मैं राधा नहीं , मीरा हूँ !!

प्रिय पापी  !

मुझे जेल में डालने के लिए सलाम !!

लेकिन देख पापी ! तूने मुझे जेल भेजा और मेरा प्यार है कि …उमड़-उमड़ कर तुझे ही आप्लावित कर रहा है ….तुझे ही गा रहा है …मना रहा है …चाह रहा है ! अब क्या करूं …? बाबली ! मैं तो तेरी विरागिन बन गई थी . तेरे लिए ही जी रही थी . तेरे ही सपनों को रोज़-रोज़ सजा कर …तेरी ही पूजा कर रही थी . लेकिन …..

अच्छा ! तू ही बता चल कि मैं क्या करती ….? जैसे ही मैंने तेरा फोटो ‘लुक मी नोट ‘ पत्रिका के मुख-प्रष्ट पर देखा ….और पढ़ा कि …तू  वो बना है जो मैं कभी अनुमान भी न लगा सकती थी …कि अब तू वो है ….जो …दुनियां की ढाल है ….और तुझे पा कर ज़माना निहाल है !! सोच भला ….मैं पागल न हो जाती …तो और क्या हो जाती ….?

मुझे अचानक याद आया था कि …तू  मेरे पास आया था …तो इसी पत्रिका के मुख-प्रष्ट पर छपा मेरा चित्र लाया था जिस में मैं विश्व -सुंदरी बनी खड़ी थी ! तू मुझ पर निसार था ! तेरी आँखों में प्यार तैर रहा था . और मैंने तेरे प्यार का स्वागत किया था ! पता है – क्यों …? इस लिए कि मैं तेरी उस एक नज़र पर ही मर -मिटी थी ! मुझे तेरा जैसा पुरुष अभी तक मिला कब था ….?

और तेरा-मेरा वो मिलन …वो प्रेमाकुल दो प्रेमियों का संगम …प्रकृति दत्त एक संयोग था …जहाँ हम दो बिछुड़ी आत्माओं की तरह एकाकार हो गए थे …! याद है …? किस तरह तू मुझ से लिपट गया था …और किस तरह मैं तुझ में समा गई थी ….? अपनी भोग शाला में ….हम मिलन के उन पलों में …एक दूसरे का नाम तक न जानते थे …पर हम एक दूसरे को जानते थे ! अनूठे पल थे – वो . प्रणय का सवेरा था . स्पर्श से लेकर संभोग तक का वो सफ़र बेजोड़ था ! और जब तूने दम लिया था – मैं तो तभी जागी थी ! मेरे जीवन का तो वही सवेरा है , पापी !

बस, उसी उजाले की आड़ ले कर मैं तेरे इस छपे चित्र को ले कर …तुझ तक भागी चली आई !

आश्चर्य देख , पापी ! मुझे किसी ने भी नहीं रोका …किसी ने भी नहीं टोका ….और न ही किसी ने पूछा कि मैं कहाँ जा रही थी…  क्यों जा रही थी ….और मैं तेरे सामने खड़ी  थी …उस चित्र को ताने जिस में तू महान बना खड़ा था . मेरी आँखों में उल्लास था ….ख़ुशी थी ….गर्व था और तेरे लिए ढेरों सारा प्यार था ! मैं जानती थी कि तू प्यासा होगा ….थका हुआ होगा ….और मेरी तलाश में होगा ! मैं जानती थी कि तू मेरे आने के इंतज़ार में होगा …कि मैं कब आऊँ ….और आ कर तेरे आगोश में समां जाऊं !

तेरे इंतज़ार के उस अकेले और सूने पल में …मैंने तेरी बांहों के खुलने का इंतज़ार किया था ! मैंने मुग्ध मुस्कान दे कर तुझे बुलाया था ! मैंने आवाज़ दी थी कि ….देख , प्रियतम ! मैं …मैं …तेरी ‘पगली’ तो आ गई ….? अब संभाल मुझे ! देख मुझे …! हाँ,हाँ ! मैं वही सर्व श्रेष्ठ सुंदरी हूँ ….जिसे देखते ही तू अपना दीन ईमान हार गया था !!

लेकिन न जाने क्यों तेरी निगाहें तनीं थीं . तेरा चेहरा पहले लाल हुआ था …और फिर पीला पड़ गया था ! तू कहीं डर गया था ! मुझे पहचान कर तू चोर रास्ते से भाग खड़ा हुआ था ! तब मैं समझ ही न पाई थी कि …तूने तो मुझे पहचाना तक नहीं था ! क्यों ….? हमें बिछुड़े कित्ता वक्त हुआ था – भला …? और फिर मेरे हुश्न का डंका तो आज भी बज ही रहा था ….?

“ले …जा-ओ , इसे ….!!” तू ही तो बोला था ….?

अभी तक दर्शक बनी भीड़ टूट पड़ी थी . मुझे एक हुज्जूम ने घेर लिया था . मुझ पर अनेकानेक प्रश्नों की बौछार होने लगी थी !

“आप …..आप …तो क्रेजी …हैं …? द …फेमस …..पोर्न …स्टार …..” एक पत्रकार ने मेरा चित्र उताररते हुए पूछा था . “आप तो …..मशहूर ….” वह कहते-कहते रुका था . शायद वह मुझे मेरे असली पेशे से पुकारना न चाहता था …?

“हाँ,हाँ ! मैं तो वही हूँ …..क्रेजी हॉप ….!! वही जिस पर ये सारा ज़माना मरता है ….वही जो न जाने कितने दिलों की धड़कन है ….और न जाने कितने उस के पैर चाटते हैं -दिन-रात !”

हे, भगवान ! कैसे-कैसे प्रश्न सामने आये थे ….कैसा -कैसा मान-बखान हुआ था – मेरा ….? क्या-क्या नहीं कह रहे थे – लोग ….? कुछ ने तो मुझे छू कर भी देखा था . और कुछ तो मुझे ……

“आप के ….उन के …गहरे …ताल्लुक …रहे हैं ….?” एक सर फोड़ने वाला प्रश्न पत्थर की तरह मेरे मांथे में आ वजा था . और मुझे भी तो यही डर था कि पापी मुझे पहचानने के बाद भी न पहचान पाएगा ! कभी कहेगा ही नहीं कि वह मुझे जानता भी है ! लेकिन मैं क्या करती ….? मैं तो उस के प्रेम की झोंक में चली आई थी ….जिस ने मुझे पागल बनाया हुआ था !

“तो ….आप को …इन से प्रेम है ….?” दूसरे पत्रकार ने हँसते हुए पूछा था .

“हाँ,हाँ …..” मैंने लडखडाती जुवान में कहा था . “सच में …..सच में …मैं …प्यार करती हूँ ….!! सच में ….सच में ही …मैं ….” और न जाने क्या-क्या बक गई थी , मैं !

और मित्रो ! कमाल तो देखो कि वो जमा भीड़ ….अब मुझे एक अजूबे की तरह देख रही थी ! और पूछ भी रही थी कि क्या बाजारू औरत ….’प्रेम’ करना भी जानती हैं …? इन के पास तो ग्राहक आते हैं – प्रेमी नहीं ! फिर तुम कैसे ……

“मैं नहीं जानती ….!” मैंने होश में आते हुए कहा था . अब मैं यहाँ की ज़मीन छोड़ कर भाग लेना चाहती थी ! मैं चाहती थी कि मैं अद्रश्य हो जाऊं . हवा बन जाऊं …और अब तक का हुआ सब अपने साथ उड़ा ले जाऊं !

“चलो !” मुझे दो बलिष्ठ आदमियों ने आ कर पकड़ लिया था .

हो…हो…हो …!! उस के बाद तो धरती-आसमान एक कर देने वाला वाय वेला मचा …था ! लेकिन मुझे घसीट कर जेल में डाल ही दिया था !

और अब न जाने कितने लोग रोज़ आते हैं – यही पूछने कि मेरे …मेरे उस के साथ वो सम्बन्ध थे – जहाँ आदमी आदमी नहीं …हैवान हो जाता है ? मैं अब नहीं डरती , दोस्तों ! सब को पास बिठा कर एक-एक घटना सुनाती हूँ ….! क्या करूं …? मैं इसे भूल ही नहीं पाती ….!

कैसे भूल जाऊं …? देखते नहीं , कितना सजीला,छबीला जवान है ….? है और कोई ऐसा पुरुष जो …इस के हाथ में हाथ मारे …? मेरी भी आँखों में बसी इस की मूरत अमूल्य है …! न …न …! मैं इस के बोले वो संवाद भूली कहाँ हूँ ….? इस की याद आते ही एक-एक शब्द जिन्दा हो जाता है ! जब ये कहता है , ‘पगली” ….तो मैं सच में ही पागल हो जाती हूँ !!

शायद …..शायद क्यों – मैं राधा नहीं ….मीरा हूँ …!!

………………….

श्रेष्ठ साहित्य के लिए – मेजर कृपाल वर्मा साहित्य ! .

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