by Major Krapal Verma | Oct 12, 2025 | स्वामी अनेकानंद
जैसे कोई अहंकार आनंद की जुबान पर आ बैठा था – उसे अंग्रेजी बोलते ही महसूस हुआ था। जुबान मरोड़ कर और मुंह एंठ कर अंग्रेजी के शब्दों को चबा-चबा कर बोलना एक अलग ही कला थी। अचानक उसे पूरा देश दो भागों में बंटा नजर आया था। जो अंग्रेजी बोलते थे वो संभ्रांत लोग थे, सफल...
by Major Krapal Verma | Oct 11, 2025 | स्वामी अनेकानंद
“पर मेरी समझ में तो कमाई करने की बात अभी तक नहीं आई है।” आनंद कहना चाहता था। और वह पूछना भी चाहता था कि वह कब और कैसे कमाएगा? आनंद को पता था – पता ही नहीं एहसास था कि मां को पांच सौ रुपये राम लाल ने जो भिजवाए थे – वो उसके ऊपर कर्ज थे। और अभी तक...
by Major Krapal Verma | Oct 10, 2025 | स्वामी अनेकानंद
अंग्रेजी अखबार से सर मारना था या कि दीवारों में सर दे-दे कर मारना था – आनंद के लिए बराबर ही था। छोटा-छोटा तो जब पढ़ता वह तब मोटा-मोटा पढ़ा जाता। फिर भी वह हर कोशिश कर रहा था। कुछ अक्षर उसने जबरदस्ती उखाड़ लिए थे और उन्हें जोर-जोर से बोल कर देख रहा था। उसे कहीं...