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मेरी माँ

meri maa

माँ शब्द मन में आते ही सुन्दर, ममतामयी और एक प्यारा सा अहसास होता है। माँ जिसे इश्वर से ऊपर का दर्जा दिया गया है। वैसे तो माँ और पिता दोनों ही ईश्वर से उच्च स्थान रखते हैं, पर मेरे हिसाब से माँ की बात थोड़ी सी अलग होती है। मेरे पास माँ का व्याख्यान करने के लिए हिंदी भाषा के उच्च श्रेणी के शब्द नहीं हैं, पर फिर भी में कोशिश करूँगी कि अपने लेखन द्वारा अपनी प्यारी माँ उनके स्वभाव और उनके चरित्र को आप सभी मित्रों के समक्ष रख सकूँ। मेरी माँ देखने में सुन्दर… सुन्दर यांनी की अगर उनकी सुन्दरता का व्याख्यान किया जाए तो कहना होगा कि…बेहद काले घने लम्बे बाल थे उनके, छोटा कद गोरा रंग,सुन्दरता कोमलता और सादगी से भरे चेहरे वाली महिला थीं। उनके वयक्तित्व के अनुरूप ही उनका नाम था….कुसुम अथार्त पुष्प। विवाह के पश्चात कुसुम वर्मा के नाम से जानी जाने लगी थीं। एक बहुत ही सुन्दर और सुशील परिवार में जन्म लिया था, मेरी माताजी ने। बचपन से ही मेरे नाना-नानी के घर में पूजा-पाठ और संस्कारों में पाली बड़ी मेरी माँ बेहद संस्कारी ,नेक दिल और पूजा पाठ वाली महिला थीं। उस ज़माने की शिक्षित महिलाओं में आतीं थीं मेरी माँ। उन्होंने अपने ज़माने में हिन्दी भाषा में विशारद किया था। अपने माता-पिता रिश्तदारों और परिवार वालों की बेहद लाड़ली रहीं थीं। मेरे नाना-नानी ने बेहद प्यार से परवरिश की थी मेरी माँ की, जिन्हें हम तीनों बहन भाई मम्मीजी कहकर बुलाया करते थे। माँ ने मुझे एक बार बताया था कि वो बचपन से ही शिवजी की बहुत बड़ी भक्त थीं, जैसा कि मैने अभी बताया कि खानदानी पूजा-पाठ वाली महिला रहीं हैं मेरी माँ। कहा करतीं थीं”मैंने शिवजी की बहुत उपासना की है”। कुँवारेपन में मेरी माँ ने शिवजी के बहुत सारे सोमवार के व्रत रखें थे।
भगवान शिव ने उनकी भक्ति से खुश होकर मेरे पिताजी जैसा जीवन साथी उन्हें दिया। मेरे पिताजी एक बहुत ही विद्वान इंसान हैं। हां! माँ ने मुझे एक बार बताया था , कि नानी को किसी पण्डित ने कहा था,”जिस पुरुष से तुम्हारी पुत्री का विवाह होगा, वह सही मायने में बहुत ही ज्ञानी और विद्वान इन्सान होगा”। भविष्यवाणी एकदम सही निकली मेरे पिताजी जैसे विद्वान और कर्मठ वयक्ति से मेरी माँ का विवाह हुआ। माँ बताया करतीं थीं मुझे कभी अकेले में”तुझे पता है, मैने अपनी शादी में फूलों के गहने पहने थे, तेरी मौसी ने मुझे तैयार किया था”। यहाँ मौसी, मेरी माँ की मामाजी की पुत्री थीं,उनकी खुद की बहन तो उनसे बहुत छोटी थीं। मेरे मुहँ से यह बात सुनकर निकला था”अरे!मम्मीजी, फूलों के गहनों में तो आप बहुत सुन्दर लग रहीं होंगी,अच्छा स्टाइल है।” मेरे इस सवाल के जवाब में केवल हँस कर शर्मा गयीं थीं।
मम्मीजी को एक भाग्यशाली महिला का दर्जा दिया जा सकता है। बचपन नाना-नानी के लाड़ प्यार और ठाठ-बाठ में बीता, और विवाह के पश्चात मेरे पिताजी ने कभी मेरी माँ को सारे सुख और बेहद प्रेम दिया। हाँ!एक बात जरूर है, शरीर की बेहद नाज़ुक महिला थीं, जब से मैने होश संभाला और मैं बड़ी होती गई, मुझे अच्छी तरह याद है,साल में एक बार तो माँ को ज़रूर बीमार पड़ना होता था। मेरी माँ ने तीन सन्तानो को जन्म दिया था, एक मैं, और मेरा जुड़वाँ भाई, और दूसरा मेरे बड़े भाई साहब जो हम दोनों बहन भाई से उम्र में पाँच साल का अन्तर रखते हैं। बहुत ही लाड़-प्यार से पाल-पोस कर बड़ा किया था,मेरी माँ ने हम तीनों बहन-भाई को।
उनके वक्तित्व की विशेषता एक और यह थी, कि माँ बहुत ही स्वादिष्ट और अच्छा खाना बनाया करती थीं। हम सब उनके हाथ के बने भोजन के बेहद दीवाने थे। यह विद्या उन्हें विरासत में ही तो मिली थी,भोजन बनाने में जमाने भर के वयंजन बनना जानती थी मेरी माँ और नानी। मेरे पिताजी तो केवल मेरी माँ के हाथ के बने भोजन के ही दीवाने रहे हैं। उन्हें माँ के अलावा और किसी के हाथ के बने भोजन में स्वाद नहीं आया कभी। छोटे-छोटे हाथ हुआ करते थे, माँ के…इन्हीं हाथों से इतनी गज़ब की कचौड़ियाँ बनाया करतीं थीं, कि मैं क्या बताऊँ। कई तरह की कचौड़ियाँ बनाना जानती थीं, मम्मीजी। हम बहन-भाई और रिश्तेदार तो उनके हाथ की बनी कचौड़ियों के बेहद दीवाने थे। बस!उनके वयक्तित्व की एक ही कमज़ोरी थी,और वो यह, की उनसे काम ज़्यादा नहीं होता था, शरीर नाज़ुक था….लाड़-प्यार और आराम में पली-बड़ी बिटिया थीं। खैर!मेरे पिताजी ने माँ के सुख और आराम का बेहद ध्यान रखा था, मैने होश संभालने के बाद अपने घर में काम वाली बाई हमेशा देखी थी, सारे काम वही करके जाया करती थी, केवल भोजन बनाने का काम ही मेरी माँ का होता था। क्योंकि पिताजी फौज में अफसर थे, तो हमें बाकी की सुविधाएँ भी प्राप्त थीं। इसीलिए माँ को कभी शरीर से कष्ट का अहसास नहीं हुआ, ईश्वर की भक्त और पूजा-पाठ वाली महिला होने के कारण परमात्मा का हाथ हमेशा उनके सिर पर रहा। अपने जीवन में मेरी माँ ने सब सुखों का आनन्द लिया,और अपनी तीन सन्तानो को अपने प्यार और ममता से बड़ा किया।
मुझे आज भी याद आता है,जब मैं छोटी थी, और रात को सोने से पहले “गुड़-,नाईट मम्मीजी”कहा करती थी, तो अपना कोमल चेहरा मेरे पास लाकर मुझे एक प्यारी सी और मीठी पप्पी देकर गुड-नाईट का जवाब मुझे दिया करतीं थीं। अपने प्यारे माँ-बाप के साये में हम तीनों बहन भाई बड़े हुए हैं। जैसा कि मैंने बताया कि कोमल शरीर होने के कारण व लाड़ में माँ का लालन-पालन होने के कारण उनसे काम ज़्यादा नहीं बनता था, जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गयी,रसोई के कामों में उनका हाथ बटाने लगी । मेरी माँ को रसोई के काम करने में बहुत सहारा हो गया था। मेरा विवाह होने के बाद भी जब कभी में मायके जाती,भोजन बनाने में अपनी माँ की पूरी मदद किया करती थी। बड़े होने के बाद हम तीनों बहन-भाईयों का रिश्ता अच्छे घरों में हुआ। अपनी दोनों बहुओ और नाती-पोतों के साथ भी उन्होंने अच्छा वक्त बिताया। विवाह के पश्चात जब मैं भोपाल आ गई थी, तो फोन पर अक्सर उनसे बात करती रहती थी। बच्चों की छुट्टियों में मिलने भी जाती थी। माँ का कोमल शरीर होने के कारण अक्सर हर साल वह बीमार पड़ जाया करतीं थीं।खाँसी की तो उन्हें बेहद शिकायत थी, उनकी खाँसी बचपन से ही मैने देखा था इतनी खतरनाक थी, कि एक बार उठती थी तो रुकने का नाम ही नही लेती थी। पड़ोसियों के घर से भी सलाह-मशवरे आने लगते थे,”मम्मी को काढ़ा बनाकर पिलाओ, ये करो,वो करो “वगरैह-वगरैह। बेस्ट मेडिसिन देते थे, काढ़ा वगरैह सब देते थे, पर खाँसी में आराम ही नहीं आता था, अच्छे-अच्छे डॉक्टरों से भी सलाह की, पर उनकी खाँसी वैसी की वैसी ही रही। मुझे याद है,जब मेरी माँ खाँसना शुरू होती थीं, तो वह बुरी तरह परेशान हो जाती थीं, खाँसी कर-कर पूरा चेहरा लाल हो जाता था। एक बार जब मेरे जुड़वाँ भाई का विवाह तय हुआ था,तब माँ को इसी खाँसी के कारण t.b हो गयी थी….दिल्ली में किसी डॉक्टर पर भरोसा न करते हुए हमने उनका इलाज मेरे बड़े मामाजी के पास जो कि खुद भी एक बेहतरीन होमियोपैथी के डॉक्टर हैं, उनके पास करवाया था, बिल्कुल ठीक होकर लौटीं थीं। व्रत पूजा का तो शौक था ही, आये दिन व्रत रख लिया करतीं थीं…हम सब अपनी माँ को बहुत समझाते थे”जब आपका शरीर साथ नहीं देता तो आप व्रत क्यों रखती हो, चार बजे उठकर मन्दिर की तरफ नियम से क्यों जाती हो?”एक न सुनतीं थीं, सर्दी हो या गर्मी आँधी हो या तूफ़ान उनका नियम था, सुबह चार बजे उठकर स्नान वगरैह करके मन्दिर जाना।
हर साल जब भी बीमार हो जातीं थीं,तब हम सब उन्हें यही समझाया करते थे”मम्मीजी अपनी सेहत का ख्याल रखो, अपने लिए नहीं हम सब के लिए तो रखो, मत भागा करो सुबह चार बजे उठकर मन्दिर…घर में ही भगवान के हाथ जोड़ लिया कीजए”। पर नहीं हमारी किसी भी बात या सलाह का हमारी माँ पर कोई असर न था, साफ़ कह दिया था”मन्दिर जाने के लिये मुझे कभी मना मत करना, मुझसे यह न होगा”। खैर!हम सबने भी ज़िद्द छोड़ दी, और सोचा कि चलो कोई बात नहीं…. अगर माँ व्रत रखने में और मन्दिर जाने में खुश हैं,तो यही सही। मेरे हिसाब से हम हैं, या और कोई जब इन्सान के विचार परिपक्व हो जाते हैं, तो वह उन्हें छोड़ नहीं पता। माँ और परमात्मा का बहुत गहरा और नज़दीकी रिश्ता था,मेरी माँ कभी अपने-आप को परमात्मा से अलग नहीं कर पायीं थीं। उनके हिसाब से सँसार में कर्म और परमात्मा श्रेठ थे, जो कहीं पर अटल सत्य है। हर इन्सान को अपने कर्मो और परमात्मा के आगे नत मस्तक होना ही पड़ता है, व्यक्ति कितना भी धुरंदर क्यों न हो।
मैं भी विवाह के पश्चात भोपाल में इसी चिन्ता में रहा करती थी, कि”अरे!सर्दियाँ शुरू हो गयी हैं, माँ बीमार न पड़ जाये कहीं”। अक्सर फोन लगा कर कहा करती थी”मम्मीजी ठंड शुरू हो गयी है, अपना और पिताजी का ख्याल रखना”। उधर से जवाब आता था”ठीक है, हम टोपा-शोपा पहनकर अपना ख़याल रखते हैं, तू अपना और अपने बच्चों का ध्यान रखना”। दिन यूहीं बीत रहे थे। मुझे अकेले में उनकी एक बात हमेशा याद आती है, अकेले में मुझसे कहा करतीं थीं,”क्या करना है ज़्यादा रहकर, चलते हाथ पैरो आदमी चला जाए, वही ठीक रहता है”। मैं पलट कर कह दिया करती थी “ऐसा क्यों कहते हो आप, लोग सौ-सौ साल जीने की बात करते हैं, खुश रहा करो और पिताजी को भी खुश रखा करो”। मेरी इस बात पर उहोंने एक प्यारी सी स्माइल दी थी। जब भी मैं अपनी माँ को कुछ समझाया करती थी, वह मुझे एक प्यारी सी स्माइल दे दिया करतीं थीं। मेरी माँ परमात्मा के नज़दीक होने के कारण कर्म और परमात्मा में विश्वास रखती थीं। आज मैं भी अपनी माँ के इन्हीं विचारों से सहमत हूँ, और प्ररित हूँ। अगर कोई शक्ति हमारे काम आती है ,तो वह परमात्मा ही है। खेर!वक्त यूँहीं बितता जा रहा था फोन पर नियम से हालचाल पूछना और एक ही बात को दोहराना कि”सर्दी शुरू हो गयी है,अपना और पिताजी का ध्यान रखना”। फिर वही जवाब था,”रख लेंगें तू अपना ध्यान रखना”। सिलसिला चल रहा था, कि एक दिन फोन करने पर माँ की आवाज़ काँप गयी थी, लड़खड़ाये स्वर में बोलीं थीं”मैं ठीक हूँ, तू सुना”। मेरे कानों को विश्वास न हुआ था,फिर दोहराया था,”पर आपकी आवाज़ ऐसी कैसे” फिर हिम्मत के साथ माँ ने जवाब दिया था,”अरे!नींद से जागी हूँ कुछ नहीं”। मेरे कानों को विश्वास न होने पर भी सोचा था, मेरी पुजारिन माँ झूठ बोल नहीं सकती वाकई नींद से उठी होंगी। उन्हीं दिनों मेरे भानजे ने अपनी दादी की तस्वीर खींच कर हमको फोन में सेंड की थी, माँ की तस्वीर थी तो बहुत सुन्दर एकदम इन्दिरा गाँधी जैसी लग रहीं थीं। पर सच कहूँ यह तस्वीर देखकर दिल ने कहा था, “शायद कुछ ठीक नहीं”दूसरा विचार तुरन्त आया था”अरे!नहीं नहीं ऐसा नहीं सोचते”।
पता नहीं क्यों मेरा मानना है, और बडे बुज़ुर्गों ने भी कहीं पर कहा है,कि दूध,घी यदि अपने आप ही फैल जाएं तो यह शगुन अच्छा नहीं होता। इस दूध,घी और दही वाली कहावत पर मुझे विश्वास है। यह मेरा पर्सनल अनुभव भी है। अपने-अपने विचार होते हैं सबके मैं सिर्फ आप सभी मित्रों को अपने विचार बात रही हूँ।
एक दिन मैने सवेरे दूध उबलने रखा हुआ था, मुझे याद न रहा और थोड़ा दूध गैस पर ही निकल गया था। वहीं मेरा माथा ठनका और मैने अपने पिताजी को तुरन्त फोन लगाया था। फोन लगाने पर पता चला था , कि मां I.C.U में भर्ती हो गईं हैं। पिताजी ने कहा था”चिन्ता वाली कोई बात नहीं है,थोड़ा बुख़ार आ गया था, ठीक हो जायेंगी तेरी मम्मी”। यह बात सुनकर मेरे ह्रदय की धड़कनें बढ़ गईं थीं, और अपने आप को बेहद तसल्ली देते हुए कहा था,”अरे!आजकल तो बिल बढ़ाने के लिए I.C.U में रख लेते हैं”। पिताजी ने कहा दिया था”अस्पताल पहुँचने पर मैं तेरी बात माँ से करवा दूंगा”। पिताजी के अस्पताल पहुँचने का इंतज़ार किया और फिर तुरंत फोन लगाया था,पिताजी ने माँ से मेरी बात करवाई थी जो कुछ इस तरह से थी……
“अरे!क्या हो गया आपको कैसे आपने अपनी तबियत ख़राब कर ली, कितनी बार कहा था, पिताजी का और अपना ध्यान रखना”। माँ ने कहा था, स्वर लड़खड़ाये थे, आवाज़ में कंपन थी,”इस शरीर का क्या करूँ?चिन्ता मत करना मैं ठीक हो जायउँगी,हालचाल पूछने के लिए thank you!” मैने कहा था”thank you की क्या बात है, आप तो परमात्मा की भक्त हो, कुछ नहीं होगा आपको मैं शाम को फिर बात करूँगी”। शाम को जब पिताजी माँ के पास पहुँचे थे,तो फोन पर फिर बात की थी मैने। पिताजी ने बताया था, माँ अब पहले से ठीक है, छोटी भाभी का जन्मदिन है तो माँ को खीर खिलायी है। और कहा था,”चिन्ता मत करना और आने की जल्दी मत करना,हम सब हैं यहाँ पर माँ के साथ, जैसे ही माँ को थोड़ा आराम आएगा मैं तुझे बुलवा लूंगा”। पिताजी की बात सुनकर मुझे थोड़ा तसल्ली हुई थी,कि चलो माँ ठीक हो जाएंगी।
अगले दिन सवेरे अस्पताल में मैं माँ से बात न कर पाई थी,क्योंकि पिताजी माँ से मिलकर जल्दी ही निकल गए थे,उन्होंने बताया था कि,”माँ को अनार खिलाकर आया हूँ, चिन्ता की बात नहीं है”। शांम को मैने जब अस्पताल फोन किया तो माँ की आवाज़ बहुत कंपकपायी और लड़खड़ाई हुई थी,आज भी मेरे कानों में उनकी आवाज़ की कंपन और उनके कहे हुए शब्द गूँजते हैं, जब भी मुझे उनकी आवाज़ सुनाई देती है, मेरे
रोंगटे ख़ड़े हो जाते हैं माँ ने कंपकपायी हुई आवाज़ में फोन पर बहुत हिम्मत करके कहा था,”तू अपना और अपने बच्चों का ध्यान रखना…Bye!!!””bye”जो उन्होंने मुझे बोली थो वह बहुत लम्बी थी, पता न था यह bye उनकी आखिरी bye थी,आज भी जब उनके यह शब्द मेरे दिमाग़ में आते हैं, मेरी आँखें आंसुओं से भर जाती हैं, फिर परमात्मा की मर्ज़ी समझकर और अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को देखते हुए अपने आप को संभालती हूँ। मुझे बिल्कुल भी आभास न था कि माँ मुझे फिर न मिलेंगी, परिवारजनों और पिताजी की बातों से ऐसा लग रहा था,की जल्द ही घर लौटेंगी…सोचा था एक बार होश आया जाए और बतियाने लगें, तो झट से निकल पड़ूँगी …माँ-बेटी आराम से बात-चीत करेंगें। पर ईश्वर को और माँ को कुछ और ही मंजूर था। किसी कारण वश माँ की आत्मा ने मुझसे मिलने से इनकार कर दिया होगा,वह माँ ही जानती थीं, नहीं तो मिलन अवश्य होता। उन्होंने क्या सोचा और क्या हो गया यह राज़ बनकर रह गया…..जो उन्ही के साथ चला गया।
एक लम्बे अरसे से माँ बीमार चल रहीं थी,पर शरीर के अन्दर की बीमारी का किसी को पता ही नहीं चला, अस्पताल भर्ती कराया तो बहुत देर हो चुकी थी, डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की पर परमात्मा की मर्ज़ी कुछ और ही थी। परमात्मा ने माँ को कष्ट न देते हुए अपने पास ही बुलाना बेहतर समझा। उनके आखिरी समय और बीमारी में, मैं उनसे मिलने न पाई इस बात का सदा मुझे अफ़सोस रहेगा।
माँ ने बलकुल अहसास न होने दिया था कि उनका आखिरी स्टेशन आ गया है,और अब वो फिर कभी न मिल सकेंगी। हालाँकि पिताजी को थोड़ा सा आभास था,पर उन्होंने भी अपनी पत्नी के प्रति प्रेम,अपने ऊपर विश्वास और परमात्मा पर भरोसा करके कहा था”अबकी बार पूरी तरह ठीक करके ही निकलूंगा तेरी माँ को अस्पताल से, तू देखना”।
पूरे परिवार का माँ के प्रति प्यार और परमात्मा पर विश्वास एक तरफ रह गया। परमात्मा ने माँ को कष्ट न देते हुए अपने पास बुलाना ही बेहतर समझा। माँ परमात्मा के भेजे हुए दूत के साथ हम सब को छोड़कर अलविदा कहकर चलीं गईं।
आज मेरा मन अकेले में कह उठता है”कहाँ हो माँ!”। ह्रदय पुकारता है”माँ!!!” पर कोई जवाब नहीं आता….पता नहीं कौन से देस चलीं गयीं हैँ, जहाँ का न कोई फोन नंबर है न ही कोई पता। ऐसा लगता है मानो हम सब एक ट्रेन में जा रहे थे, कि एक स्टेशन आया,सिर्फ माँ उस स्टेशन पर हम सबको रेल में बैठा छोड़कर उत्तर गयीं। पता नहीं वो कौन लोग थे, जो मेरी माँ को अपने साथ ले गए। मैं रेल की खिड़की में से देखती ही रह गई, और माँ उन लोगों के साथ देखते ही देखते ओझल हो गईं। रेल आगे बढ़ गई थी, और मैं चिल्लाती ही रह गयी”माँ!! वापस आ जाओ”इस बार मेरी आवाज़ न सुनी थी माँ ने, और न ही मुड़कर देखा था। किसी और का हाथ पकड़कर चलती ही चलीं गयीं थी।
इस लेखन द्वारा मैं रचना अपनी माँ को अश्रुपूर्ण और भावभीनी श्रद्धांजलि देती हूँ, और परमात्मा से यह प्रार्थना करती हूँ, कि”हे!ईश्वर अब आप मेरी माँ का ध्यान रखना, अब माँ आपके घर आ गईं हैं, मैंने अपनी माँ को हर सर्दी और गर्मी आपके भरोसे छोड़ दिया है। काश!आपका कोई फोन नंबर होता,तो फोन करके फ़िर माँ का हालचाल पूछती। बस!इतना ही कहूँगी आपसे”प्लीज माँ का धयान रखना,ख़ासकर सर्दियों में बहुत कोमल और नाज़ुक शरीर है उनका”। यह लेखन मैं अपनी प्यारी माँ श्रीमती कुसुम वर्मा को समर्पित करती हूँ।
“कहाँ चली गई हो माँ आप…..मम्मीजी फिर से कोई गाड़ी पकड़कर आ जाओ न हमारे पास, बहुत याद आती है, आपकी…आपके बगैर घर सूना और अकेला पड़ा है”। आज भी जब मैं अपने मायके जाती हूँ, तो मुझे अपने घर में अपनी माँ के होने का अहसास होता है। “मुझे पता है, माँ आप वहीं कहीं हो दिखती नहीं हो”।