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खानदान 69

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रंजना के जाने के बाद सुनीता को रमेश को लेकर अच्छा महसूस नहीं हो रहा था। रमेश के चेहरे पर सुनीता रंजना को लेकर एक निराली सी ख़ुशी और चमक देख रही थी। “ कौन थी… ये! मम्मी पापा के साथ!”।

प्रहलाद और नेहा ने सुनीता से सवाल किया था।” अच्छी दीदी थी!”।

ख़ुद ही सवाल का जवाब भी दे डाला था।

“ इन्हें कभी-कभी घर बुला लिया करो!”।

फ़िर से बच्चे बोले थे।

सुनीता ने बच्चों की किसी भी बात का जवाब नहीं दिया था। रमेश का बर्ताव बदलता जा रहा था.. फैक्ट्री न जाकर रमेश रंजना के चक्कर में ही लगा रहता था। जन्मदिन वाले दिन दर्शनाजी भी रंजना से मिल चुकीं थीं। वैसे तो किया धरा सब उनका ही था.. पर नाटक कंपनी अच्छी थीं।

“ वा कोन बैठी थी..!”।

दर्शनाजी ने अगले दिन रंजना को लेकर सवाल किया था।

पर सासू-माँ के सवाल का जवाब सुनीता ने नहीं दिया था। रमेश अब रोज़ ही रंजना को घुमाने- फिराने ले जाता था.. और अब तो दोनों वक्त का खाना-पीना भी रंजना के साथ ही शुरू कर दिया था। रंजना का जन्मदिन था.. रमेश ने रंजना के घर फ़ोन लगाकर उसकी माँ से बात करते हुए कहा था..” अम्माजी! आपकी बेटी बहुत ही संस्कारी और अच्छी है!.. आपने बहुत ही अच्छे संस्कार दिये हैं.. उसको!”।

सुनीता वहीं खड़ी थी.. रमेश की बातें सुनकर हैरान रह गई थी। और सबसे बड़ी हैरानी की बात तो यह थी.. कि रमेश अपने उम्र की औरत को अम्माजी कह कर संबोधित कर रहा था। सुनीता रमेश से पूछ ही बैठी थी,” ये रंजना की माँ तो आपकी उम्र की औरत है.. फ़िर अपने-आप को अम्माजी कैसे बुलवा सकती है”।

“ उम्र से क्या होता है.. रिश्ता तो हम किसी भी उम्र के आदमी के साथ बना सकते हैं!”।

रमेश का जवाब था।

रमेश रंजना के साथ बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रहा था.. और अब ज़मीन बेच कर पैसे ला- ला कर भी उस पर पर लुटाए चल रहा था। रमेश दिल्ली से रंजना के लिये हज़ारों रुपये का सामन मँगवाने लगा था। “ रंजना हरिजन है.. अगर किसी ने मेरे साथ थोड़ी सी भी टेढ़ी करी. तो हरिजन एक्ट लगवा दूँगा!’।

रमेश ने घर में सबके सामने चिल्लाते हुए कहा था। रमेश दोनों हाथों से पैसा लुटा रहा था.. रंजना पर.. पर घर में कोई भी उससे सवाल करने वाला नहीं था। रंजना अभी कॉलेज में पढ़ रही थी. रमेश काम-धंधा छोड़कर रंजना की ही ड्यूटी मे लगा रहता था। इधर रामलालजी पूरी तरह से बिस्तर में आ गये थे.. पर रमेश को उस लडक़ी के आगे अब कोई भी नज़र नहीं आ रहा था। रमेश ने लड़की के दिमाग़ में अच्छी तरह से फिट कर दिया था,” मैं फैक्ट्री का मालिक हूँ, और मेरी हरियाणे में ज़मीन जायदाद भी है”।

लड़की पर रमेश से ज़्यादा पैसों का भूत चढ़ गया था.. नहीं तो बाप के उम्र के आदमी के साथ कौन सी लड़की आजकल के ज़माने में घूमती है। रमेश इस बार पूरी तरह से बाहर निकल चुका था.. दर्शनाजी का रमेश को पूरा आशीर्वाद था। अब सुनीता को रमेश के घर आते ही उस पर ग़ुस्सा आने लगा था.. कोई भी औरत इस तरह के नाटक नहीं बर्दाश्त कर सकती। प्रहलाद भी अब रंजना को लेकर सवाल उठा रहा था। नेहा तो खैर!.. अभी छोटी थी.. पर फ़िर भी अनजान नहीं थी।

“ अगर पति को वैश्या चाहये.. और वो उसमें खुश होता है.. तो पति की माँग पूरी करने में, और उसको ख़ुश करने में कोई बुराई नहीं है!”।

ऐसे ड्रामों का कहीं कोई भी इलाज नहीं है.. सुनीता को अपने बच्चों को लेकर घर छोड़ देना चाहये था। पर कहाँ जाती.. बेचारी!.. माता-पिता हर कीमत पर इसी रमेश के साथ घर बसवाना चाहते थे.. जानते थे.. कि अगर बेटी मायके आ गई, तो समाज में इज़्ज़त उछल जाएगी.. दोषी सुनीता ठहराई जाएगी.. रमेश नहीं।

सारी बातों को मध्य नज़र रखते हुए.. सुनीता रामलाल विला में ही अपने दोनों बच्चों के संग रह रही थी। रमेश उड़ाने-खाने वाला आदमी था.. सुनीता का भी कोई कमाने-खाने का रस्ता नहीं था। क्या!..  रामलालजी घर के वरिष्ठ होने के नाते.. सुनीता और उसके बच्चों के लिये जायदाद में से कुछ हिस्सा रखेंगें.. या फ़िर सुनीता को अकेला ही बच्चों के साथ छोड़ देंगें.. जानने के लिये पढ़ते रहिये.. सुनीता के संघर्ष की कहानी… खानदान।