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खानदान 82

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रमेश, विनीत और सुनीता अस्पताल पहुँच गए थे। रमेश को व्हीलचेयर पर ले लिया गया था.. विनीत अंदर डॉक्टर को देखने चला गया था.. डॉक्टर के आने में थोड़ा समय था.. सुनीता रमेश के साथ ही खड़ी थी.. थोड़े समय बाद डॉक्टर अपने केबिन में आ जाता है.. और विनीत को डॉक्टर से परमिशन मिलते ही तीनों केबिन में दाख़िल होते हैं.. रमेश की रिपोर्ट्स देखते ही डॉक्टर ग़ुस्से में लाल-पीला हो जाता है.. और कुछ इस तरह से पेश आता है.. मरीज के साथ।

“ आप पहले कहाँ थे..??”

“ पैंट ऊपर कीजिये अपनी!”।

“ आप में थोड़ी बहुत अक्ल है! कि नहीं! आप को बहुत खतरनाक ब्लड इन्फेक्शन हो गया है.. अगर यह इन्फेक्शन काबू नहीं हुआ.. तो आप का पैर भी काटना पड़ सकता है। इन्फेक्शन के कारण ही आप के पैर में यह ज़बरदस्त सूजन है.. आप को तो पहले आ जाना चाहिये था!”।

“ डॉक्टर साहब मैंने तो इन्हें बोला था.. पर इन्होंने सुना ही नहीं!”।

सुनीता ने डॉक्टर से कहा था।

“ इनकी पैंट काट दो!”।

डॉक्टर ने रमेश की इन्फेक्शन वाले पैर की पैंट काटने का आर्डर दे दिया था.. और रमेश के ट्रीटमेंट का पर्चा डॉक्टर ने तैयार करते हुए.. विनीत को आगे रमेश को इसी बीमारी के स्पेशलिस्ट के पास उसी अस्पताल में रैफर कर दिया था। दूसरे डिपार्टमेंट की ओर चलते वक्त एक आख़िरी सवाल रमेश ने डॉक्टर के आगे रखा था..

“ डॉक्टर मेरे पैर में रॉड डली है! पहले भी इसी पैर का एक्सीडेंट हो चुका है.. रॉड निकलवानी है.. मुझे!’।

डॉक्टर रमेश से पहले हुई एक्सीडेंट की अवधि पूछता है.. और फ़िर..

“ आपने अभी तक रॉड क्यों नहीं निकलवाई.. यह तो आपको अब तक निकलवा लेनी चाहये थी.. अब तो खैर! भगवान ही मालिक है.. आप इन्हें further ट्रीटमेंट के लिये लेकर जाइये!”।

रमेश के इन्फेक्शन वाले पैर की पैंट काटी जा चुकी थी.. और रमेश को आगे रैफर किये हुए डिपार्टमेंट की तरफ़ विनीत और सुनीता लेकर पहुँच जाते हैं.. जहाँ इसी बीमारी के स्पेशलिस्ट डॉक्टर से रमेश की मुलाकात होती है। यहाँ पर रमेश की रिपोर्ट्स देखते हुए.. रमेश का ट्रीटमेंट चालू हो जाता है.. और रमेश को अस्पताल में ही एडमिट होने के लिये कहा जाता है। अस्पताल की सारी भागदौड़ विनीत ही करता है.. सुनीता के हाथ में दर्शनाजी के दिये हुए.. दस हज़ार रुपये होते हैं.. जो रमेश विनीत को देने का इशारा करता है.. सुनीता विनीत को पैसे देने के लिये भागती भी है.. पर विनीत हाथ हिलाकर पैसे लेने से मना कर देता है।

रमेश के पूरे इन्फेक्टेड पैर पर सुमेग नामक क्रीम जो कि पीले रंग की होती है.. लगा दी जाती है.. यह क्रीम सूजन और इन्फेक्शन दोनों को कंट्रोल करने के लिये होती है। और रमेश अस्पताल मे एडमिट हो जाता है। अस्पताल की कारवाई करते-करते रात का समय हो जाता है.. आख़िर में विनीत से डॉक्टर एक पर्चे पर दस्तख़त करवाते हैं.. जिस पर लिखा था..

“ अगर कल को मरीज नहीं रहता.. इसके लिये अस्पताल और डॉक्टर ज़िम्मेदार नहीं होंगें!”।

आख़िर में अब जिस डॉक्टर को रमेश का ट्रीटमेंट करना होता है.. वही राउंड लेने आता है.. और कुछ उस तरह से आगे का हाल बताता है..

“ सुमेग लगाने से अगर कल तक आपका इन्फेक्शन कंट्रोल नहीं होता… और सूजन कम नहीं होती.. तो हो सकता है.. आपका पैर ही काटना पड़ जाए.. वैसे आपकी भी हिम्मत ही है.. जो आपने इन्फेक्शन को यहाँ तक बढ़ने दिया। यह इन्फेक्शन जान-लेवा है.. मैंने ख़ुद इसी इन्फेक्शन के मरीज certify किये  हैं। खैर! घबराने वाली कोई बात नहीं है.. सुबह देखेंगें”।

और डॉक्टर राउंड लेकर चला जाता है।

रमेश सूजन के कारण पैर ऊपर किये बिस्तर पर लेटा था.. और विनीत और सुनीता अभी वहीं खड़े थे। इतना सब सुनने के बाद भी.. कि क्या पता कल हो न हो.. रमेश के चेहरे पर डर और घबराहट नाम की चीज़ नहीं थी.. बेड पर आराम से ऐसे लेटा था.. मानो कुछ हुआ ही नहीं।

रमेश की हिम्मत और साहस की इस वक्त दाद देनी बनती थी।

“ अहह! आह!! आह!! मैं कोई तमाशा हूँ! क्या…!!!”

इतनी बुरी हालत में रमेश अस्पताल में पड़ा था.. और रमेश के ख़ास रिश्तेदार यानी के रंजना और उसकी माँ-बहनों का कहीं पता ही नहीं था.. कहाँ गए.. भई! सब के सब। पैर का इन्फेक्शन डॉक्टरों के हिसाब से ख़तरे की सीमा लाँघ चुका था.. आप लोगों को क्या लगता है.. रमेश अपाहिज हो जाएगा! या….???  रमेश के आगे का हाल जानने के लिये जुड़े रहिये हमारे खानदान के साथ।