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खानदान 7

indian wedding

सुनीता अपना मन बनाकर रमेश के और उसके परिवार के साथ पूरी तरह से एडजस्ट कर घर बसाने की कोशिश में लगी हुई थी। पारिवारिक नाटक साथ ही साथ चल रहे थे, जिसमें अहम भूमिका निभा रहीं थीं..दर्शनाजी। रमेश को रोज़ शाम को फैक्ट्री से आने के बाद सुनीता ने आज क्या-क्या किया की सारी ख़बर देती थीं। रमेश के दिमाग में दर्शनाजी ने रमा को लेकर धीरे-धीरे ज़हर भरना शुरू कर दिया था। हालाँकि रमा भी दर्शनाजी की ही बहु थी,पर दर्शनाजी की यह पहली सियासती चाल थी,दर्शनाजी का वयवहार बेहद अजीब सा लगता था,सुनीता को..उस रमेश को अपने भाई, पिता और भाभी के ख़िलाफ़ ही पट्टी पढ़ाती रहती थी। और कमाल की बात यह थी,की दर्शनाजी खुद सबसे प्यार से और मिलकर पेश आया करती थी। इन सभी बातों पर गौर दे रही सुनीता ने रमेश को बताने की कोशिश भी की थी, पर सही या ग़लत वो रमेश तो अपनी माँ के ख़िलाफ़ सुनता ही नहीं था।

सुनीता अभी परिवार के सदस्यों का बर्ताव कुछ समझ नहीं पा रही थी..माहौल और परिवेश पूरी तरह से अलग था। कभी तो सुनीता को दर्शनाजी ग़लत नज़र आतीं थीं, और कभी रमा। अब जहाँ पर संयुक्त परिवार होता है,और आमदनी की कोई भी हिस्सेदारी नहीं होती,वहाँ तमाशे होते ही हैं।

उन्हीं दिनों की बात थी,एक दिन सुनीता के पिताजी अपने किसी दोस्त को लिए अचानक ही इंदौर आ गए अपनी बिटिया से मिलने..सुनीता के पिताजी और उनके करीबी दोस्त को नज़ारा कुछ अजीब ही लगा था..एक तरफ़ ससुर साहब यानी के रामलालजी दीवान पर लेटकर आराम से टेलीविज़न का आंनद ले रहे थे,तो दूसरी तरफ़ दर्शनाजी सोफे पर मुकेशजी और उनके करीबी दोस्त के साथ बैठकर अपनी ही धुन बतियाने लग पड़ीं थीं। न ही कोई ख़ातिरदारी और न ही कोई हाल-चाल बस अपना ही राग अलापे जा रही थी।

मुकेश जी के दोस्त ने दर्शनाजी से सीधे ही शब्दों में पूछ लिया था,”क्यों!भई,चोधरण हरियाणे के हो आप तो,तो फ़िर तसले तो ज़रूर ढोये होंगें और खेत भी काट रखे होंगें”। उनकी इस बात का दर्शनाजी के पास कोई भी उत्तर न था। ऐसा प्रतीत हो रहा था, उन्हें देखकर मानो अपनी असलियत ही छुपा रहीं हों। खैर! रामलाल जी,दर्शनाजी और मुकेशजी व उनके दोस्त में आपसी बातचीत यूँहीं चल रहीं थीं, और सुनीता पीछे डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर हाथ रखे सब कुछ सुन रही थी।

सुनीता के चेहरे पर पिताजी के आने की कोई ख़ुशी सी झलक ही न रही थी..बल्कि सुनीता खुद अपने ही ख्यालों में खोई हुई थी,सोच रही थी,”हमारे यहाँ जब भाभी के पिताजी आया करते थे,तो माँ और हम सब भाग -भाग कर अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाया करते थे,और जम कर ख़ातिरदारी किया करते थे,पर यहाँ तो पिताजी आ कर बैठे हैं, और कुछ भी नहीं.. यह क्या”। खोई हुई सी सुनीता खड़ी थी। और फ़िर एक ख़याल और आया था..सुनीता के मन में,”पिताजी ने हमारे लिए भूखे-नंगे करोड़पति देख दीये हैं”। यह भूखे नंगे शब्द सुनीता ने कहीं अपने मन में ही रख लिए थे..और ज़बान पर आने ही नहीं दिए थे। बातचीत के दौरान रामलालजी और दर्शनाजी शुरू ही हो गए थे,”रोटी भी बिना चबाए मुहँ में नहीं जाती है, मैं तो पोते का मुहँ देखे बगैर बिल्कुल नहीं मरूँगा”।

और इस बात पर मुकेशजी का कहना हुआ था,”क्यों नहीं आप ज़रूर पोते का मुहँ देखेंगें”। मेहमानों के आगे अजीबो ग़रीब सी बातें करना सुनीता को बिल्कुल भी न भा रहा था.. समझ नहीं पा रही थी..इस हरियाणे के सलीके को। खैर! मुकेशजी ने अपने दोस्त के साथ खुद के रहने का होटल में ही इंतेज़ाम कर रखा था, उन्होनें अगले दिन सुनीता को होटल में ही आमंत्रित किया था।

“कैसा सिस्टम है,घर का” सुनीता ने सोचा था। घर के माहौल ने सुनीता का तो चेहरा-मोहरा ही बदल कर रख दिया था। अपना आत्म विश्वास खो बैठी थी..इतने उम्दा कलाकारों में जो आ गई थी। घर का माहौल सरल न होकर इतना नाटकीय था, कि कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।

खैर! बातचीत कर और उल्टी-सीधी चाय पीकर मुकेशजी और उनके मित्र अपने होटल चले गए थे..मुकेश जी अच्छे व्योपारी होने के कारण होटल वगरैह में रुकना उनके लिए कोई भी मुश्किल बात नहीं थी। शाम को जब रमेश घर लौटता है,तो सुनीता से उसका पहला डॉयलोग ही यह था,”देख लिया इन लोगों को तुमने कैसे कर रहे थे, तुम्हारे पिताजी के सामने, कैसे बोल रहे थे, जो हम खिलाएंगे वही खाना पड़ेगा”। सुनीता ने इस बात का कोई भी उत्तर न देते हुए,एकदम चुप-चाप खड़ी रही।

अगले दिन सुबह ही मुकेशजी ने घर पर फ़ोन करके सुनीता और दामादजी को होटल बुलवा लिया था। रमेश सुनीता को लेकर दहेज में दी हुई मारुति कार लेकर होटल पहुँच गया था। सुनीता पिताजी को देखकर खुश हो गयी थी। मुकेश जी ने सुनीता को मौका सा देखकर अपने पास बुलाया और पूछा था,”हाँ!तो बेटा, क्या इरादा है इसका,कुछ काम धंधा करेगा या नहीं! क्या बोलता है”। और उन्होंने सुनीता से यह भी कहा था,”अगर नहीं तो चल मेरे साथ वापिस दिल्ली”।

सुनीता ने इस वक्त अपने पिताजी की पूछी हुई बात का कोई भी जवाब नहीं दिया था। पिताजी और उनके मित्र को रमेश सुनीता अपने संग घर ले आये थे,मुकेशजी को दोपहर की सुपरफास्ट ट्रैन से ही वापिस दिल्ली जाना था। घर आने के बाद एक नया रंगमंच मुकेशजी और उनके मित्र को तैयार खड़ा मिला था।

क्या देखते हैं… घर के बाहर सड़क पर एक पुरानी लोडिंग गाड़ी खड़ी हुई थी..दर्शनाजी और रमा इस पुरानी खटारा लोडिंग गाड़ी में बैठने को तैयार खड़ीं थीं। दर्शनाजी का मुकेशजी से कहना हुआ था,”चौधरी,में थोड़ा बड़ी बहू के साथ कहीं जा रहीं हूँ, आप बेटी से मिलकर चले जाना”। दर्शनाजी ने सुनीता से भी कहा,”अपने पिताजी को जो मन करे वो खिला देना..ब्रेड और आलू रखें हैं”। दोनों पिता और बेटी से दर्शनाजी इतना कहकर उस पुरानी सी खटारा लोडिंग गाड़ी में कूदकर चढ़ीं थीं,और वो लोग निकल लिए थे।

मुकेशजी घर के गेट पर खड़े होकर यह सारा नज़ारा देख रहे थे.. यूँ दर्शनाजी का उस खटारा गाड़ी में कूद कर चढ़ना मुकेश जी को बहुत ही अटपटा सा लगा था.. उन्होंने दर्शनाजी को लेकर उस वक्त सोच लिया था,”दो कौड़ी की औकात है,इस औरत की”। लेकिन उस वक्त यह बात मुकेशजी ने अपने मन में ही रखी थी,काफी दिनों बाद सुनीता के आगे बताई थी। दर्शनाजी के चले जाने के बाद मुकेशजी ने धीरे से सुनीता को अपने पास बुलाकर पूछा था,”,क्यों!चलना चाहती हो वापिस मेरे साथ दिल्ली”। और आगे पूछा था,”क्या कहता है, काम-वाम करेगा कि नहीं”। सुनीता के पास आज पिताजी के सवालों का कोई भी जवाब न था..और सुनीता रमेश के संग पिताजी और उनके मित्र को ट्रेन में बिठाकर वापिस आ गई थी। हाँ!दिल्ली पहुँचकर मुकेशजी का कहना था,कि उनके मित्र रमेश की पर्सनालिटी की बहुत तारीफ कर रहे थे।

लड़के की पर्सनालिटी भी अच्छी है, काम वाम करेगा की नहीं…और हाँ! शुरू के दिनों में विनीत जी ने भी मुकेश जी से कहा था”बाबूजी मैं किसी को भी कमाकर नहीं खिलाऊँगा”। मुकेशजी ने विनीत की बात पर सुनीता को समझाया भी था,”रमेश की बात को बढ़ा-चढ़ा कर बोलो,चींटी मारे तो बोलो नहीं,नहीं आज तो हाथी मारा है”।

सुनीता अब एक अजीब सी कशमकश में फँसती चली जा रही थी..इतने सारे नाटक इस रमेश के साथ ही क्यों जुड़े हैं.. देखने मे तो ठीक ही लगता है..फ़िर भी इसे देखकर मन मे कौन सी शंका है,जो उतपन्न हो जाती है।रमेश नाम की और उसके परिवार नाम की समस्या का सुनीता के मन मे एक ही समाधान बार-बार आ रहा था,”चल कोई भी बढ़िया बहाना कर इसे हमेशा के लिए छोड़ दे”। पर नहीं, फ़िर वही ..लोग क्या कहेंगें, और पिताजी ने जो ब्याह में खर्चा किया है,उसका भी क्या। इतने सारे सवाल सामने और एक मस्त मोला इंसान ..रमेश सुनीता के आगे अपने परिवार के नाटकों के हिसाब से रंग बदलता हुआ..अब क्या और कैसे होगा सोच में डूबी सुनीता रमेश के ही साथ पारिवारिक नाटकों की डोर में उलझती हुई आगे निकल पड़ी थी।
घर मे कोई भी कमी न होने पर भी घर के माहौल को साज़िश में परिवर्तित कर घर के सदस्यों ने ही घर को एक अच्छे ख़ासे नाटकीय रंगमंच में बदल डाला था।