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खानदान 89

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रामलालजी के विनीत के पास बार-बार फ़ोन आ रहे थे.. फ़ोन पर आवाज़ सुनकर ही रामलालजी की तबीयत बहुत ख़राब लग रही थी.. विनीत अगले दिन के लिये ही अस्पताल रवाना हो गया था। इधर रमेश दर्शनाजी की सारी ज़मीन का सौदा कर बैठा था.. अब दर्शनाजी का पीछे कुछ भी नहीं बचा था।  लगभग सारा पैसा रमेश ने रंजना पर उड़ा डाला था। कारोबार से हिस्से में रमेश को कभी कुछ भी नहीं मिलता था.. अब तक पैसे का रास्ता रमेश के लिये दर्शनाजी ही बनातीं आयीं थीं। लेकिन लड़की अभी भी पल रही थी.. अब लड़की पालना कोई आसान काम तो है.. नहीं! पैसा फेंकना पड़ता है.. और जिसमें के रमेश ने अपने आप को फैक्ट्री का आधा हिस्सेदार बता ही रखा था.. उस हिसाब से तो पैसा लगना ही था। ज़मीन का पैसा ठिकाने लग चुका था.. अब खर्चा कहाँ से होता.. भाईसाहब रमेश की फैक्ट्री में कोई आमदनी तो थी ही नहीं.. लेकिन रमेश के हाथ पिता का बैंक एकाउंट नंबर लग गया था.. जिसमें किसी तरह से ऑनलाइन ख़रीदारी और ऑनलाइन ही पैसे का इस्तेमाल हो सकता था। बस! इस रास्ते का भी रमेश ने बखूबी इस्तेमाल किया था.. और रंजना पर लगभग रामलालजी के एकाउंट में से पच्चास हज़ार की खरीददारी कर डाली थी। रमेश को अपने दिमाग़ पर पूरा भरोसा था.. कि यह बात पता चलनी मुश्किल है।

विनीत रामलालजी के पास भोपाल अस्पताल पहुँच गया था .. वहाँ जाकर विनीत को पता चला था.. रामलालजी बेहद सीरियस कंडीशन में हैं। डॉक्टरों ने जो भी पैसा ऐंठने के लिये उनका बुरा हाल करना था, कर दिया था.. अब वे रामलालजी को अपने अस्पताल में रखना नहीं चाह रहे थे। विनीत अस्पताल का फाइनल पेमेंट करने रामलालजी के A. T. M गया, तो पता चला.. कि किसी ने पच्चास हज़ार की  खरीददारी पहले ही कर ली है.. विनीत का माथा ठनक गया था.. दिमाग़ में नाम आया था, रमेश! पर विनीत अस्पताल में चुप रहते हुए.. रामलालजी को घर लेकर आ गया था।

रामलालजी की हालात वाकइ में बहुत ख़राब थी.. गाड़ी में पीछे लेटकर उन्होंने भोपाल से इंदौर तक का सफ़र तय किया था।

“ पापे बहुत सिरियस है!”।

दर्शनाजी जगह-जगह रामलालजी की तबियत का तमाशा बनातीं फ़िर रहीं थीं.. उनको सीरियस बता कर अपने मालकिन बनने की आने वाली ख़ुशी का इज़हार कर रहीं थीं। रामलालजी ने गाड़ी से घर आते वक्त विनीत से वसीयत और वकील की बात करी तो थी.. पर विनीत इस बात का अपने मुहँ से क्या जवाब देता।

खैर! रामलालजी अपनी ख़राब हालात में अब घर पहुँच गए थे। और एक बार फ़िर से उनके इंजेक्शनों का सिलसिला शुरू हो गया था। “ हम केवल दो-चार दिन के ही हैं, इस गाय को गेहूँ खिला दो!’।

घर में पीछे की तरफ़ गाय घुस आई थी, गाय को देखकर रामलालजी ने सुनीता से यह शब्द कहे थे। पर बाबूजी के शब्दों को सुनीता ने सच नहीं माना था, और उनकी लम्बी उम्र की कामना करते हुए.. गाय को तो गेहूँ डाल ही दिये थे।

रामलालजी के शरीर में अब कुछ भी नहीं बचा था.. उनकी आवाज़ में थोड़ा दम था, और बस! उन्हीं इंजेक्शनों से दिन निकल रहे थे। “ हम ऐसी वसीयत बना कर जाएँगे, कि प्रहलाद जितना चाहेगा उतनी पढ़ाई कर लेगा”।

रामलालजी ने सुनीता को बुलाकर कहा था।

रामलालजी के बैंक के पच्चास हज़ार रुपयों के मामले में भी विनीत ने काफ़ी हंगामा मचाया था। “ जान दे ने.. मेरी पूरी ज़मीन गई.. पच्चास हज़ार रुपयों बदली रोवे है!’।

दर्शनाजी ने विनीत को रामलालजी के पच्चास हज़ार रुपयों के  जवाब में कहा था.. लाखों की ज़मीन बिक गई.. पैसा सारा पानी मे गया.. इन पच्चास हज़ार के लिये क्या रोना!

“ बाबूजी नहीं रहे!!”

रामलालजी का अंतिम समय आ गया था..  रामलाल विला में बहुत दिन तक दुःख के बादल छा गए.. रामलालजी के परिवार के साथ उनके दुःख में शामिल होने के लिये.. पढ़ना न भूलें खानदान।