अब सुनीता और रमेश के ब्याह को करीबन एक महीना होने को आया था। इतने करोड़पति होने के बावजूद रमेश सुनीता को कहीं अच्छी जगह घूमाने ही नहीं ले गया था,एक आध बार सुनीता ने धीमे से स्वर में रमेश से कहा भी था”हनीमून भी तो होता है”। इस पर रमेश ने पलट कर तुरंत ही उत्तर भी दे दिया था,उल्टा बोलने और बात करने में बदतमीज़ी का ज़ायका रमेश में शुरू से ही था।

बदतमीज़ी और फूहड़पन से बात करने की तो खैर पूरे परिवार की ही आदत थी। पता नहीं कहाँ के फंनेखा समझा करते थे,अपने आप को। हाँ! तो हनीमून वाली बात पर रमेश ने जवाब दिया था,”अरे! मनी खून! हनीमून नहीं मनी खून होता है, वो”। रमेश के इस जवाब से सुनीता ने एक बार फ़िर से रमेश के चरित्र का चित्रांकन किया था..सोचने लगी थी,”अजीब टाइप का गँवार है,इस ज़माने का होकर भी कैसी बातें करता है…वैसे दुनिया को भूखा-नंगा बताता है,और खुद!…अपने ही परिवार से मिला हुआ है..लगता है,झूठ बोलता है”।

सुनीता परिवार के और रमेश के विषय में सब कुछ जानने के बावजूद भी सच कहने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रही थी। मन की बात मन में ही रखकर जो कुछ था ही नहीं वही दिखाने की कोशिश कर रही थी। सुनीता के यूँ असलियत को दबाने से और लोग सुनीता पर हावी हो चुके थे.. हर बार पिताजी के कहे हुए शब्द अब सुनीता के कानों में गूँज रहे थे,”कुछ भी हो बेटा घर बसा कर दिखा… थोड़ा बहुत नाटक तो हर घर में होता ही है,हमें डरना नहीं है..इंदौर में ही झंडा गाड़ना है”। इस झण्डे गाढ़ने के चक्कर में सुनीता के दिमाग़ की उलझनें और कशमकश और भी बढ़ती जा रही थी। कहीं कमज़ोर पड़ रही थी,सुनीता..कोई यह कहने वाला मिला ही नहीं था, कि गलत का साथ कभी मत देना..यदि कुछ ठीक न लगे तो अपना रास्ता बदल कर दूसरा चुन लेना..

‌कोई किसी के बगैर मरता नहीं है,न ही किसी की दुनिया वीरान हो जाती है… सबका मालिक एक ही होता है..मंज़िल उन लोगों के कदम चूमती है जो खुद अपने फ़ैसले किया करते हैं.. परमात्मा भी उन्हीं व्यक्तियों का हाथ थाम कर खुश होता है। इस तरह का उत्साह किसी ने भी न बढाया था..बस कैसा भी हो कुछ भी हो ..घर ज़रूर बसाओ। आज सुनीता अकेले में जब भी बैठती है,तो इस बात पर एक बार जरूर गौर करती है,”काश! अपने पंखों और काबलियत पर भरोसा कर दुनिया की न सुन उड़ान भर ही ली होती”। पर अब क्या…अब तो यही एक पिंजरा और वही एक कहानी…घर बसाओ..पर पता नहीं क्यों ऐसी कौन सी शक्ति घूम रही है…जो चाह कर भी नहीं बसने देती। रमेश ऐसा भी कोई अजूबा नहीं था,जिस के साथ घर बसाना असंभव ही हो..फ़िर क्या!!

‌रमेश के उसके घर में बरतावे से सुनीता को साफ़-साफ़ ज़ाहिर होता था.. कि यह और इसका परिवार एक ही है। इंदौर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक बहुत ही प्रसिद्ध दरगाह है,सुना है वहाँ मन्नत माँगने से हर इच्छा पूरी हो जाती है। ऐसे ही दरगाह जाने का पूरे परिवार का एक दिन प्लान हो गया था.. सुनीता और रमेश पूरे परिवार सहित दरगाह पर पहुँच गए थे.. भोली और मासूम सुनीता ने जिसके दिमाग़ में केवल एक ही बात फिट हो गई थी,कि.. घर बसाओ..रमेश के नाम का धागा बाँध दिया था..आखिर संस्कार भी कोई चीज़ होते हैं.. जो यहाँ पर सुनीता के दिखाई दिए थे। न चाहते हुए भी पिता की इज़्ज़त और फ़िर भी कुछ सोचकर रमेश के साथ अपनी गृहस्थी की गाड़ी को आगे ले जाने के लिए नतमस्तक थी।

‌दरगाह से लौटते वक्त क्योंकि रमेश और सुनीता अलग कार में थे, इसलिए सुनीता का रमेश से आहिस्ते से कहना हुआ था”मम्मीजी का व्यवहार कुछ ठीक नहीं लगता है, ऐसे अजीब ढँग और गन्दी तरह से बात क्यों करतीं हैं वो…मुझे बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगतीं”। रमेश ने अपनी माँ की तरफ़दारी करते हुए कहा था”अरे! कुछ नहीं ऐसे ही बोलती रहती है वो,उसकी आदत है”। और आगे कहने लगा था”मेरी अम्मा को मक्खन लगा कर रखना है..अपना सब कुछ ये हमें ही दे जाएगी”। सुनीता ने अम्मा के अपने सब कुछ की रमेश से सफ़ाई न माँगते हुए सिर्फ़ इतना ज़रूर सोचा था,”अम्मा सब कुछ दे जाएगी,मतलब अम्मा के भरोसे पर बैठा है,ये..लगता है,खुद कुछ भी नहीं करेगा। मतलब इसके हिसाब से अम्मा.. अपना कुछ नहीं”।

इसी बीच फैक्ट्री के काम के सिलसिले में रामलाल जी का दिल्ली जाना हुआ था,पर सुनीता यहीं थी इंदौर में।
‌दिल्ली पहुँचकर रामलाल जी अपने समधी श्री मुकेशजी को फ़ोन कर दिया करते थे..और उन से मिलने उनके घर स्वयं ही पहुँच जाया करते थे। रामलाल जी काम-काजी वयक्ति थे, काम के अलावा और कोई भी फ़ालतू की बात करने के शौकीन न थे.. ऐसे ही थोड़े ही उन्होंने इंदौर में दो-दो फैक्ट्री खड़ी कर डालीं थीं। हाँ! पर हँसी आती है बताने में,कि रामलाल जी को अपनी बीवी दर्शनाजी से बेहद डर लगा करता था। पता नहीं ऐसी कौन सी बात थी, उस एक औरत में जो पूरा का पूरा घर उनसे थर-थर काँपा करता था।

‌हाँ! तो रामलालजी का दिल्ली मुकेशजी के घर पहुंचना हो गया था। रात को रामलाल जी ने मुकेश जी के सारे परिवार को इकठ्ठा किया था… अपने सुपुत्र रमेश की कहानी सुनाने के लिए..सारे परिवार को बिठा रामलालजी कहने लगे थे,” रमेश का घर में आचरण कुछ ठीक नहीं है..रमा को उल्टा सीधा बोलता है,और उसके भाईयों को और घर वालों को गालियाँ बकता रहता है, कभी रमा के घर वालों को गुस्सा आ गया तो इसकी जम कर पिटाई कर देंगें वैसे भी ट्रक वगरैह तो चलाते ही हैं.. ड्राइवर लोग हैं.. मैं कुछ भी नहीं कर पाऊँगा।
‌अब आप देखिए इसने लोहे का इतना सुंदर लैंप फैक्ट्री में बनाया है,लेकिन कारोबार के कामों में ध्यान ही नहीं देता..इसका दिमाग़ तो ठीक है पर उसे सही जगह लगाने की बजाय गलत कामों में लगाता है।आप ही लोग रमेश को समझायें”।

रामलाल जी की बातों पर अनितजी जी और सुनील जी का कहना हुआ था,”भाईसाहब!अगर रमेश काम-काज नहीं करता तो उसे आप उसका हिस्सा देकर उसे अलग कर दीजिए”। और रामलाल जी का कहना हुआ था,”न!न!..हिस्सा तो मैं बिल्कुल भी नहीं दूँगा अपने जीते-जी.. बेच खायेगा। बातों से थोड़े ही मैने अपना कारोबार खड़ा किया है”। जिस पर सुनील, सुनीता के भाई का कहना हुआ था,”तो ठीक है,अंकल आप अपनी प्रॉपर्टी में से कुछ भी मत देना हमें अपनी बहन की काबलियत पर पूरा भरोसा है,आपके रमेश से ज़्यादा कमा कर खिला सकती है”। और रामलाल जी एकदम चुप हो गए थे, कुछ आगे न बोल पाए थे। इस बात का पता सुनीता को अपने माता-पिता द्वारा पता चला था, जब वो कुछ दिन के लिए अपने मायके दिल्ली रहने गई थी।

‌क्या होता है,ये हिस्सेदारी और हिस्सा…हमारे हिसाब से हिस्सा और कुछ नहीं सिर्फ़ इन्सान की काबलियत होती है…काबिल बन्दे को तो कुर्सी खुद ही अपनी तरफ़ बुलाती है। हमारे हिसाब से हिस्सा पूरी तरह से काबलियत पर निर्भर करता है,छीना झपटी पर नहीं।
‌क्या सुनीता में अपनी काबलियत साबित करने के गुण मौजूद होंगे या फ़िर रमेश के साथ सात फेरों का मतलब केवल ज़ायदाद और रुपया पैसा ही निकलेगा।‌‌‌‌‌‌

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