स्वामी अनेकानंद भाग 7

स्वामी अनेकानंद भाग 7

आनंद आज गुरु से नाखुश था। पेड़ों और पौधों के लाख मनाने पर भी उसने किसी से बात न की थी। उसे मां बहुत याद आ रही थी। छोटे भाई का चेहरा बार-बार सामने आता और पूछता – कैसे हो भाई साहब? और मां की याचक आंखें ..? आनंद ने आलीशान बंगले को आंखें भर-भर कर देखा था। और न जाने...
स्वामी अनेकानंद भाग 7

स्वामी अनेकानंद भाग 6

“कहां ..?” आनंद ने भी पूछ ही लिया था। “बाटा चौक।” राम लाल ने प्रसन्न हो कर बताया था। “एक तरह से बियाबान ही था पर मेरी सूझबूझ ने कहा था – ये तुम्हारी मक्का मदीना है। यहीं बैठ जाओ। खोल दो अपना होटल।” “खोल दिया होटल?”...
स्वामी अनेकानंद भाग 7

स्वामी अनेकानंद भाग 5

“आइए मेरे बाबू जी! आइए मेरे कदरदान .. मेहरबान ..” मैं एक अधेड़ उम्र का बच्चा चौराहे पर मजमा लगा रहा होता था। राम लाल बताने लगा था। उसे आज भी अपनी आंखों के सामने अंधकार घिरता लग रहा था। “वो मैं था आनंद बाबू। मैं राम लाल गुरु जी के जाने के बाद अनाथ हुआ...