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खानदान 77

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सुनीता यूँहीं बैठे-बैठे अचानक ही फ्लैशबैक में पहुँच कर मुस्कुरा दी थी। और सुनीता की ख्यालों की दुनिया अचानक ही एक दूसरे दौर में पहुँच गई थी.. जब प्रहलाद और नेहा अभी छोटे बच्चे थे.. और ज़्यादा कुछ भी नहीं समझते थे।

“ अरे! आज प्रहलाद के स्कूल के बाहर प्रीती की मोटरसाइकिल ख़राब हो गई थी.. वही ठीक करने की कोशिश कर रहा था!”।

रमेश सुनीता से बोला था।

“ कौन प्रीती!”।

सुनीता ने रमेश से सवाल किया था.. और दोनों में प्रीती को लेकर कुछ इस तरह से बातचीत शुरू हो गई थी..

“ अरे! प्रहलाद के स्कूल के पास रहती है.. उसका भी लड़का प्रहलाद के स्कूल में ही तो पढ़ता है.. रोज़ अपने लड़के को लेने और छोड़ने आती है। देखने में अच्छी-खासी है.. ब्यूटी पार्लर चलाती है.. अपना।”

“ अच्छा!”

सुनीता ने प्रीती के बारे में सुनकर कहा था।

अब रमेश प्रहलाद के स्कूल जाकर आए दिन उस प्रीती की चर्चा करने लगा था। उसका फोन नम्वर वगरैह भी ले लिया था.. और उसके घर का पता तक ले आया था। एक दिन रमेश ने घर आकर सुनीता से कहा था,” तैयार रहना! बच्चों को लेकर प्रीती के घर चलना है.. वो पनीर बनाएगी!’।

सुनीता सीधी-भोली और मूर्ख तो थी, ही.. बस! बिना कोई सवाल जवाब किये.. शाम को ही रमेश के संग बच्चों सहित प्रीती के घर जाने के लिये तैयार हो गई थी। रमेश ने रस्ते से प्रीती के घर जाते वक्त एक सुंदर सा फूलों का गुलदस्ता ख़रीद लिया था। और सभी प्रीती के घर पहुँच गए थे।

अच्छी-खासी शादी-शुदा महिला थी.. प्रीती। दो लड़के थे.. प्रीती के.. दोनों ही प्रहलाद के स्कूल में पढ़ते थे। पतिदेव भी प्रीती के काफ़ी सज्जन पुरुष थे। रात का खाना-वाना खाकर सभी घर वापिस आ गए थे।

रमेश ने प्रीती और उसके परिवार से मेल-जोल बढ़ा लिया था। कौन क्या करता है.. खानदान तक की जानकारी हासिल कर ली थी। एक दिन बहुत रात हो गई थी.. और रमेश घर नहीं लौटा था, सुनीता ने रमेश को फोन लगाकर पूछा था,” कहाँ हो..?”

“ अरे! मैं यहाँ मेले में हूँ.. प्रीती और इसके दोनों बच्चों के साथ!”।

सुनीता आधी रात को रमेश की यह बात सुनकर हैरान रह गई थी,” अरे! मेरी दहेज की गाड़ी में ये उस प्रीती और उसके बच्चों को मेले में झूले झूला रहा है! और हम यहाँ कमरे में बैठें हैं.. नेहा और प्रहलाद को तो कभी नहीं ले जाता.. झूला झुलाने ये आदमी मेले में!”।

सुनीता ने रमेश की फोन पर हुई बातचीत को लेकर सोचा था। बस! सोचा ही था.. और ज़्यादा कुछ भी नहीं। और रमेश बाबू प्रीती के परिवार को मेले में घुमा कर आधी रात के बाद घर लौट आए थे।

अब तो रमेश पर प्रीती का भूत था.. प्रीती और उसके दोनों बच्चों को लेकर यह रमेश दहेज की गाड़ी में उसके मायके भी होकर आ गया था। हालाँकि सुनीता ने कहा भी था,” आप यही गाड़ी लेकर क्यों भागते हो!”।

जिस पर रमेश का कहना था..

“ अरे! फ़ोकट में थोड़े ही बैठती है.. पैट्रोल डलवाती है!”।

रमेश पूरी तरह से प्रीती के खानदान तक में घुस गया था, एकबार तो रमेश सुनीता और बच्चों को लेकर प्रीती और उसकी सास के साथ पिकनिक भी मनाने गया था। प्रीती और उसके पति को घर बुलाकर रामलालजी और घर के अन्य सभी सदस्यों से मिलवाया था.. सभी ने साथ में भोजन का आनंद भी लिया था। उस वक्त सुनीता ने प्रीती और रमेश को लेकर कुछ भी नहीं सोचा था।

प्रीती एक खानदानी और अच्छी महिला थी..  उसके पति भी एक अच्छे इंसान थे.. वे लोग सुनीता और रमेश के संग पारिवारिक स्तर पर मित्रता करना चाहते थे। पर रमेश तो हर जगह ही अपना बिज़नेस माइंड लगाता आया है… रमेश ने पैसों की गोटी एक बार फ़िर प्रीती और उसके पति के बीच रखनी चाही थी.. पैसों को लेकर ही अनबन हो गयी होगी.. यह मामला ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाया था। प्रीती के परिवार ने ख़ुद ही रमेश से कोई भी रिश्ता नहीं रखा था.. और बात ख़त्म हो गयी थी।

“ तूं कुँवारी छोरी ढूँढ!  श्यादी-शुदा नहीं!”।

दर्शनाजी ने इस बार सही ढँग से अपने लाल को शिक्षा दी थी.. रमेश की समझ में माँ की बात अब पूरी तरह से आ गई थी.. और रमेश बाबू ने एक बार फ़िर से दूल्हे बनने की तैयारी कर ली थी। फ़िर तो खैर! बात रंजना तक पहुँचा ही दी थी।

“ यो मटर खाते ही घोड़ा बन गया था!”।

मटर खाते ही कौन घोड़ा बन गया था। नाटकों से भरी सुनीता की कहानी अब आगे स्टेशनों पर पहुँच रही थी.. आगे कौन-कौन से स्टेशन आने वाले हैं.. जानने के लिये पढ़ते रहिये खानदान।