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खानदान 81

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अब संयुक्त बिज़नेस परिवार था, और पैसों का चक्कर होने के कारण रमेश को तो अपने पैर को लेकर अपने पिता के आगे खड़े होना ही था। रमेश की बात को नकारते हुए.. रामलालजी ने उसी कंपाउंडर को बुलवा भेजा था.. जिससे वो अपने इंजेक्शन लगवाया करते थे। कंपाउंडर ने रामलालजी को आश्वासन दिलाया.. कि वाकई में रमेश के पैर में ब्लड इन्फेक्शन ही है.. और अस्पताल में भर्ती करवाए बगैर काम नहीं चलेगा। तब जाकर रामलालजी के दिमाग़ में बात बैठी.. हाँ! भई! है.. तो ब्लड इन्फेक्शन ही।

अभी यह बात विनीत को पूरी तरह से पता ही नहीं थी.. रमेश और सुनीता ने हड्डी रोग विशेषज्ञ के कहने पर उन्हीं के प्राइवेट अस्पताल में जाने का निर्णय ले लिया था.. जो कि रामलालजी और दर्शनाजी से उड़ती हुई ख़बर विनीत के कानों में पहुँच गई थी। अगले दिन सुबह..

“ इतने पैसे कित्ते आवेंगे! पास का सरकारी अस्पताल बढ़िया है.. जो माने तो यो!”

विनीत ने प्राइवेट अस्पताल के लिये मना करते हुए.. पास के सरकारी अस्पताल के बारे में रामलालजी के सामने सुझाव रखा था.. जो बात सुनीता के कानों में पड़ी थी। सुनीता ने रमेश को विनीत के सरकारी अस्पताल वाली बात थी। अस्पताल में भर्ती करवाना तो दूर घर में पैसों का ड्रामा शुरू हो गया था, रामलालजी ने अस्पताल जाने के लिये सुनीता को अपना A T.M कार्ड का नम्बर देते हुए, कहा था,” जाओ! हमारा कार्ड ले जाओ.. और पैसे निकाल लाओ!”।

सुनीता भागती हुई.. A.T. M बूथ पर गई थी.. वहाँ जाकर सुनीता को पता चला, कि कार्ड का नंबर ही ग़लत है। सुनीता को रामलालजी ने जानबूझ कर कार्ड का नंबर ग़लत बता कर भगा दिया था.. कार्ड का नम्बर ग़लत बताने का कारण रमेश ही था.. रमेश को कहीं कार्ड का नंबर न पता चल जाए.. इसलिये पहले ही नाटक करके ग़लत बता दिया था।

अरे! नहीं करते A. T. M का ड्रामा! नाटक करके फ़ालतू में भगाया.. सुनीता को!

खैर! रामलालजी के कार्ड के नाटक के बाद दर्शनाजी के बैंक का नाटक शुरू हुआ था।” तूं अपने बैंक ते दे-दे इसनें दस-हज़ार रुपये निकाल के!’।

गाड़ी को तो लाइन पे आना ही था.. रमेश आख़िर पालतू जो था, अपनी माँ का.. या फ़िर यूँ भी कहा जा सकता है.. कि लाड़ला पुत्र था.. अपनी मइया का.. इसलिये अब रामलालजी ने सही गोटी फिट करते हुए.. सुनीता को दर्शनाजी के बैंक की पास-बुक और चैक देकर उनके बैंक भेज दिया था.. जब यही करना था.. तो पहले ही क्यों भगाया सुनीता को अपना ग़लत कार्ड का नंबर देकर.. रामलालजी भी पत्नी के आगे बढ़िया नाटक करना जानते थे।

सुनीता पैसे लेकर बैंक से आ गई थी। ” साथ में चलना है.. कि बाद में रमेश को लेकर आ जाओगे!”।

रामलालजी ने सुनीता से पूछा था। अब पैर में चाहे कितना भी दर्द सही.. और चाहे पैर कट ही क्यों नहीं जाता.. पर रमेश को तो पूरे ही श्रृंगार करके निकलना था.. रमेश की औरतों की तरह तैयार होने की आदत हमेशा से ही जो थी। सुनीता ने रामलालजी को मना कर दिया था.. रमेश और सुनीता कुछ घन्टों के बाद ही अस्पताल जाने के लिये निकले थे। जा तो दोनों प्राइवेट अस्पताल में ही रहे थे..  पर बीच रस्ते में ही रमेश ने अपना फैसला बदला और पहले फैक्ट्री पहुँच गए थे। रमेश के पैर की बहुत बुरी हालात थी.. बुरी हालात और पैर को ख़तरा होने के बावजूद भी.. रमेश ने फैक्ट्री पहुँचने में दोपहर का समय कर ही लिया था।

“ आप में थोड़ी बहुत अक्ल है! कि नहीं!’।

इतना भयंकर पैर में ब्लड इन्फेक्शन होने के बावजूद भी नाटक ही ख़त्म नहीं होकर दे रहे थे। आख़िर जैसे-तैसे कर रमेश विनीत और सुनीता के साथ विनीत के कहे हुए..  सरकारी अस्पताल में पहुँच जाता है.. आगे अस्पताल में रमेश के पैर को देख डॉक्टर क्या प्रतिक्रिया देते हैं.. क्या रमेश डॉक्टरों की बात सुन घबरा जाता है.. जानने के लिये जुड़े रहिये रमेश बाबू के साथ.. खानदान में।