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खानदान 68

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रमेश और सुनीता प्रहलाद के साथ स्कूल से लौट रहे थे.. अचानक ही रमेश गाड़ी में ज़ोर-ज़ोर से बोलना शुरू हो गया था,” उसका भाई बॉक्सर है..!!.. गोल्ड मैडलिस्ट है.. !! .. उसकी मौसी मिनिस्टर है.. इस जायदाद का एक और वारिस आ गया है.. !!.. देखना वो आएगी.. बैठेगी मेरे साथ गाड़ी में.. !!

रमेश इतनी बुरी तरह से चिल्ला रहा था.. कि सुनीता और प्रहलाद के कान के पर्दे फटने को हो गये थे। सुनीता समझ ही नहीं पा रही थी.. कि यह आदमी इतनी ज़ोर-ज़ोर से किसके बारे में बक़वास किये जा रहा है.. और किसके बारे में बखान किये जा रहा है। प्रहलाद के स्कूल से घर पहुँचते ही रमेश सफ़ारी लेकर शाम तक कहीं ग़ायब हो गया था.. सुनीता रमेश को फैक्ट्री में समझ रही थी.. पर शाम को घर में घुसने के अंदाज़ से ही सुनीता समझ गई थी, कि रमेश कहीं और से ही आ रहा है। सुनीता ने पत्नी धर्म निभाते हुए.. रमेश से खाने के लिये पूछा था।” मुझे भूख नहीं है”।

रमेश ने साफ़ इनकार करते हुए कहा था।

एक दो दिन बाद रमेश फ़िर किसी लड़की की फ़ोटो सुनीता को ज़बर्दस्ती दिखाते हुए बोला था,” अच्छी है!. न देखने में!.. इसको भी कुत्ते बहुत पसन्द हैं.. इन लोगों ने अपने घर में दो-दो कुत्ते पाल रखें हैं”।

सुनीता को रमेश की बातों में थोड़ी सी भी दिलचस्पी नहीं थी.. पर क्या करती..  उसे भी ज़बर्दस्ती सुनना पड़ रहा था.. ये सब। “ ये वो नहीं है.. ये रॉयल फैमिली की है!”।

रमेश ने आगे बताते हुए कहा था।

“ रंजना है.. इसका नाम”।

रमेश ने रंजना का बखान करते-करते पूरे ही कान खा डाले थे। थोड़े दिन बाद ही रमेश का जन्मदिन आने वाला था।” वो मेरा जन्मदिन मनाने के लिये बोल रही है.. मैं उसे मिलवाने के लिये घर लेकर आऊँगा!”।

रमेश का जन्मदिन संक्रांति वाले दिन ही आता है.. तो ऐसे दिन तो घर में वैसे भी पकवान बनने ही होते थे.. और वैसे भी रामलालजी के परिवार में संक्रांति बहुत ही धूम-धाम से मनाई जाती थी। घर में सुनीता ने खीर और बढ़िया भोजन तैयार करके रखा हुआ था.. रमेश का भी सुनीता के पास फ़ोन आ गया था,” मैं शाम को रंजना को लेकर घर आऊँगा!.. वो मेरे जन्मदिन पर घर आना चाहती है!”।

शाम के समय रमेश रंजना को घर लेकर आ गया था।

अरे!.. यह क्या!!.. सुनीता को तो देखकर हँसी ही आ गई थी।

कुल उन्नीस या फ़िर होगी लगभग बीस साल की.. एक छोटे से कद की लड़की रमेश के साथ सामने खड़ी थी। रमेश रिश्ते में लड़की का चाचा-ताऊ ही लग रहा था। कहने का मतलब है.. विनीत की लड़कियों की उम्र की लड़की लिये.. खड़ा था.. रमेश।

लड़की भी रमेश के साथ आराम से हाथ में बड़े से फूलों का गुलदस्ता लिये आराम से ही खड़ी थी.. जैसे बरसों की जान-पहचान हो। प्रहलाद और नेहा के साथ बैठकर भोजन करती हुई ऐसी लग रही थी.. मानो उन्हीं की कोई  दोस्त घर में आई हुई हो।खैर! जन्मदिन तो अच्छा मना था.. रमेश का।

जन्मदिन की पार्टी के बाद रमेश को रंजना को छोड़ने घर जाना था.. चलते वक्त.. रमेश ने  रंजना को बडी सी चॉक्लेट और लिफ़ाफ़े में डालकर पाँच-सौ रुपये भी return गिफ़्ट के रूप में दिये थे। लड़की चालक थी.. सुनीता और रमेश के रिश्ते की कमज़ोरी पकड़ ली थी। सुनीता को रमेश का रंजना के साथ व्यवहार एक बार फ़िर से अटपटा लगा था। रमेश जैसा मतलबी आदमी किसी को चॉक्लेट और पाँच-सौ का पत्ता देता है..  इसका मतलब कुछ ख़ास ही है।

“ हरिजन है!.. बजा देगी सबकी.. हरिजन एक्ट लगाकर”।

सुनीता और रमेश का घोंसला बनने से पहले ही टूटने की कगार पर खड़ा था। समाज की नज़रों में सारा दोष सुनीता के ऊपर ही आ रहा था। एक पुरुष को काबू करना एक स्त्री के लिये कोई मुश्किल काम नहीं होता.. पर सुनीता रमेश की लगाम कसने में नाकामयाब साबित हो चुकी थी.. जिसका सबूत रमेश की ज़िंदगी मे एक के बाद दूसरी लड़की का आना था। क्या सुनीता अपने इस बिखरे हुए.. घोंसलें के तिनकों को समेट कर दोबारा बनाने की हिम्मत कर पाएगी.. या फ़िर सुनीता के ऊपर बर्बादी का ठप्पा लग जायेगा।

अगर आप भी सुनीता के संघर्ष में दिलचस्पी रखने लगे हैं.. और जानना चाहते हैं, कि नाटकों में फंसी.. आगे सुनीता का क्या होगा.. तो पढ़ते रहिये.. खानदान।