रामलालजी की शोक सभा समाप्त हो चुकी थी.. घर आए सभी मेहमान अपने-अपने घरों को चले गए थे। अब रामलालजी के घर में एक नए तरह के माहौल ने जन्म ले लिया था.. जिस माहौल में सुकून और ख़ुशी दोनों ही झलक रहीं थीं। रमेश को भो रंजना और उसकी माँ ने हिस्से के लिये सिखाना भड़काना शुरू कर दिया था.. और बात तो उन माँ-बेटीयों की भी सही थी.. आख़िर रमेश रंजना के बाप की उम्र का आदमी था..  तो हिस्सा-विस्सा तो फ़टाफ़ट मिलने की उम्मीद रख रहीं थीं.. रंजना और उसकी माँ-बहनें।

“ ये लड़की क्यों पाल रखी है!”

विनीत ने फैक्ट्री में रमेश से सीधा सवाल किया था।

“ अरे! इसे मैने अपने मतलब के लिये रखा हुआ है.. इसके नाम से करोड़ों का लोन लूँगा!”।

रमेश ने विनीत के सवाल के जवाब में कहा था.. और यही सच भी था। रमेश अक्सर ही सुनीता के आगे यह बात बोला करता था,” देखना! एक दिन इसको ऐसा टोपा लगाउंगा.. याद रखेगी!”।

रमेश रंजना के लिये यह भी बोलता था,” इसको मैने अपने साथ काम के लिये ही तो रखा हुआ है.. इसके नाम से फाइनेंस भी करवाना है”।

“ आप लोन ले तो लोगे पर चुकाओगे कैसे!”।

सुनीता ने रमेश से पूछा था। जिसका जवाब रमेश ने कुछ इस तरह से दिया था…

“ अरे! इससे तुझे क्या करना है! कौन चुकाएगा .. पैसे लेकर कहीं भी भाग जाओ! और यह जो रंजना है.. इसके नाम से तो लोन फट से मिल भी जाएगा.. हरिजन जो है!”।

अब रमेश रंजना को लेकर यह लोन वाली बात नई करने लगा था। रंजना को बटवारे को लेकर बेहद जल्दी लग रही थी.. इसलिये अब रमेश के साथ वह फैक्ट्री के बैंक एकाउंट्स चेक करने पहुँच जाती थी।

“ आप अभी कर लो! जो भी करना है.. नहीं तो ये आप को अपने पीछे-पीछे घुमाएगा! हमारा भी ऐसा ही हुआ था.. तो हमनें अपना सब छोड़ दिया था.. और अलग आ गए थे!”

रंजना की माँ ने रमेश को अच्छी तरह से समझा दिया था.. कि.. अपना हिस्सा रमेश अभी ले सकता है.. समय निकलने के बाद विनीत रमेश को अपने पीछे-पीछे घुमाएगा.. और कुछ भी नहीं देगा। रंजना की माँ के साथ भी उनकी ससुराल में कुछ ऐसा ही हुआ था, जिसके कारण उन्हें सब कुछ छोड़ कर नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ी थी। अब रंजना से मिलकर घर आने के बाद सिर्फ़ और सिर्फ़ रमेश की ज़ुबान पर केवल बटवारा शब्द ही रहा करता था।

“ रमेश को एक फैक्ट्री दे दो.. चाहे वो चलाये या फ़िर अपनी उस रंजना से चलवाए.. अब पैसों की ज़रूरत तो सबको ही है!’।

रमा ने यह बात सबके सामने बोली थी.. सिर्फ़ काम के लिये देने का प्रस्ताव रख रही थी.. नाम करने वाली कोई भी बात बीच में कहीं नहीं थी।

“ औरत इब हमारे घर का फैसला करेंगी!!’”।

दर्शनाजी ने तुरंत रमा को टोकते हुए.. कहा था.. कि औरतों का हमारे घर के फ़ैसले में बोलने का कोई भी हक नहीं है।

हर सदस्य अब घर में बटवारे को लेकर दिमाग़ लगा रहा था। रमेश के दिमाग़ में हरियाणे की ज़मीन आ गई थी।

“ देखना! फार्च्यूनर गाड़ी आएगी! एक चालीस लाख का फ्लैट भी खरीदना है.. !!”


फार्च्यूनर गाड़ी और चालीस लाख का फ्लैट खरीदना चाह रहा था.. रमेश! जिसके लिये उसनें हरियाणे की ज़मीन को बेचने के बारे में सोच लिया था। रमेश इतनी महँगी गाड़ी और चालीस लाख का फ्लैट लेकर किसको ख़ुश करना चाहता था.. आइये हम और आप भी रमेश के संग हरियाणे चल कर ज़मीन का सौदा करते हैं.. और महँगी गाड़ी और चालीस लाख के फ्लैट का हम और आप भी थोड़ा आनन्द उठाते हैं।  इन सभी मज़ों को लूटने के लिये बने रहिये हमारे खानदान के साथ।

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