। मन में मेरे बहुत उमंगें थी, रमन को लेकर…खैर! पिताजी ने ट्रेन में बढ़िया विदाई की थी। ट्रेन चलने के बाद मैं और रमन कोच में एकदम अकेले थे, रमन के मुहँ से अचनाक मुझे देखते ही निकला था,”मुझे इंग्लिश नहीं आती, सिखा देना”। यह शब्द सुनकर मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन सरक गई थी, मन में सोचा था, पर कुछ न कहा था,”अरे!लड़का तो पढ़ा लिखा देखा था पिताजी ने..किस तरह की बात कर रहा है। खैर!कुछ न बोली थी , मैं और रमन हम बैंगलोर पहुँच गए थे, बैंगलोर पहुँचने के दौरान रमन की बातचीत में बहुत अन्तर लग रहा था, ट्रेन में की गई बातचीत से रमन कोई और ही रमन लग रहा था, यह तो वो रमन ही नहीं था, जिससे मैं घर पर मिली थी….घर पर तो बातचीत का लहज़ा और अंदाज़ अलग ही था, और ट्रेन में तो रमन को मैं अपने आप से कहीं  कम ही आँक रही थी, पता नहीं क्यों ट्रेन में  रमन से बातचीत कर ऐसा लग ही नहीं रहा था, कि यह बन्दा कोई कारोबार चलाता है, या फ़िर पढ़ा लिखा भी है। दिल से आवाज़ आई थी, “अरे! लगता है, धोखा हो गया”। खैर!!बोलती भी क्या चुप ही बैठी रही थी। यह बात बिल्कुल सही है,कि जोड़ियाँ परमात्मा के यहाँ ही बनती हैं… जीवन साथी कैसा भी हो ,जीवन साथी ही होता है…जिसके लिए आप पूरी तरह से समर्पित होते हैं। पर यह क्या! दिमाग़ में बात आई थी, पसन्द कुछ और ही किया था, निकला कुछ और। पहले न बताया की एप्लीकेशन तक लिखनी नहीं आती। होता क्या है, केवल मेरे हिसाब से अक्सर जो लड़की होती है, वह अपने आप को पूरी तरह से उसी पुरूष को समर्पित करती है, जो उससे हर मामले और योग्यता में श्रेष्ठ होता है। हाँ! अगर आपने किसी से प्रेम विवाह किया है, तो अलग बात है। खैर!अब ट्रेन बैंगलोर स्टेशन पहुँच चुकी थी, रमन का स्टाइल जो था, वो मुझे मेरे हिसाब का न  लगा था, उम्र तो अभी ज़्यादा न थी, पर अपनी पसन्द ना पसन्द का तो सबको पता रहता ही है। मैने अपने और रमन के बारे में रिया को सब सच बता दिया था, यहाँ तक कि मैने यह भी बताया था,कि रमन पूरी तरह से मन में न बैठा इसलिए मैं अपने आप को पूरी तरह से समर्पित न कर पाई हूँ।”हेमा की बातें सुनते ही मेरे मुहँ से तुरन्त निकला था, “छोड़ क्यों नहीं दिया, तूने रमन को अगर यही बात थी, तो! और ये बेटा… क्या चक्कर है, इसी तरह से रहेगा तो इसके मासूम जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, तूने सोचा भी है, इस बारे में”। हेमा मेरी बात का जवाब देने में फिर से कंफ्यूज ही थी, कहना था,”पिताजी ने विवाह में बहुत पैसे लगा दिए हैं, और फ़िर समाज भी तो है, यूँ घर आकर बैठ जाउँगी तो लोग क्या कहेंगे।और वैसे भी ब्याह के पश्चात घर वो घर न रहता है, बेटी रिश्तेदार होकर रह जाती है।””और वैसे भी पिताजी का मानना है ,कि कुछ भी हो घर बसा कर दिखाओ”। मेरी और हेमा की केवल इतनी सी ही बातचीत हो  पाई थी, मैंने हेमा के बेटे उत्कर्ष को प्यारे से नज़रिये तोहफे के रूप में दिए ,टाटा कर फ़िर मिलने का वादा कर वहाँ से निकल गई।कुछ सालों बाद…
एक दिन मेरे मन में अचानक ही हेमा का खयाल आया था,बस!फिर क्या था, फ़ोन नम्बर निकाला और कॉल लगा बैठी..”हेलो!,हाय! कैसी है, यार  भूल गई क्या?, फोन -वोन तो कर लिया होता”। हेमा ने मेरे कॉल का कुछ इस तरह से जवाब दिया था, “सब बढ़िया तू सुना शादी-वादी की कि नहीं”। मैने कहा”अभी कहाँ कोई सूटेबल मैच मिल ही नहीं रहा, कोई पसन्द आएगा तो तुझे ही पहले  बतायउँगी”। इस बार हँसी की आवाज़ में खनक थी,उसकी बातों में थोड़ी सी खुशी ज़ाहिर हो रही थी, मैंने सोचा था, चलो अच्छा है, इसका भी घर अच्छे ढँग से बस जाये। मैं अभी नोकरी के सिलसिले में मुम्बई में थी, पर मेरा कुछ दिनों के लिए कानपुर आना हुआ था, उन्हीं दिनों हेमा भी बंगलौर से आंटी अंकल से मिलने कानपुर उत्कर्ष के साथ आई हुई थी, सोचा चलो महारानीजी से मिलकर आया जाय। बस! सोचा और फटाक से हेमा के घर  पहुँच गयी थी,मैं। क्या देखा…
“अरे!,तू तो बड़ी सुन्दर लग रही है, जीजू के साथ….” रमन का नाम लेते ही हेमा कुछ uncomfortable सी हो चली थी, बोली,”नहीं, नहीं ,खैर!,तू क्या लेगी..ठंडा या गरम”। मैंने हेमा को बात फिर से पलटते देखा था, और हाथ पकड़कर खींचते हुए , अपनी ओर हेमा का चेहरा कर पूछा था,”क्या छुपाती रहती है बता”।,पता नही क्यों मेरे ही मुहँ से अचानक निकल गया था, ‘कहीं तू शादी-शुदा होते हुए किसी और चक्कर में तो नहीं”। हेमा मेरी ओर देखकर थोड़ा सा शरमाई थी, पर उसकी आँखें हाँ! में ही जवाब दे रहीं थीं। मैंने फिर कहा था, “रमन को तो …”। हेमा ने फटाक से कहा था,”अरे! नहीं, नहीं कुछ नहीं पता, चिन्ता मत कर पता चल ही नहीं सकता”। मैंने हेमा से उत्कर्ष के बारे में भी पूछा था, बोली थी,”हाँ! अब तो बड़ा हो गया है, स्कूल जाने लगा है”। थोड़ी देर अंकल आंटी से बातचीत करने के बाद मैं और हेमा बाहर टहलने के लिए निकल पड़े थे। थोड़ी सी देर टहलने के बाद बाहर पार्क में जा गप-शप करने लग गए थे, गप्पों में ही मेरे मुहँ से निकल था, “बता भी दे किसी से न बोलूँगी”। होता क्या है, की कभी-कभी हमारा मन खुशी या फिर अपने आप को तसल्ली देने के लिए कहीं और जा  कर अटक जाता है, यह जो खुशी होती है, इसका कोई सिर या पैर नहीं होता , जीवन में ज़्यादा मायने न रखती है, कुछ पलों के लिए आई हुई यह खुशी हमारे जीवन को थोड़े से वक्त के लिये एक अलग ही दुनिया में ले जाती है। इस खुशी को बयाँ करने के तरीके हर इंसान के अलग-अलग हैं। समाज में इस तरह की खुशी को जो केवल एक व्यक्ति विशेष तक ही सीमित है, कई तरह की परिभाषा दी गई हैं। पर मेरे हिसाब से इसकी सही परिभाषा केवल वही व्यक्ति विशेष ही दे सकता है, जो कि इस अनजानी खुशी जो कि उसके खुद के मन मुताबिक होती है, का कुछ पलों के लिए हिस्सेदार होता है। सही या गलत जैसी कोई भी चीज़ इस दुनिया में है ही नहीं ये हम इन्सान ही हैं, जो कह देते हैं, ये सही है , या ये गलत है, मत कर। और मेरे बहुत ज़ोर देने पर हेमा ने अपनी एक छुपी हुई प्रेम कहानी जिसको मेरा मन भाँप चुका था, लेकिन हेमा की ही ज़ुबानी सुनना चाहता था, कुछ इस तरह से थी..और हेमा ने कहा था..
‌”कुछ नहीं, बस ऐसे ही, कुछ ख़ास नहीं”। मैने पूछा था, “आसपास है, क्या कोई”हेमा..”हाँ!बस,उत्कर्ष को बस स्टॉप तक छोड़ने जाती हूँ, बस वहीं पर अपार्टमेंट्स में रहता है। आते जाते टाइम मुझे ज़बरदस्ती देखता ही रहा करता था, शुरू में तो मुझे थोड़ा सा अजीब लगा था…कि अरे!यह यूँ मुझे ही क्यों घूरता रहता है, फिर न जाने क्या हुआ कि आते जाते मैं भी उन्हें देखने लगी थी, यहाँ एक बात नोट करने वाली यह थी, कि हेमा ने उस इंसान को उसे न कह कर उन्हें बोला था। आगे हेमा का कहना था,…अब रोज़ सुबह आते-जाते मुझे भी उस इंसान का इंतज़ार रहता था, जिस टाइम पर मैं उत्कर्ष को बस स्टॉप पर छोड़ने जाया करती थी, वही टाइम उनका भी गाड़ी निकालने और उसे साफ करने का होता था, बस! न जाने क्या हुआ था, युहीं आते -जाते  मैं भी उस अनजान इंसान  को अपना दिल दे बैठी हूँ। देखने में  अच्छा खासा लगता है, पढ़ा लिखा , किसी ऊँचे औधे पर अफ़सर लगता है। हेमा ने कहा , कि कभी-कभी मॉर्निंग वॉक से लौटते टाइम भी वहीं मुझे मोड़ पर मिल जाया करता है। हाँ!थोड़ी बहुत बातचीत तो है, बस नामों का आदान-प्रदान किया है, आपस में। मैने पूछ ही लिया था, “चल बात दे क्या नाम और काम है?”। हेमा ने कहा था, “अनिल नाम है, पेशे से इंजीनयर हैं, किसी बड़ी कंपनी में।”उसका कहना था, कि बस!,बातचीत ही है, या फिर कभी-कभार सुबह मॉर्निंग वॉक एकसाथ कर लिया करते हैं। रमन को इस बारे में भनक न है। हेमा ने मुझे आश्वासन दिलाते हुए कहा था, कि” तू चिन्ता मत कर हमारे बीच कुछ गलत न है, क्योंकि अनिल भी शादी -शुदा ही है। पर मुझे अनिल अब अच्छा लगने लगा है, अब एक दिन भी अगर सुबह न दिखे तो मेरा मन ही नहीं लगता।” हेमा को अनिल से लगाव नहीं कुछ पल का infatuation हो गया था। वो अनिल को अपने हमसफर के रूप में देखने लगी थी, की अगर वो अपना जीवन साथी खुद चुनती तो शायद वो अनिल जैसा ही होता। पर  पगली शायद एक बात भूल बैठी थी, कि अगर वो अपना जीवन साथी खुद भी पसन्द करती तो अनिल न होकर रमन ही होता। क्योंकि कुछ फैसले केवल परमात्मा के हाथ में ही होते हैं। हेमा जितने भी समय के लिए अनिल के साथ होती, वो केवल कुछ पलों के लिए अपने उस पल को जिया करती थी, कि हाँ! भई अगर मैं अनिल के साथ अपना जीवन बिताती तो कैसा होता।
‌अनिल और हेमा का रोज़ मिलने का सिलसिला यूँहीं चलता रहा। हेमा अनिल से मॉर्निंग वॉक पर रोज़ मिला करती, और उसकी उस पल में की गयी बातों को याद कर सारा दिन खुश रहा करती थी। हेमा के दिमाग़ ने रमन की जगह अनिल को दे दी थी। होती तो वो रमन के ही साथ थी, पर मन
‌ में केवल अनिल ही बसा होता था। अनिल और हेमा में केवल दोस्ती थी,जो की अब मुहब्बत में बदल गयी थी। अनिल भी पढ़ा लिखा शादी-शुदा अच्छा इंसान था, उसकी खुद की पत्नी से भी कोई मन-मुटाव न था, पर फ़िर भी न जाने क्यों हेमा की ओर आकर्षित होता ही चला गया था। हेमा और अनिल ने एक दूसरे को केवल दोस्ती के दायरे में रखा था, पर फिर भी एक दूसरे की ओर आकर्षित होते चले गए थे। इस रिश्ते को कोई भी नाम दिया जा सकता है। हेमा ने मुझे बताया था, की अब अनिल ने वहाँ से मकान बदल लिया है, और वो लोग और किसी कॉलोनी में चले गए हैं। पर हाँ! हेमा और अनिल की बातचीत अभी-भी फ़ोन पर होती रहती है। मिलना जुलना बहुत ही कम हो पाता है , बस! कभी-कभार ही अनिल अपनी गाड़ी लेकर वोही सुबह और उसी जगह पर मॉर्निंग वॉक के टाइम आ जाता है।
‌आज भी जब इतने सालों के बाद मैंने हेमा को फ़ोन किया, और उससे अनिल के बारे में पूछा, तो हेमा का जवाब था,”हाँ! अभी भी है, दोस्ती छोड़ने के लिए थोड़े ही कि थी”। हेमा और अनिल की दोस्ती को एक प्यार भरी दोस्ती का नाम दिया जा सकता है। जहाँ दोनों में ही एक दूसरे से मुहब्बत तो हुई, पर उस मुहब्बत को समाज और अपने -अपने परिवारों का ध्यान रखते हुए, दोस्ती का नाम दे दिया। हेमा और अनिल दोनों ही मेरे हिसाब से समझदार थे, दोनों ने अपने पारिवारिक  जिम्मेदारियों को समझते हुए अपनी इस अनजानी और प्यारी सी मुहब्बत को दोस्ती का नाम दे दिया। यह दोस्ती आज भी दोनों के दिलों में बरकरार है, पास में न होते हुए भी एक दूसरे को न भूले हैं, दोनों। हेमा और अनिल मौका मिलने पर एक दूसरे से मिलते रहते हैं, लेकिन फ़ोन पर हमेशा आपस में संपर्क में रहते हैं।
‌यह कोई नई या अनोखी प्रेम कहानी नहीं है, हाँ! हो जाता है, कभी-कभी। इस प्यार भरी दास्तान से दो लाइनें मुझे अक्सर याद आ जाती हैं…. कई बार यूँ भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है,अनजानी आस के पीछे अनजानी प्यास के पीछे, मन दौड़ने लगता है।