दो आवाजें थीं : दो सांपिनें थीं !!

उपन्यास अंश :-

काम-कोटि में पारुल की बीमारी पर प्रश्न चिन्ह लगा था !

दशहरे का उत्सव बड़े ही जोर-शोर से मना था . समीर सेकिया की प्रतिमा पर काम-कोटि की जनता ने पहली बार अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये थे . समीर के निधन को ले कर लोगों की आँखों में पानी था . ‘महाराज त्रिभुवन की तरह का ही प्रजा-पालक था – समीर’  लोगों ने सुना था . और …और हाँ , सब से बड़ा मुद्दा रहा था – समीर की दो बेटियां ! न जाने कैसे लोग भूल ही गए थे कि ….काम-कोटि को समीर के एक पुत्र देने की अभिलाषा अधूरी ही रह गई थी ! लब्बो-शब्बो की मात्र उपस्थिति ने ही उत्सव में चार चाँद लगा दी थे ! दोनों युवतियां दो दिव्य कलाओं सी पूरे द्रश्य पर छा-सी गईं थीं . हर व्यक्ति ने उन से हाथ मिलाया था ….बातें कीं थीं ..और अपना प्रेम-स्नेह बांटा था !

महीलाल ने पूजा-अर्चना में दोनों बेटियों को शामिल कर उन्हें हर तरह से समीर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था .

“महा म्रत्युन्जय यज्ञ महारानी जी के निधन के पश्चात हुआ ही कब है ?” महा मुनि ने पारुल से शिकायत की थी . “आप के ये रोग-धोग सब कट जाएंगे ! गृह-दशा भी शांत हो जाएगी . और देश-काल भी परिवर्तन पक्ष में आ जाएगा !” उन्होंने पारुल के परास्त मनोभावों को पढ़ा था . “मैं शुभ लग्न देख कर बताता हूँ ….शीघ्रातिशीघ्र …..” वह कहते रहे थे . पर पारुल का मन तो उड़ गया था . “समीर एक कुशल शाशक था . समीर के लिए प्रजा समर्पित थी. लेकिन देश-काल का चक्र उलटा घूम गया ! दिल्ली में साधारण लोग कुर्सियों पर आ-आ कर बैठ गए ! सत्ता का हस्तान्तरण उन लोगों के हाथ लगा ….जिन्हें न तो सत्ता की परिभाषा आती थी ….और न ही उन्हें शाशन चलाना आता था ! हो तो -क्या हो …?” महा मुनि तनिक परेशान थे . “हमारे राजे-महाराजे बे-भाव बिके ! क्या होती है – पचास हज़ार रुपये की वित्तीय सहायता ….? राज-काज चलाने के लिए तो …..”

“बे-सुम्मार धन चाहिए ….!” पारुल ने अपने मन में कहा था .

“महारानी तो मानतीं थीं कि समीर एक समर्थ सम्राट बनेगा …!” महा मुनि कुछ सोच कर बोले थे .

“अब कोई सम्राट नहीं बनेगा ….!” पारुल ने दो टूक उत्तर दिया था .

“हाँ,हाँ ! मानता हूँ ….! वक्त विचित्र व्याधियों से गुज़र रहा है ! राजा और रैयत …सब टूट-बिखर गए हैं ! दिल्ली में समीर को कौन जुहार बजाता था …? उलटे उसे ही जुहार बजानी पड़ती थी….और वो भी उस आदमी की जो निहायत ही साधारण था !”

“अभागा ही रहा , समीर !” पारुल ने आज टीस कर कहा था . “बहुत ….ही अभागा आदमी ….निकला !!” पारुल का कंठ भर आया था . “समीर को उस का साथ चाहिए था ….समर्पण चाहिए था ….सहयोग चाहिए था ….लेकिन वो ….वो ….संभव के प्रेम-जाल को ही न काट पाई ! समीर को उस ने मनसा-वाचा और कर्मणा वरा ही कब था ….? उन के मत-भेद बराबर बढ़ते ही गए ….और बेटा न होने के बाद तो …..”

पारुल को एक पल के लिए संभव याद हो आया था !

“जिस रास्ते जाना ही नहीं , उस के कोस क्यों गिनती हो ….?”संभव की आवाज़ उभरी थी . “जो हो गया ….सो हो गया …! मिटटी डालो मरे वक्त की कमर पर !उधर देखो ! वहां फूल खिले हैं ….चलते हैं उस घूप में ….नहाते हैं चांदनी की उन गंगाओं में …..! अरे, भाई ! सारा का सारा संसार हमारा है ….! सच मानो , पारुल ! मैंने जो खोज की है ….विचित्र है !” उस ने पारुल को जगा-सा दिया था .

“कौनसी खोज ….?” पारुल ने पूछा था .

“यही कि यहाँ हमारा कुछ नहीं है !” हाथ झाड कर हंसा था , संभव . “मिल जाए …..वो राम …..और खो जाए …..वो दाम !!”

“पागल तो नहीं हो गए ….?” पारुल का प्रश्न था .

“पागल था ….हो गया था ….! लेकिन अब मैं पूर्ण प्रबुद्ध पुरुष हूँ , पारुल ! आज को जीता हूँ ….सिर्फ आज को …..!!”

“लेकिन मैं ….मैं …..” पारुल अटक गई थी .

“महारानी होने का मोह तुम्हें तंग कर रहा है ….! तुम मान बैठी हो कि तुम …..”

“यू ….आर ….जैलस …..!!” पारुल ने कहा था और संभव का मुंह बंद कर दिया था . “मैं महारानी हूँ ….” उस ने संभव को सुना कर कहा था . “मैं महारानी रहूंगी ….! मैं काम-कोटि को एक समर्थ और सम्रद्ध रियासत बना कर ही दम लूंगी ! मेरे पास अपार धन होगा ….मेरे पास …..” वह रुकी थी .

“फिर …..फिर ….क्या करोगी …..?” संभव पूछे ही जा रहा था .

“फिर मैं इस सोना झील को …..मानस के साथ मिला कर …..एक लंबा-चौड़ा बोट-क्लब बनाउंगी …..जहाँ सैलानी दूर तक ….नाव ले कर निकल जांय …..हवा-पानी का स्वाद लें …..डूबते सूरज और उगते चाँद को ….देखें ….”

“जैसे कि हम किया करते थे ….हम जिया करते थे …..?” अब संभव पारुल के साथ था . “तुम्हें तो सब याद है , पारुल !” उस ने पारुल की प्रशंशा की थी . “मैं ही भटक गया ….!” उस का उल्हाना था . ” “न जाने क्यों ….मैं नाव छोड़ कर …रेगिस्तानों में जा भटका ….? पारुल को छोड़ मैं परछाइयों के साथ जा लड़ा ?” उस की आवाज़ में एक अजीव प्रकार का आव्हान था . ” न जाने क्यों , पारुल …..हमारी बसी-बसाई दुनियां को ज़माने की नज़र खा गई !” उस ने आह भरी थी .

“हाँ, हम दोनों ही सुखी नहीं है …..” पारुल ने स्वीकारा था .

संभव उठ कर चला गया था . पारुल फिर से अकेली थी !!

लेकिन काम-कोटि आज-कल एक अजब-गज़ब रौनक से भरी थी !

चारों और सैलानियों के टोल घूमते नज़र आने लगे थे . देश-विदेश से लोग आ-जा रहे थे . वो लोग थे -जिन्हें एकांत चाहिए था……..शांति चाहिए थी ….और वो लोग थे जिन्हें अय्याशी दरकार थी ! ये लोग अतृप्त मन लिए …वाशनाओं के वश में नागों से विंधे चले आ रहे थे …..और लोल-किलोल में इतने मस्त हो जाते थे कि ….’दुनियादारी’ क्या थी – उन्हें खबर तक न रहती !

“चल मन , सैलानी बन जाते हैं !” पारुल ने स्वयं से कहा था . “साथ हो लेते हैं – इन के और करते हैं , ऐश !” वह हंसी थी. “अकेले-अकेले बसा लेते हैं , अपनी दुनियां !” उस का निर्णय था .

पारुल का मन सैलानियों के साथ रमने लगा था . सुबह उन के साथ ही वह सैर पर निकलती थी …और पूरे तन-मन से ….पूरे कार्यकलाप में निमग्न हो कर …आनंद उठाती थी ! शरीर हार-थक कर खूब सोता था . जोर की भूख लगती थी ….और पारुल डट कर खाती थी !

“भाई, अपना तो शौक ही खाना,पीना और जीना है !” पारुल की बनी नई दोस्त उसे बता रही थी . “मुझे खाना चाहिए …आई मीन गुड फ़ूड ! मेरे मन का न मिले तो मैं रूठ  जाती हूँ .” मिल्की हंसी थी . “उसी तरह -पीना ! टिका कर पीती हूँ . अपना कोटा साथ ले कर चलती हूँ . इस के बाद मुझे चाहिए – नींद ! जब तक सोऊं ….सोऊं …! मैं नहीं चाहती कि मुझे कोई ……”

“पैसा ….मेरा मतलब मिल्की कि ….इतना उडाती हो ….?” पारुल ने पूछ ही लिया था .

“खूब उडाती हूँ ….” हा हा हा ! “दोनों हाथ उलीचती हूँ !!” उस ने कबूतरों में पत्थर मारा था . “यार, पारुल ! ये साली ज़वानी …जो चढ़ी है न ….” मिल्की ने रुक कर पारुल की आँखों में घूरा था . “चैन नहीं लेने देती …..” वह चुप थी .

मिल्की गज़ब की सुंदर थी . उस का शरीर सोने-सा दमकता था . उस का गोरा रंग-रूप किसी भी फ़िल्मी नायका को भी मात करता था . उसे हुश्न की देवी कहना भी अतिशयोक्ति न होता ! उस पर वास्तव में ही ज़वानी का भूत चढ़ा लगा था – पारुल को !

“धन कहाँ से आता है ….?” पारुल ने फिर पूछा था .

“अरे,भाई ! मेरा अपना है ….! मैं मालकिन हूँ . मेरी कमाई है . ब्रश एंड ब्रश मेरा है !!”

“ब्रश…..?”

“ब्रश …माने कि ….मेरा पति ….स्वर्गवासी  पति ….” इस बार जोरों से हंसी थी , मिल्की . “क्या है , पारुल ! वो था- बुड्ढा ….सनकी ….पैसे वाला …और था – कुंआरा ….! औरतों का शौक़ीन तो खूब था ….पर था बे-रहम ….बत्तमीज !!”

“तुमने शादी क्यों करली ….?”

“पैसे के लिए ! उसे एक स्वर्ग-सुंदरी चाहिए थी ….अप्सरा दरकार थी …एक ऐसी औरत जो ….लाखों में एक हो ! बस , मुझे चुन लिया – उस ने !” मिल्की ने शरारती निगाहों से घूरा था , पारुल को . “लेकिन माई डीयर ….मुझे लेने के देने पड़ गए ….!! ओह ,गॉड ! साला क्या-क्या बत्तमीजी नहीं करता था ….देख…देख , ये देख ….! सिगरेट से मुझे जला देता था …और उसी तरह …..” मिल्की अब भावुक थी . “जानवर ! कहता था – यू ब्लडी …प्रौस ….! यू ब्लडी …बिच ….!! और भी न जाने क्या-क्या सनक सवार हो जातीं उसे !”

“फिर …..?” पारुल जिज्ञासू थी .

“फिर क्या , मैंने एक दिन समेट दिया , उसे ! मारडाला ….! ब्रश एंड ब्रश मेरा …..!! सब अपने कब्जे में . उस का कोई और था ही नहीं !!” हंसती रही थी , मिल्की .

पारुल का मन आया कि मिल्की से गले मिले . उसे बधाई दे. आज वो शाम को उस के साथ बैठ कर खूब पिए ….और ……

“लेकिन ब्रश ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा था !” मिल्की बता रही थी . “ब्रश की आत्मा …रात को मेरे ऊपर आ चढ़ती थी ! उसी तरह वह मुझे …नोंचता ….खाता ….सिगरेट से जलाता …और मुझे चीखों से भर देता ! कहता …..”

“फिर …..?” अब पारुल परेशान थी .

“फिर मुझे एक इन्डियन तांत्रिक मिला . पैसे ऐंठ कर बोला – दूसरी शादी कर लो ! मैंने पूछा – किस से …? तो बोला – किसी से भी ….पेड़ से …पत्थर से ….काले कुत्ते से ….! फिर मैंने भी एक पागल पकड़ा और …उसे पैसे दिए  ….उस से शादी की ….और उसे भगा दिया ….!!” जोरों से हंसी थी , मिल्की .

“राहत मिली …..?” पारुल का स्वर आग्रही था .

“हाँ, राहत मिली, पारुल ! सच में ही मेरा उस से पीछा छूट गया ….! अब मैं ……स्वतंत्र ……हूँ . ब्रश एंड ब्रश की मालकिन …..सिल्विया हूँ …!!”

अचानक ही पारुल महा मुनि के सुझाए महा म्रत्युन्जय यज्ञ के बारे सोचने लगी थी .

फिर न जाने कैसे अचेत और गहरी निद्रा के बीचों-बीच ….वही स्वर्ण रेखा उदय हुई थी …..बढ़ी थी …..और फिर उस के पेट से ….एक भुजंग काला विषधर पैदा हुआ था ! उस का मुंह समीर सेकिया जैसा ही था ! उस की आँखों से आग वरस रही थी !

“अपराध किया है , तुमने !” पारुल सुन रही थी . “काम-कोटि के कुल-दीपक को बुझा कर ….तुमने वो किया है ….जो ….”

“और तुमने क्या किया था …..?” पारुल ने हिम्मत जुटा कर पूछा था .

“में तो तुम्हें ….बे-इन्तहां …प्यार करता था , पारुल ! मैं तो …..मैं तो ……” भुजंग काले उस सर्प का मुख खुलता ही जा रहा था . “तुम्हारा ….अपराध …अक्षम्य है ….! तुम्हें …..”

“नहीं !” पारुल गरजी थी . “मैं ….मैं ..” उस ने पास पड़ी कटार को उठा कर उस काले भुजंग सर्प की आँखें फोड़ने का प्रयत्न किया था . “महारानी हूँ , मैं !” वह बडबडाई  थी .

“और हम क्या हैं …..?” दो आवाजें थीं . दो सापिनें …थीं !! लब्बो-शब्बो के शीश धारे ….वो….दोनों ….सापिनें ….पारुल के शरीर से लिपट गईं थीं . और उसे ऐंठ -मरोड़ कर ….अधमरा कर छोड़ दिया था !

उस सुबह पारुल अपने आप बिस्तर से उठ नहीं पाई थी !!

………………………

क्रमश:

श्रेष्ट साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य !!

Discover more from Praneta Publications Pvt. Ltd.

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading