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खानदान 86

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रमेश के फ़ोन पर बातचीत करने के बाद रंजना को याद आया था, कि रमेश से अस्पताल में मिलने जाना है। रंजना अपनी छोटी बहन को लेकर अस्पताल में मिलने आने वाली थी, इस बात की ख़बर दर्शनाजी को सुनीता ने पहले ही दे दी थी.. ख़बर का पहले से पता होने से दर्शनाजी समय से ही विनीत के साथ अस्पताल के लिये निकल गईं थीं। जैसे ही दर्शनाजी और विनीत अस्पताल रमेश के पास पहुँचे थे.. रंजना और उसकी छोटी बहन उन्हें वहाँ बैठी मिली थीं। दर्शनाजी और विनीत के वार्ड में अंदर आते ही .. दोनों बहनें उन्हें नमस्ते करने के लिये खड़ी हो गईं थीं। अगले दिन जब सुबह सुनीता अस्पताल पहुँची थी, तो माँ-बेटे इसी बात को लेकर आपस में लड़ते मिले थे,” तन्ने नमस्ते करे थी, वा! और तन्ने नमस्ते कोनी लिये!”।

रमेश अपनी मॉ से बहस किये जा रहा था.. कि दर्शनाजी ने रंजना की नमस्ते का जवाब उसे क्यों नहीं दिया।

“ मेरी साली लागे थी! वा! जो मैं उसनें नमस्ते करदी!”।

दर्शनाजी भी कम नहीं पड़ीं थीं, और रमेश की बात का फटाक से दो टूक जवाब दे डाला था.. कि.. उनकी कोई साली नहीं लग रही थी.. रंजना! जो वो उसकी नमस्ते का जवाब देतीं। अभी दोनों में बहस चल ही रही थी.. कि विनीत दर्शनाजी को घर लेने आ जाता है.. और वो उसके साथ घर चलीं जातीं हैं। अब केवल सुनीता और  रमेश ही वार्ड में रह जाते हैं।

“ अरे! ये उसको देख कर ऐसा मुहँ बनाये फ़िर रही थी, जैसे इसकी सौतन हो! नमस्ते भी नहीं लिये”।

रमेश काफ़ी देर तक इसी बात को लेकर बड़बड़ाता रहा था। रंजना ने रमेश से सुनीता का अस्पताल में आने से जाने तक का समय पता कर लिया था.. और अब सुनीता की गैरहाज़िरी में अस्पताल आने लगी थी।

“ वो मेरा कितना ध्यान रखती है.. मेरे लिये अंडा करी लेकर आई थी!”।

रमेश ने सुनीता के आगे रंजना की तारीफ़ करते हुए कहा था। रंजना और सुनीता दोनों ही अपने -अपने समय पर अस्पताल आतीं-जातीं थीं। रंजना कौन है, और क्या है.. यह एक ही नज़र में सारे अस्पताल के स्टाफ को पता चल गया था। जैसे-जैसे रमेश ठीक होता जा रहा था.. उसका अस्पताल के स्टाफ़ के साथ बात करने का तरीका बेहद भद्दा और बदतमीज़ी भरा होता जा रहा था। स्टाफ़ ने रमेश को लेकर डॉक्टरों को कंप्लेंट कर दी थी।

“ मैडम! अब इनके इन्फेक्शन में सुधार है! दवाईयाँ देनी हैं.. और ड्रेसिंग करनी है.. जो हम आपको सीखा देंगें.. आप ख़ुद ही इनकी ड्रेसिंग समय पर कर दिया करना”।

डॉक्टरों ने सुनीता को समझाते हुए, यह भी कहा था,” और वैसे भी अस्पताल का माहौल तो ऐसा ही होता है.. घर पर रहेंगें तो और जल्दी ठीक हो जायेंगे”।

सुनीता को अस्पताल में ही ड्रेसिंग करना सीखा दिया था, और अस्पताल की अथॉरिटी ने रमेश को डिस्चार्ज देने का फैसला ले लिया था। सुनीता ने एक-दो बार डॉक्टरों के सामने ड्रेसिंग कर के दिखा दी थी.. और सुनीता को डॉक्टरों की तरफ़ से O.K रिपॉर्ट भी मिल गई थी।

रमेश का डिस्चार्ज हो चुका था.. और रमेश अब लगभग एक महीने बाद घर आ रहा था। वैसे बीच में परिवार के सभी सदस्य एक रामलालजी को छोड़कर अस्पताल में मिलकर आ गए थे। पर भई! घर का आदमी अस्पताल से महीने भर बाद आए तो ख़ुशी तो होती ही है। रमेश के घर पहुँचने के बाद ऐसा लग रहा था.. जैसे प्रहलाद, नेहा और बाकी सभी रमेश को गले से लगा लेंगें।

“ अरे! ये अभी से कैसे आ गए! और थोड़े दिन हॉस्पिटल में रह लेते!”।

प्रहलाद ने स्कूल से आते ही पिताजी को देखकर यह शब्द बोले थे। बच्चा बजाए ख़ुश होने के रमेश को देखकर परेशान हो गया था.. और होता भी क्यों नहीं, रमेश आए दिन घर में किसी न किसी बात को लेकर नए-नए तरह के ड्रामे किया करता.. और घर का माहौल ख़राब करता था।

“ अरे! ये मुझे मार डालेगी!!”।

वैसे प्रहलाद रमेश के घर आने से सही दुःखी हुआ था.. काश! कि रमेश अस्पताल में ही पड़ा रहता। बदतमीज़ आदमी को देख कर सभी को ग़ुस्सा आता है।अरे! भई! गुरु..  अभी तो पैर की बुरी हालत है.. और ज़बान का यह आलम है! क्या सुनीता समझदारी से काम लेगी! या फ़िर एकबार भावनाओं में बहकर नासमझी कर डालेगी.. पढ़ते रहिये खानदान।