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लौट आ माँ

meri maa

अंग्रेज़ी के एक नॉवेल के बारे में तो सुना होगा आप सब ने,”,फ़ॉर one मोर डे”इस उपन्यास के लेखक का नाम तो मुझे याद न है, पर इस उपन्यास की कहानी का अंश मुझे अपने किसी मित्र से सुनने को मिला, सच!दिल को छू गया। इस कहानी के इस छोटे से अंश की मैंने भी अपनी निजी जिंदगी में कल्पना कर ही डाली। बहुत अच्छा लगा था, मुझे यह जानकर की इस उपन्यास में जो लेखक होता है, वो अपनी माँ से अपने बचपन के घर में दोबारा मिलता है।लेखक को अपनी माँ जो बहुत साल पहले ही दुनिया छोड़ चुकी थीं, वापिस उसी जगह पर मिलती हैं, दोनों माँ और बेटा पूरा दिन एकसाथ बिताते हैं, अपने बेटे के लिए उस दिन का भोजन भी उसकी माँ ही अपने हाथों से स्वयं बनाती है ,एक पूरा दिन साथ बिताने के बाद लेखक की माँ शाम को अपने बेटे से अलविदा लेती
है, और न जाने फ़िर कहीं चली जाती है। लेखक इस बात को गहराई से सोचता ही चला जाता है, कि माँ कहाँ चली गई…समझ नहीं आता,कि हुआ तो हुआ क्या। क्यों आई थीं माँ, और फ़िर दोबारा यूँ अकेला छोड़कर क्यों वापिस चली गईं। खैर!अपनी माँ से मिल और उनके साथ पूरा एक दिन बिता लेखक फिर से अपनी जगह लौट जाता है। मित्रों इस कहानी का सिर्फ यह एक प्रसंग मेरे ज़हन में पूरी तरह से बैठ गया है…और मेरा मन बार-बार एक ही बात दोहराता है, कि ,”तू लौट आ माँ !!”
मेरा भी मन अब यही करने लगा है, कि कहाँ चली गयी हो माँ!लौट आओ। मैं हमेशा यही सोचती हूँ, कि काश!ऐसा ही हो, की मैं जब कभी अपने मायके वापिस जाऊँ तो आप मुझे उसी रूप में, दोबारा से इंतेज़ार करती हुई मिलो।में चाहती हूँ,कि मैं सिर्फ एक दिन के लिए आपसे दोबारा मिलूँ, क्योंकि जब आप अस्पताल में थीं, तो मै आ न सकी….न जानती थी कि आप को कोई और अनजाने लोग लेने आने वाले हैं, आप हम सब को छोड़ कहीं और की मेहमान बनने वाली हो।क्या पता था, कि अपना सामान तैयार करे रेल के दरवाज़े पर तैयार खड़ी हो, क्योंकी स्टेशन आने वाला है। ऐसा लग रहा था, कि स्टॉपेज पर केवल कुछ ही सैकंडों के लिए गाड़ी रुकने वाली है, और आपको पूरा लगेज लेकर उतरना है।रेल गाड़ी के गेट पर उतरने के लिए जब आप खड़ीं थीं,तो आप के चेहरे पर कोई शिकन न थी, माँ! वही मुस्कुराहट थी, चेहरे पर,ऐसा लग रहा था, कि आप उतरकर जाने में ही खुश थीं, संतोष था, आपको अपने मुस्कुराते हुए चेहरे से आशीर्वाद दे और सबको टाटा कर स्टेशन आते ही जल्दी से उत्तर गयीं थीं, और तेज़ी से चलती चलीं गयीं थीं, और जाती भी क्यों न, नानाजी,नानीजी , मामाजी और हाँ!आपके दादाजी जिनकी आप हमेशा से लाड़ली हुआ करतीं थीं, सभी लोगों ने तो लेने भेजा था आपको। आपने ही तो बताया था,माँ..कि नानाजी आपसे कह रहे हैं,”अब हमारे पास आजा, बस अब बहुत हुआ, तेरी ही कमी है, सब मिल बैठ कर बातें करेंगें”। अपने पिता की आवाज़ सुन आपसे रहा न गया, और आप हम सब को पीछे खड़ा छोड़ दौड़ी चलीं गयीं। पर माँ यहाँ एक बात जो अधुरी सी रह गयी थी, उसका क्या??,..इसीलिए तो कहती हूँ, तू भी सिर्फ एक दिन के लिए लौट आ माँ…मैं तेरे लौट के आने का इंतेज़ार करूँगी।
जब भी माँ की तस्वीर आँखों के सामने आती है, पूरे बचपन से बड़े होने तक की रील आँखों के आगे घूम जाती है। मुझे अच्छी तरह से याद है, जब हम स्कूल से आया करते थे, तो सारा काम खत्म कर बाहर बरामदे में पुराने वाले h ब्लॉक के घर में बाहर बरामदे में कुर्सी पर बैठी मिला करती थीं,आते ही सवाल हुआ करता था,”खाने में क्या बना है? बहुत भूख लगी है।”छूटते ही कहा करतीं थीं”राजमा चावल”मन खुश हो जाया करता था।माँ के हाथ के राजमा चावल खाने का स्वाद फ़िर दोबारा कभी न आया है।आपका वो बरामदे में टहलना, कोमल चेहरा सब कुछ बहुत याद आता है।आप कहाँ चली गई हो माँ, में कहाँ से खोज कर लाऊँ आपको। शाम होते ही मुझे आपकी बहुत याद आती है,”आपको पता है,कि मैंने नया फ़ोन खरीदा है, बताना चाहती थी…इस फ़ोन में सब कुछ कर सकते हैं.. वीडियो कॉलिंग भी हो जाती है। काश!कि आप हमारे ही साथ होतीं तो जिओ की सिम डलवा कर घंटो आराम से बात किया करती आपसे। शाम होते ही मेरा मन यही सोचने पर मज़बूर हो जाता है, कि कोई तो फ़ोन नम्बर ज़रूर होगा आपका,जहाँ कॉल कर मैं आपसे बात कर सकती हूँ “। माँ!,जहाँ बहुत दूर आप हम सब को छोड़ कर पहुँच गई हो…क्या वहाँ के लोग आपको हमसे बातचीत करने का कभी मौका न देते हैं। बहुत बड़ी लाइन होती होगी न वहाँ पर बातचीत करवाने की, ऐसा लगता है, जैसे आप उस अनोखे जहान में हम सब के टेलीफोन नंबर की पर्ची हाथ में लिए खड़ी हो ,पर आपका नम्बर अभी तक न आया है। माँ! हमसे बात करने के लिए आप वहाँ पर लाइन में मत खड़े हुआ करो..क्योंकि हम सब जानते हैं, आप बिल्कुल ठीक-ठाक हो। बस!अपना उधर ध्यान रखना। और हाँ! वहाँ नाना, नानी ,मामा और मौसी से बातों में इतनी मत खो जाना कि हम सब को एकदम भुला दो। अगर आप ऐसे नहीं आ सकतीं तो सपनों में रोज़ आना माँ। आपसे मिलकर अच्छा लगता है।
हाँ!इतना तो अच्छी तरह से समझ आता है,कि शरीर एक मशीनरी होता है, काम करना बन्द कर देता है, तो यह मशीन रूपी शरीर ख़त्म हो जाता है। पर उसके अन्दर जो आत्मा होती है ,उसका क्या? कहाँ विलीन होकर रह जाती है, पता ही नहीं चलता। रिश्ते नाते सब दो ही पल में ख़त्म हो जाते हैं। एक बात तो है, जैसे आप पहले हमारे साथ रहा करतीं थीं, अब वैसी नहीं रह गयी हो माँ, थोड़ा सा उस दूसरे देश जाकर आप में बदलाव सा आ गया है। सपनों में तो आती हो कभी-कभी पर बहुत ही अजीब ढँग से मिलती हो, सपनों वाला ढँग आपका मुझसे मिलने का मुझे बिल्कुल अच्छा न लगता है, सपनों में आप मेरी वो माँ ही नहीं लगती हो, क्यों बदल सी गयी हो माँ वहाँ जाकर। सिर्फ थोड़े से समय के लिए वापिस आ जाओ देखो सब तुम्हें कितना याद करते हैं।
पता नहीं किन अनजान लोगों के साथ मुस्कुराती हुई कैसे चलती चली गईं, पीछे मुड़कर भी न देखा। अपना नया वाला फोन जब मै शाम को हाथ में लिए बैठती हूँ, तो आप को फ़ोन करने के लिए कौन सा नंबर डायल करूँ सोचती ही रह जाती हूँ, और कभी-कभी तो मैं आपको अपने पास ही महसूस करती हूँ, ऐसा लगता है कि जैसे आप मेरे आसपास ही रहती हो, बस दिखाई नहीं देती। एक अनजानी सी शक्ति का अहसास मुझे हमेशा रहता है, और आप का चेहरा मेरी आँखों के आगे हरदम ही होता है। आपके फ़ोन पर बात करने का अंदाज़ आज भी मेरे दिमाग़ में ज्यों का त्यों है। आज भी जब मै घर पर फ़ोन करती हूँ, और जो भी कोई फ़ोन उठाता है, मुझे तुरन्त आपका वो टेलीफोन के नज़दीक बैठना और फ़ोन उठाकर हेलो बोलना अभी-भी याद आ जाता है, मानो कल ही की बात हो, मन मानने को बिल्कुल तैयार न होता है, कि आप अब हमारे साथ हो ही नहीं, ऐसा लगता है, कि माँ किसी रिश्तेदारी या फ़िर किसी ख़ास के ब्याह में कुछ दिनों के लिए चलीं गयीं हैं, पर जल्दी ही लौट आएँगी।
याद है,आपको किस तरह से हम कभी-कभी रिक्शे में घूमने जाया करते थे, कितना मज़ा आया करता था, कितनी प्यारी लगा करतीं थीं तुम ,जब मेरे साथ मेरे छुटपन में वो तीखी मिर्ची वाले आलू के चिप्स खाया करतीं थीं। हाँ!,मुझे तो अच्छी तरह से याद है, मैं उन दिनों सातवीं कक्षा में पढ़ा करती थी, हमारे पुराने वाले H ब्लॉक के घर के आगे सर्दियों में मूंगफली और पॉपकॉर्न लिए ठेले वाले घुमा करते थे, आवाज़ सुनते ही मैं दौड़ी चली जाया करती थी, दो रुपये के पेपर वाले पैकेट में चिप्स भरवा लाती थी। मुझे याद है, माँ चिप्स खाते वक्त आप भी मेरे ही साथ शाम को बैठी हुआ करती थीं, ना-ना करते-करते चटखारे लेते हुए मेरे साथ चिप्स खा ही लिया करती थीं। तभी तो कह रही हूँ, फ़िर से लौट आ माँ..और फ़िर से ले चल मुझे एक बार फ़िर बचपन में..तू आ तो सही मेरे साथ फ़िर वही मिर्ची वाले आलू के चिप्स खाकर लौट जाना… किसी से न कहूँगी की माँ आयी थी।
समय कितना बलवान होता है, एक चिड़िया प्यार से घोंसला बनाती है, अपने नन्हें चूज़ों के साथ मोह माया पाल उन्हें बड़ा करती है। इन रिश्ते -नातों की खुशबू में ज़िन्दगी के तार इतने उलझ जाते हैं , कि अगर एक भी तार टूट जाता है, तो हम उस टूटे हुए तार को फ़िर दोबारा से जोड़ने के लिए व्याकुल हो जाते हैं। हम क्यों नहीं समझने को तैयार होते कि एक कहानी तो ख़त्म होनी ही होती है,ख़त्म हुई कहानी पूरी तरह से ख़त्म न होकर नए किरदारों के साथ दोबारा से शुरू होती है, कुछ किरदार इस नई कहानी का हिस्सा न होते हुए भी रिश्तों की खुशबू के रूप में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं।
यही सब तो मैं अकेले में बैठ कर सोचा करती हूँ , माँ!! यह तो मुझे अच्छी तरह से पता है, कि है तो तू मेरे ही साथ…मैं हमेशा तेरी खुशबू महसूस करती हूँ..पर कहाँ? मुझे याद है, एक बार मैने सपनें में देखा कि आप मुझसे फ़ोन पर बातचीत कर रही हो, एकदम क्लियर आवाज़ सुनाई दे रही थी मुझे आपकी। जैसे ही मैने आपसे सवाल पूछा था,”अरे!आप तो हो ही नहीं, फ़िर इतनी साफ़ आवाज़ कैसे?” मेरा बस इतना ही कहना था, कि उसके बाद मुझे आपकी आवाज़ सुनाई ही नहीं दी। फिर से बात करो न माँ मुझसे उसी आवाज़ में,बहुत याद आती है, तुम्हारी। हम तो बातचीत नहीं कर सकते पर तुम तो उस अजनबी सी जगह से हाल-चाल पूछ सकती हो। फ़ोन न सही कोई बात नहीं रोज़ आ जाया करो माँ सपनों में ढेर सारी बातचीत करेंगे। सबका हालचाल जानने की इच्छा नहीं होती तुम्हारी। सब मालूम है, अब तो तुम खुश हो अपने परिवार के साथ उस नई दुनिया में जाकर। हाँ! माँ, नानाजी, नानीजी, मामाजी और मौसीजी से कहना कि उन सब की भी मुझे बहुत याद आती है। चल अकेली न सही सबको लेकर सिर्फ़ एक दिन के लिए मिलने आ जाओ न माँ बहुत याद आती है, तुम्हारी। लाड़ किया करती थीं तुम हम बहन- भाइयों से अब तो हम तीनों बच्चे तुम्हारे बड़े हो चले हैं…पता है माँ !पिताजी, और तुम्हारे सारे नाती पोते बेहद याद करते हैं तुम्हें। काश! कि मेरी यह लिखी हुई चिट्ठी तुम तक पहुँच जाए और तुम फ़िर से आने की कोशिश करो।मुझे याद है,ससुराल से जब मै मायके छुट्टीयों में आई थी, और विदा हो रही थी, तो तुमने कचौड़ियाँ न बनाकर भाभी ने बनायीं थीं। हालाँकि कोई फर्क न था आपमें और भाभी में पर मेरे विदा होते और चलते वक्त तुम्हारे ही मुहँ से निकला था,’अब मेरा काम ख़त्म”। वो कौन सा तुम्हारा काम ख़त्म होने जा रहा था,इस बात की भनक भी न थी, ऊपर वाले का खेल तो देखो.. मेरी विदाई के वक्त तुम बहुत पहले ही सीढ़ियाँ उत्तर चुकीं थीं, और मैं पिताजी के साथ बाद में नीचे उतरकर आई थी, परमात्मा ने पिताजी के साथ होने व न जाने क्यों तुम्हारा साथ खोने का इशारा कर दिया था ,पर समझ न सकी थी, मैं। माँ! गाड़ी में बैठने के बाद भी ठीक ढँग से तुम्हें टाटा न कह पायी थी, और तुम हाथ हिलाती ही रह गयीं थीं। इसलिए में बार-बार कह रही हूँ, एक बार फ़िर से लौट आ माँ!! तुम्हारे छोटे-छोटे प्यारे से हाथों की बनी हुईं कचौड़ियाँ बहुत याद आतीं हैं, एक दिन के लिए फ़िर से आकर वही कचौड़ियाँ बनाकर फिर से खिला दे न माँ! कहाँ चली गईं हो…माँ!! मुझे याद है, मेरी हर छोटी बड़ी बात की तुम खुल कर तारीफ़ किया करतीं थीं, जब भी मैं तुम्हें कुछ अच्छा पका कर खिलाती तो मेरी तारीफों के पुल बाँध दिया करतीं थीं तुम। अब मेरी तारीफ़ जो करे वो चेहरा मैं कहाँ से लाऊँ माँ! एक बार फ़िर से लौट कर मेरी वैसी ही तारीफ़ कर मुझे फिर से खुश कर दो न माँ.. बस एक बार फ़िर से लौट आ माँ मुझे बहुत याद आती है।
परमात्मा के दिये इस जन्म में मेरी यही इच्छा रहेगी कि मैं अपनी ज़िंदगी का सफर ख़त्म करने से पहले एक बार । फ़िर तुमसे ज़रूर मिलूँ। कुछ बातें थीं जो अनकही रह गईं थीं… तुमसे मिलकर करना चाहती हूँ। सिर्फ़ एक दिन के लिए तू लौट आ माँ।