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खानदान 83

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सुनीता और विनीत रमेश को अस्पताल में भर्ती करवा कर घर आ गए थे। दर्शनाजी ने नाटक की पूर्ति के लिये विनीत को दो या तीन बार अस्पताल में फ़ोन करके रमेश के बारे में जानना चाहा था.. दिखाना चाह रहीं थीं.. कि रमेश की कितनी शुभचिंतक हैं। वैसे कुछ भी हो! दर्शनाजी अपने हुनर की मझी हुई कलाकार थीं.. इस औरत की असलियत को सामने लाना कोई हँसी-खेल नहीं था। सुनीता की परेशानी का कारण ही दर्शनाजी थीं। एक हिस्सेदार जो ख़त्म करना था.. यह सुनीता अच्छी तरह से समझ चुकी थी.. पर रमेश सच्चाई से कोसों दूर था.. रमेश की आँखों पर संपत्ति की कस कर पट्टी जो बाँध रखी थी.. खैर! रामलालजी के चाहने पर हिस्सेदार तो दोनों ही उनके बेटे थे.. पर श्रीमान और श्रीमती जी के आए दिन और शुरू से नाटकों को मध्यनजर रखते हुए.. सही ढँग से बटवारा बहुत ही मुश्किल लग रहा था।

“ पैसे दे-दो विनीत को! अब तक क्यों नहीं दिए!”।

विनीत ने अस्पताल से आते ही वहाँ खर्च हुए.. पैसों पर अच्छा- खासा नाटक कर दिया था, यह बताया ही नहीं.. कि सुनीता माँ के दिए हुए.. पैसे लेकर अस्पताल में पीछे-पीछे भागी थी.. पर जब तो बन्दे ने हाथ हिलाकर मना कर दिया.. इसमें सुनीता की तो कोई भी ग़लती नहीं थी, जब घर आकर विनीत को बाबूजी के सामने यही नाटक करना था, तो वहीँ माँ के दिये हुए.. पैसे खर्च कर देता.. पता नहीं अस्पताल में क्या बनना चाह रहा था। विनीत ने घर आकर रामलालजी के सामने सिर्फ अपने पैसों का रोना रोया था.. भाई के पैर की क्या हालात है.. आने वाले कल में रमेश हो न हो. इससे विनीत को कोई भी लेना-देना नहीं था। रमेश के हाल का जिक्र रामलालजी के आगे विनीत ने एक बार भी नहीं किया था.. आख़िर था, तो विनीत भी दोगले परिवार की संतान! खून का असर आता ही है.. सामने कुछ और पीछे कुछ। पीठ पीछे वार करने वाले खानदान का चिराग़ था.. विनीत।

खैर! सुनीता ने ससुरजी के आगे फ़टाफ़ट पैसों का हिसाब-क़िताब कर दिया था, और विनीत को आगे मुहँ खोलने का मौका नहीं दिया था। पैसों का हिसाब-किताब करने के बाद सुनीता ने अपने बच्चे संभाले थे.. और अगले दिन अस्पताल पहुँचने की तैयारी कर ली थी।

रामलालजी तो बीमार अवस्था में ख़ुद ही थे.. और विनीत पहले फैक्ट्री जाता था, इसलिये सुनीता सुबह ही समय से अस्पताल पहुँच गई थी, ताकि आगे का हाल पता चल  सके।

सुनीता समय पर ही थी.. अभी डॉक्टर राउंड पर नहीं आए थे। सुनीता ने रमेश के पैर को गौर से देखा था.. पैर का लालपन कम दिखाई दे रहा था.. यानी सुमेग लगाने से इन्फेक्शन वहीं दब गया था.. यह एक पॉजिटिव sign था। सही समय होते ही डॉक्टर भी राउंड पर आ गए थे, और उनका कहना था..

“ इन्फेक्शन दब गया है! गुड!.. आगे इनके पैर को opearate करना पड़ेगा.. ऑपेरशन से ही पूरी तरह से कट्स लगा कर इन्फेक्शन रिमूव हो सकेगा। आप अपने घर से आपरेशन की परमिशन ले लें”।

आपरेशन की परमिशन के लिये सुनीता ने घर पर फ़ोन कर रामलालजी से डॉक्टरों की बात करवा दी थी। और पैर के आपरेशन की परमिशन भी मिल गई थी। पर आपरेशन से पहले ही पैर के सबसे नीचे वाले हिस्से जहाँ पर पहले ही डॉक्टर ने चीरा लगा कर पस निकाला था, उसी जगह को यहाँ अस्पताल में डॉक्टरों ने उसी वक़्त बेड के चारों तरफ़ पर्दा लगाकर और रमेश को पूरे होश में रखते हुए.. इन्फेक्टेड एरिया को तेज़ धार के चाकू से फटाक से काट दिया था.. सुनीता भी वहीं थी.. और कुछ जूनियर डॉक्टर भी रमेश के पैर को कटता देख.. अपनी पार्ट ऑफ ट्रेनिंग के रूप में वहीं खड़े थे। पैर में कट लगते ही.. रमेश ज़ोर से चिल्ला उठा था..

“ आह!! आह!  मैं कोई तमाशा हूँ क्या!! भगाओ.. इनको यहाँ से.. खड़े कर रखें हैं..!!”

रमेश ने जूनियर डॉक्टरों की तरफ़ इशारा करते हुए.. उनको भगाने के लिये कहा था.. रमेश को अपने पैर का तमाशा बनता देख बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। हालाँकि रमेश को डॉक्टरों ने समझा दिया था, कि यह जूनियर डॉक्टर हैं.. और अपनी ट्रेनिंग ले रहे हैं.. पर रमेश डॉक्टरों की बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं हुआ था.. और डॉक्टरों से साफ़ मना करते हुए, बोला था,” मैं जितने दिन भी अस्पताल में रहूं.. ये जूनियर डॉक्टर मेरे आसपास भी नहीं दिखने चाहियें”।

“ रमेश को O. T में ले गए हैं! आपके आने में कितनी देर है!”।

रमेश के पैर की हालत ख़राब थी.. और अस्पताल में था..  मुकेशजी और परिवार रमेश को देखने आते ही होंगें। मुकेशजी का परिवार या फ़िर रंजना और रमेश की नई अम्माजी… किसको अहमयित देगा रमेश.. रमेश के नए फ़ैसले को जानने के लिये और रमेश के हालचाल से जुड़े रहने के लिये.. बने रहिये खानदान के साथ।